Friday, December 26, 2008

Comedy of Terrors-

आतंकवाद के ३० दिन...



२६/११ को पूरे ३० दिन हो गये है. ज़ेहन में अभी भी वो यादें बाबस्ता है, वह त्रासदी, वह कसक ,वह पीडा़, वह झटपटाहट, वह निराशावाद सभी बरकरार है, किसी भी हिंदी फ़िल्म के मसाले से भरपूर स्क्रीन प्ले की तरह.

मगर यह एहसास जब अपनी निरंतरता को प्राप्त कर जाता है, तो कहीं जाकर एक स्थाई भाव अख्तियार कर लेता है, जो किसी भी सूरत में आप के मानस से किसी भी रबड से मिटाया नही जा सकता.ये चित्र देखा. अभी कल ही एक चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई थी उन दिनों के स्मृतिचित्रों की.

मगर मेरे पास कुछ टोटके हैं , जिन्हे मै कभी कभी इस्तेमाल कर स्ट्रेस या भावनाओं के अतिरेक से प्रेशर कूकर की सीटी की भांति रिलीज़ कर लेता हूं, जो मान्यताओं से भी कभी कभी विपरीत होता है.इसे मैं Comedy of Terrors कह सकता हूं.

हां , मैं कॊमेडी या हास्य की बात कर रहा हूं. मुन्नाभाई की फ़िल्म में दॊ. अस्थाना को याद करें, जब खीज या गु़स्सा चरम सीमा से बढ़ जाता है तो वे हंसने लगते थे. मेरा अलग है थोडा, कि मैं उस पी्डा या वेदना में भी हास्य ढूंढ लेता हूं ताकि दिल की चुभन के अहसासात को थोडा तो कम किया जा सके.

वैसे मैं कोई बहुत गलत भी नहीं हूं. अमेरिका में पिछले दिनों जिन फ़िल्मों नें रिकॊर्ड तोड व्यवसाय किया है, उनमें कॊमेडी या व्यंग से भरपूर फ़िल्में या कार्टून फ़िल्मों का बाहुल्य रहा है. बाकी को देखें तो फ़ेंटासी की फ़िल्में भी उन्हे राहत दे रहीं है, इस जगव्यापी रिशेशन या आतंकवाद के भयनुमा स्ट्रेस से.

कोई इसी नकारात्मकता से देख कर पलायनवाद की परिभाषा में डाल सकते है.मगर क्या गालिब नहीं पूछ रहे हैं कि दिले नादां तुझे हुआ क्या है? , आखिर इस दर्द की दवा क्या है?

अब देखिये इस Comedy of Terrors को. शेक्सपीयर ने लिखा था Comedy of Errors. और यहां इस त्रासदी में भी हमें व्यंग या हास्य कैसे निकलता है ये देखें.

पहले तो नेताओं को ही याद कर लिजिये. गुस्से से ज़्यादा अब हंसी आती है जब हम याद करते है कि महाराष्ट्र के गृह मंत्री कहते है, कि ऐसे छोटे मोटे हादसे तो होते ही रहते है. मगर उन्हे क्या पता था कि ना केवल वे और उनके boss, मगर राष्ट्रीय मंच पर भी ग्रूह मंत्री ( जिनकी अपनी खुद की लॊंड्री की दुकान है वे, याद आये?)भी अपना जॊब खो बैठे.

केरल के मुख्य मंत्री का फोटो भी कुत्ते के गले में देख कर हंसी आयी. मेरे पडोसी कुत्ते नें भी एक दिन मौन रखा था जब मुझ पर गुर्राया नहीं.

मुझे याद है, उन दिनों मुम्बई में चेंबुर मोनोरेल के प्रॊजेक्ट के उदघाटन के पोस्टर पूरे शहर में लगे थे और बाद में उन्ही के साथ सभी पार्टियों के भी शहीदों को श्रद्धांजली देने के पोस्टर लग गये थे. उसमें कॊंग्रेस्स के पोस्तर पर देशमुख जी का वही हंसता हुआ चित्र लग गया था जो उदघाटन के पोस्टर पे था( मैं उसका फ़ोटो नहीं खींच पाया, क्योंकि किसी ने उसे उतारने की कवायद शुरु कर दी थी.

क्या होता अगर ताज़ होटल में आतंकवादीयों और एन एस जी के कमांडो के बीच की मुठभेड़ के दौरान लाईट चली जाती ? ( यहां भारत में संभव है). कोई आतंकवादी कमांडो से पूछता की भाई साहब माचिस देना तो ज़रा..., या फ़िर कहता हमारी टाईम्स है, या कच्ची है.( बचपन में हारते समय अपन नें बहुत बार टाईम्स ले लिया था या पदने से बचने से कच्ची कर लिया करते थे)


पाकिस्तान तो रोज़ रोज़ कॊमेडी कर रहा है. पूरा देश और अंतरराष्ट्रीय जगत देख रहा है, मान रहा है, सबूतों पे सबूत दिये जा रहें हैं. मगर हमारे पडोसी तो इन्कार पे इन्कार किये जा रहे हैं. अब हम हाथ जोड कर कह रहें है, कि भाई साहब हम आप पर हमला नहीं कर रहें है, मगर इनकी तो फ़ूंक ही खिसकी जा रही है, बेकार में युद्ध का माहौल खडा कर रहे है. अब अगर खुदा न खास्ता युद्ध हुआ तो पाकिस्तान नहीं बचेगा. मगर क्या हमारे नेतृत्व में इतना दम है?














अब ज़रा बेहन जी का टेरर देखिये. जी हां मायावती की. ( जी नहीं लगाऊंगा, क्षमा करें). अब एक इंजिनीयर की ये औकात हो गई कि मायावती के जन्मदिन पर ५० लाख का तोहफ़ा भी नही दे सकता. उसे क्या जीने का हक है, अगर आका का ये अपमान करे तो. मगर आप हैं कि बिना शरम कह रहीं हैं कि ये सब विपक्ष की चाल है.


एक कार्टून भी इसी पर छपा है जो आपकी नज़र है.(साभार दैनिक भास्कर)



मगर सबसे ऊपर, रेंकिंग नं. १ है यह बात कि हमारे अंतर्राष्ट्रिय चौधरी, भाईयों के भाई, आतंकवादीयों के सिरमौर जनाब बुश साहब को भी कोई जुता मार गया. क्या खूब बात है.


हमारे यहां लोगों को कब अकल आयेगी.

Tuesday, December 9, 2008

मौन... एक श्रद्धांजली..

जी हां, मैं फ़िर आ गया हूं, अनुपस्थिती के लिये तहेदिल से माफ़ी मांगते हुए..

फ़िर लिखूंगा, मगर अभी बस यही... मौन....दो मिनट का मौन....


एक श्रद्धांजली..

Sunday, November 30, 2008

शहीदों के नामों को भुनाने का घिघौना खेल ,रियलिटी शो ...


आज मैं मुम्बई में हूं.
कल ही पुणें आना पडा़, नुपूर के चेक अप की अर्जेंसी थी, फ़िर मेरे इजिप्ट प्रोजेक्ट के लिये मीटींग थी मुंबई में.

खुशी की बात है, कि ऒपरशन ताज़ खतम हुआ, और अब सब ठीक है.

सब ठीक है???

माया नगरी मुंबई की फ़िज़ां में एक अजीब सा सन्नाटा है, साउथ मुम्बई में तो इक्के दुक्के ही लोग दिख रहे है. लोगों के मन में भय है, कि वहां तो सब ठीक हो गया है, मगर वे शैतान तो यहीं कहीं मानव समुद्र में मिल गये है,एक नये शिकारी अभियान के पहले की शांति तो नही? CST Station पर फिर से फ़ायरिंग होने की अफ़वाह भी सनसनी फ़ैला गयी.

दर्द की इन्तेहां हो गई है, मन में निराशा, मगर जो बच गये उनकी सलामती पर थोडी़ राहत ज़रूर.

मेरे प्रोजेक्ट पर , मेरी बिझनेस कम्युनिटी भी सकते में हैं. ऒफ़िसों में भी उपस्थिती हलकी थी, बडे़ अफ़सर आये थे, स्टाफ़ अभी भी भय में सिमटा हुआ है.

एक बात और, सभी जगह शहीदों के फ़ोटो और बॆनर लगे है, राज ठाकरे , शिवसेना, कॊंग्रेस , भाजपा, सभी के . शहीदों के नामों को भुनाने का घिघौना खेल ,रियलिटी शो ...

एक SMS मिला मुझे - राज ठाकरे कहां है? उन्हे बताओ कि दिल्ली से आये NSG के २०० कमांडों में कोई महाराष्ट्रीयन नही है.. (Mid Day में भी दोपहर को छपा है)

Point is well taken, as far as Raj Thakre is concerned.

मगर यह SMS कहीं नही है, जो मेरे आहत मन में उभरा - एक महाराष्ट्रीयन मन में-

सबसे प्रमुख शहीद टीम जिन्हे मुंबई की पुलिस में और जनता में बहुत ही आदर और निष्ठा से देखा जाता रहा है वे तीनों मराठी माणूस हैं..

हेमन्त करकरे,अशोक कामटे ,विजय सालसकर...

उन्हे सलाम..

प्रसिद्ध पुलिस अफ़सर और रोमानिया में भारत के पूर्व राजपूत ज्युलियस रेबेरो नें कहीं एक कॊलम में लिखा है, कि ये तीनों अफ़सर पुलिस के उन जांबाज़ अफ़सरों में से थे जो उच्च चरित्र और शौर्य के लिये जाने जाते थे, और रिश्वत मंड़ली से कोसो दूर थे.

बुधवार को करकरे उनके पास आये थे, इस बात से व्यथित हो कर के लालकृष्ण अडवानी नें उनके मालेगांव के हिन्दु आतंक के दृढ और इमानदार सफ़ाया पर प्रष्णचिन्ह लगा दिया था.

ये सुना है कि नरेन्द्र मोदी नें शहीदों के लिये १ करोड देने की पेशकश की है महाराष्ट्र की सरकार को और शहीद करकरे कि पत्नि नें उसे ठुकरा दिया है, (इसी वजह से शायद)

उस अफ़सर नें कर्तव्य पालन में कहीं कमी नही दिखाई, despite the bare fact the his moral was low with such stupid remarks .

ए वतन , हमको तेरी कसम, तेरी राहों में जां तक लुटा जायेंगे..


अब नेताओं का रियलिटी शो..

अमिताभ के लखन अमरसिंग भिया नें करकरे के शहीद नाम पर भी टिप्पणी करते हुए उन्हे खलप्रवृत्ती का इन्सान बताया. साष्टांग प्रणाम, शिखंडी़..

कल शाम जैसे ही कमांडो नें ऒपेरेशन खत्म किया जनाब गोपिनाथ मुंडे नरीमन भवन पहुंच गये.वे वहां क्या कर रहे थे? भैयाजी , जरा थोडे़ पहले पहुंचते तो आतंकवादी आपके डर से आत्म समर्पण कर देते!!

मुझे याद है कई सालों पहले संसद भवन पर आतंकी हमले का मैं चश्मदीद गवाह हूं. बिहार के कई मुस्टंडे़ और बाहुबली सांसदों की डर से घिग्घी बंध गई थी , और वे भाग कर समीप के निर्माणाधीन पुस्तकालय भवन में जहां हमारा काम चल रहा था , कांपते हुए, घिघियाते हुए हम से मिन्नतें कर रहे थे कि सेकंड बेसमेंन्ट में किसी कमरें में उन्हे लॊक कर दें और चाबी फ़ेंक दें, ताकि कोई आतंकवादी उन्हे बंधक ना बना सके.उनमें से दो नें तो अपने पजामे तक गीले कर दिये थे. ऐसे जाबांज़ (?) कर्णधारों को नमन.

(अभी ६ दिसंबर को उस घटना की बरसी पर उस आतंक की दास्तां ,आंखों देखी लिखूंगा)

महाराष्ट्र के सरकार में गृह मंत्री आर आर पाटील से पूछा गया कि क्या ये इंटेलिजेंस टीम का निकम्मापन नही है, तो तिलमिलाकर बडे़ मियां कहते है-

बडे़ बडे़ शहरों में तो ऐसा छोटा हादसा हो ही जाता है.

आदाब, मेरे मुन्ने, क्या मासूमियत है, कि आरती उतारने का जी करता है.

खैर , अब कुछ Comedy of Terrors कल, अगले अंक में, देखते रहिये, पढते रहिये ..ब्रेकिन्ग न्यूज़..

और हां, उन सभी NSG के कमांडो़ , सेना के और पुलिस के जवानों को सलाम जिन्होने अपनी जानें गंवांई, या जान को जोखि़म में डाला सिर्फ़ इस लिये कि -

अब कोइ गुलशन ना उजडे़, अब मुंबई आज़ाद है...

और छपते छपते..

मेरी बिटिया नुपूर के दिल्ली के MBA Course का सहपाठी, जिसकी शादी खड़कपुर में अभी ६ तारीख को होनी थी, खुद तारीख बन गया. CST Station पर होटल से खाना खाकर लौटते हुए वह भी आतंकवादीयों के गोलियों का शिकार हुआ.
ऐसे कई अपनों की पीड़ा का एहसास हुआ जिनके चित्रों पर अब माला चढ गयी है.

Friday, November 28, 2008

ब्रेकिंग न्यूज़..



मुंबई पर आतंकवादी हमला..

ब्रेकिंग न्यूज़..

सभी न्यूज़ चॆनल चीख चीख कर गला फ़ाड़ कर कह रहे हैं...

हैरां है हर भारतीय , दुख में है सारा भारत, मगर चॆनल वालों का तमाशा जारी है.

चॆनल वालों ने बहुत बडे़ ब्रेकिंग न्युज़ का खुलासा किया है, - ये एक आतंकवादी हमला है...(वाह,जैसे कोई अभी तक हम तो सोच रहे थे कि ये सब मस्ती हो रही है)

रुकिये जाईये नही--- ब्रेक के बाद हम फ़िर आते है- तब तक आप देखिये बंदर की चड्डी बनियान की ऐड्वर्टाईज़मेंट.और भी - चोकोलेट,कॊंग्रेस भाजपा को वोट दो,सेनिटरी नेपकिन, आदि.

ये हमला अमेरिका के ९/११ के हमले के समकक्ष भारत के लिये माना जा रहा है. मगर उन दिनों CNN ने कमर्शियल ब्रेक लिये बगैर घटना दिखाई थी वहां, और आप हम यहां दो दो हमले झेल रहे है-

एक फ़िदाईन आतंकवादियों का, और दूसरा इन चॆनल वालों का आतंकवाद.

खैर, ईश्वर और अल्लाह उन सभी की आत्माओं को शांती प्रदान करे जिन्होने इस पगलायी नयी पीढी के कुछ नौजवानों द्वारा अपने प्राण गवांयें, और वे शहीद जिन्होंनें अपने प्राणों की आहुती दी, ताकि हम अमन से रह सके.

Tuesday, November 18, 2008

नूपुर के दिल से

दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन...
गुलज़ार साहब क्या खूब फ़रमा गये है. इन दिनों व्यस्तता का ये आलम रहा कि ब्लोग से दूर रहना पडा़, तो हर पल हर घडी़ सामने वो रंगीन खाका गुलज़ार होता रहा, और हम तरसते रह गये आपसे बतियाने को, हाले दिल सुनाने को.

हमारी बिटिया नूपुर जो अभी पूना में है, उसे किसी वजह से अस्पताल में भरती होना पडा़ और जब उसे लेकर इन्दौर आये तो हम फिर से जमींदोस्त हो गये, याने शुद्ध हिन्दी में गिर पडे और बडी़ हिन्दी हो गयी हमारी. ( पता नही क्या सोच कर ये कहावत हमारे यहां बोलने का चलन हो गया है, या शायद भोपाल से इम्पोर्ट हुई है खां.एस्ये केस्ये केने लग गये मियां के बिलावजा पिनपिनाने लग गयी ज़बान)

चलो स्वास्थ्य लाभ कर रहा हूं. बडी मज़ेदार व्यवस्था हो गयी है. बिटिया जो चल फ़िर नहीं सकती, मेरी पोस्ट अभी लिख रही है.और मैं चल फिर सकता हूं मगर लिख नही सकता क्योंकि हाथ के पंजे के बल ज़ख्म खाया गया है,

लोग काटों से बच के चलते है,
और हमने फ़ूलों से ज़ख्म खाये है.


तो लिखवा रहा हूं.ब्लोग की दुनिया का नया प्रयोग शायद!!!(अमिताभ को छोड़ कर)

कोइ बात नही , रात बाकी , बात बाकी... अगली बार.....
courtsey Noopur.

सलाम मेरा, नूपुर के दिल से. पापा ठीक हो जाने तक वो वेदव्यास और मैं उनकी गणपति.( I also share same sense of humour as my papa does!!!)

मेरा दिल बडा़ ही खुश हो रहा है आज, क्योंकि मेरे भारत के चंद्र यान नें अपनी तस्वीरें भेजना शुरु किया है..

गर्व से कहो हम भारतीय हैं!!!!



चुनावी महौल् है, और् सांपनाथ् और नागनाथ अखाडे़ में हैं. दोनों की कमीज़् सफ़ेद नहीं और कीचड़ उछालने की प्रक्रिया चल रही है. ये कारटून् देखें जो हमारे यहां के दैनिक नई दुनिया से साभार् लिया है.

























एक और कारटून जो सत्य वस्तुस्थिती बयां करती है. (नई दुनिया से साभार)


दस्विदानिया...

Monday, November 10, 2008

सत्यजित रे- फ़िल्म सिक्किम


"सिक्किम"

यह नाम है उस फ़िल्म का जो महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित रे नें बनाई थी, मगर किसी कारणवश उसे थियेटर नसीब नहीं हुआ था.अमूमन अधिकतर लोग यह नहीं जानते कि उन्होने ऐसे नाम से कोई फ़िल्म बनाई भी थी.

आज यह नाम सामने आया है तो इस वजह से कि १० से १७ नवम्बर तक कोलकाता फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इस फ़िल्म को दिखाया जायेगा, और सत्यजित रे के कई चाहने वाले इस फ़िल्म का इन्तज़ार ही कर रहे थे.

बात ही कुछ ऐसी थी.

दरसल इस फ़िल्म का निर्माण किया था सिक्किम के राजा और रानी नें और सन १९७५ में इसे भारतीय सेंसर बोर्ड नें भी मान्यता दी थी. मगर दुर्भाग्यवश ,इस फ़िल्म की सभी प्रिंट्स नष्ट हो गयी थी.

लेकिन सौभाग्य से अभी अभी ब्रिटीश फ़िल्म एकादमी के पुरातत्व विभाग में संयोगवश एक प्रिंट मिल गई तो यह अनमो्ल खजाना हम तक पहुंच पाया.रे नाम का इतना जबरदस्त प्रभाव है, कि यु एस एकेडमी ओफ़ मोशन पिक्चर्स ने इस फ़िल्म को डिजिटल स्वरूप दिया है.


इस फ़िल्म के साथ रे की अन्य फ़िल्में - पारोश पाथर, तीन कन्या, जोय बाबा फ़ेलुनाथ टु , और अपराजितो को भी प्रदर्शित किया जायेगा.




सत्यजित रे अपने मृत्यु के कुछ दिन पहले, एकेडमी अवार्ड के साथ..

Tuesday, October 28, 2008

दिवाली पर शुभकामनायें

आप सब देशवासियों और मेरे ब्लॊग के अंतरंग मित्रों,


आप सभी को इस दिवाली पर सुख और समृद्धि के साथ हार्दिक शुभकामनायें...

सुख दिल के गहराई में , अंतर्मन में स्थाई रूप से वास करे...

समृद्धि मानस के विचारों की, बुद्धि और विवेक के वस्तुनिष्ठ एवं उपयुक्त उपयोग के समझ की....

सर्वेSत्र सुखिन: सन्तु ,
सर्वे सन्तु निरामय ,
सर्वे भद्राणे पश्यन्तु,
मा कश्चिद् दु:खमाप्नुयात् ...


और साथ ही भौतिक स्वरूप के सुख और समृद्धि की भी आप के और आपके परिवार में कभी कमी नहीं आये, ये जगत पिता ईश्वर से तहे दिल से प्रार्थना...




आप इसी तरह यहां इस ब्लोग पर आकर अपने विचारों से इसे और समृद्ध बनायें , और समाज में व्याप्त घृणा और असंतोष के इस संवेदनशील वातावरण में सच्चे और शांतिमय सुझावों और साझा मानसिकता की कड़ी बनाकर सभी सभ्य और असभ्य जनों को सुखी बनायें ,यही कामना..

सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते,
घनांधकारेश्विव दीपदर्शनम्...


(मृच्छकटिकम् - शूद्रक)

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है,
उसी प्रकार दुख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है.


आमीन..

Tuesday, October 21, 2008

Raj Thakare राज ठाकरे की गुंडागिर्दी-यूपी,बिहार की लठैत संस्कृति - आंखों देखी..

काफ़ी दिनों बाद आपसे मुखा़तिब हूं. इस बार ज़रा बाहर था, मुम्बई तक काम के सिलसिले में गया था. आपबीती आपके नज़र कर रहा हूँ .

सीन -१ ( मुम्बई )
















सुबह मुम्बई सेंट्रल पहुंच कर मैने जब टॆक्सी वाले को कहा की दादर जाना है, तो उसने दादर का पता पूंछा.मैने कहा - शिवसेना भवन के पास,(मेरा होटल वहीं है), तो वह चौंका और जाने के लिये मना करने लगा. आपनें तो सुना, पढा़ ही होगा, कि श्रीमान राज ठाकरे को कल रात ही गिरफ़्तार किया गया था. मुझे पता नहीं था. वह ही नही, कोई भी टॆक्सी वाला वहां जाने के लिये तैय्यार नहीं हुआ.पता यह भी चला कि रात में राज ठाकरे के गुण्डों ने उत्तर भारतीय चालकों की टॆक्सीयां के कांच भी फ़ोडे थे.कहीं कोई मारपीट भी हुई थी .

मैं परेशान सा सोचने लगा कि क्या किया जाये, तो एक हिम्मतवाला ड्राईवर होटल से थोडा पहले छोडने को राज़ी हुआ. किस्मत से होटल के पास कोई गतिविधि नही देख कर टॆक्सी को घुमा कर होटल छोडने को जब मेरी गाडी मुडी ही थी, कि अचानक गली में से कुछ युवकों का हुजूम निकला, और वे नारेबाज़ी करते हुए मेरी टॆक्सी की ओर बढे. मैं समझ गया की ये वही उपद्रवी हैं जिनके बारे में अब तक कहा गया है.बहस करना व्यर्थ था, फ़िर भी साहस जुटा कर मैं टेक्सी से बाहर आकर उनसे मराठी में बातें कर उनका ध्यान बांटने का यत्न कराने लगा. लेकिन उससे पहले ही हमारी गाडी के विंडस्क्रीन को तोड़ वे आगे बढ़ने लगे. कुछ कांच के तुकडे मुझे भी लगे. टेक्सी वाले के प्रति अपराध बोध से मन ही मन लढते हुए मैं अनायास ही उन लड़कों से प्रतिक्रिया स्वरुप पूछ बैठा- तुम सब ये क्यों कर रहे हो? उसमें से एक लडके ने मुड़ कर बड़ी ही तल्खी से कहा- राज साहब को पकड लिया है. इस सरकार को कब अक्ल आयेगी ? मेरे मुंह पे शब्द आए थे - राज ठाकरे को कब अक्ल आयेगी ?

मगर तब तक मुझे अक्ल आ गयी थी की चुप रहने में ही भलाई है, मेरी. उनका क्या? उनमें राज ठाकरे के दो तीन ही आदमी होंगे, बाकी सब तो भीड़ थी. बिना शख्सि़यत के, बिना चहरे के. व्यवस्था के प्रति , समाज के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति के अवसर को भुनाते हुए भेड़ों की भीड़. मैं सकते में पड़े हुए टेक्सी वाले को पीटने से बचा नहीं पाया, और आत्मरक्षा के लिए, आत्मसन्मान की बली चढाते हुए,सामान छोड़ होटल भागने की तैय्यारी में लग गया. सामान कुछ ज़्यादा नहीं था. पिटते हुए उस टेक्सी वाले ने चिल्ला कर कहा - भैयाजी , आपका सामान?

एक आम भारतीय की तरह , मैं स्वार्थ के लबादे को ओढ़ भागने का मन बना रहा था, और वो टेक्सी चालक मेरे ही सामान के लिए फिक्रमंद हुआ जा रहा था. मैंने शर्मिन्दा हो उस भीड़ से उस गरीब को छोड़ने की मराठी में याचना की, जो भाग्य से सफल हुई, क्योंकि तब उस भीड़ को एक बस दिख गयी थी. वो हुजूम पुरुषार्थ की एक और आजमाईश करने आगे निकल गया. मैं शर्मसार हो टेक्सी वाले को ५०० का नोट दे ,सामान ले होटल की दिशा में अग्रसर हुआ.

चित्र - १

जहाँ मेरा प्रोजेक्ट चल रहा है वहाँ भी कंपनी की बसों की तोड़फोड़ का चित्र !!









चित्र - २

शाम को होटल के पास ही लगे शिवसेना भवन के सामने का दृश्य - शिवाजी पार्क के समीप इस सड़क पर इस समय आम दिनों में भीड़ ही भीड़ रहती है. कार, बसें ऑफिस से लौटते हुए लोगों की भीड़. मगर आज , यहाँ अघोषित कर्फ्यू जैसा हे कुछ माहौल है.आम आदमी के मन में डर का यह सजीव चित्रण है.





















सीन -२ ( पुणें )

चूंकि उस दिन कुछ भी काम नहीं हो पाया , तो मैं अपने पुणें के प्रोजेक्ट के लिये निकल पडा़. पुणें में मेरे बहन के देवर रहते हैं, और उनके आग्रह पर मैं रात उनके यहाँ ही ठहर गया. वे जन्म से ही पुणें के रहवासी है, और वहाँ के साँस्कृतिक परिवेश के एक जागरुक प्रहरी भी.

देर रात जब राज ठाकरे की बात चल पडी , तो मैनें अपने साथ हुए हादसे की बात निकालकर मेरे मेज़बान से कहा कि इन जैसी घटनाओं से मराठी संस्कृति की एक अलग चाबी जन मानस में बन रही है, जो वस्तुस्थिति से बहुत ही भिन्न है. इससे, एक और आशंका के अंदेशे से इनकार नही किया जा सकेगा कि कुछ इन तरह का बैकलैश गैर मराठी प्रान्तों में भी पनप सकता है. मायावती का बयान इन भय को और मज़बूत करता है, और भारत के अनेकता में एकता के सांकृतिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करता है.

तो मेरे मेज़बान नें गंभीर हो कर मुझसे प्रतिप्रश्न किया- किस संस्कृति कि हम बातें कर रहे हैं जनाब? ज़रा ठहरिये , कह कर उन्होंने अपने सामने वाले फ़्लॅट से एक षोडसी युवती को बुलाया. मैं चौंक गया. पिछली बार जब मैं उससे मिला था तो वह एक चुलबुली सी, उन्मुक्त नदी सी लड़की थी, मगर आज उसके चेहरे पर भय की छाया के साथ साथ निराशाजनक उदासी का वास था. एकदम बुझी बुझी सी, ठहरी हुई आँखें एक अलग ही वेदना लिए हुए थी. आगे जो कड़वी सच्चाई सामने आयी तो मेरे तो होंश ही उड़ गए.

उनके बिल्डिंग में कुछ ही महीने पहले तीन फ़्लॅट में बिहार के कुछ विद्यार्थी आकर रहने लगे थे. वे वहाँ कोई अच्छा सा कोर्स कर रहे थे. आम तौर पर पुणें में , या महाराष्ट्र में अमूमन लड़कीयों के साथ युवकों का व्यवहार अच्छा ही रहता है. छेड़छाड़ आदि हरकतें कोलेज या स्कूल के स्तर पर भी कहीं कहीं दिख जाता है, मगर आम सड़क पर या गली मोहल्ले में एक परिवार सा मेलजोल होने से शाम या देर रात तक लड़कियां बिना रोक टोक या परेशानी से घिमाती हुई नज़र आ जायेंगी.

















मगर जब से ये बिहार युवक वहाँ आए, उन्होंने अपने ही परिसर में उद्दंड और ऊशृन्खल व्यवहार से लड़कीयों और महिलाओं का गुज़रना ही दूभर कर दिया. इन निरीह सी लड़की के तो जैसे पीछे ही पड़ गये थे वे लोग. करीब ६ महीने से वे उसे जो परेशान कर रहे थे, फब्तियां कस कर अश्लील से हावभाव कर उसे लज्जित कर रहे थे कि उस लड़की का तो मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया. और तो और , उनको समझाने या डाटनें वालों को भी गाली गलौज से सामना कर प्रताडित होना पडा. अब आलम यह है कि वहाँ खौफ के से माहौल में वहाँ के मूल रहवासी रह रहे हैं और अन्दर ही अन्दर यूपी या बिहार के लठैत संस्कृति के प्रति विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं.ये एक Isolated Case नहीं है, ऐसी घटनाएँ अब मुम्बई पुणें , और अन्यत्र कहीं भी मिल जायेंगी.

मैं तो ठगा सा ही रह गया......

ये किस भारत वर्ष की हम बात कर रहें है. पहले किसे दोष दिया जाए? यूपी,बिहार के लठैत संस्कृति के भारतीयकरण को, या इस असंतोष के वातावरण का राजनैतिक फायदा उठाने वाली राज ठाकरे की मानसिकता को? पहले अंडा या मुर्गी?

राज ठाकरे से ये कहने का एक मन करता है, कि भाई, तू तो यहाँ नया खिलाड़ी है. तेरी बराबरी कहीं लालू यादव, मुलायम सिंग यादव या मायावती की गुन्डागिर्दी से भला हो सकती है? अराजकता का इतने सालों का अनुभव इन सब का तगडा है, राज (ठाकरे) की अराजकता अभी शैशव काल में ही है.

दूसरा अंतरमन पूछता है कि अहिंसा के थ्योरी का प्रादुर्भाव बिहार से ही शुरू हुआ है ये कितनी विरोधाभासी बात है ? हमने खुद को कितने हिस्सों में बांट दिया है.धर्म, प्रांत ,जाति, अमीर गरीब, भाषा ... अखंड भारत कहां है?

आप क्या कहते है? कौन तगडा है? कौन सही और कौन ग़लत ? ये ही सिर्फ़ दो विकल्प बच गये हैं?

आम आदमी और राष्ट्रीयवाद के अमन के कबूतर के लिए कोई ठिकाना और है?

जायें तो जायें कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां...

एक और खबर छपते छपते...
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Thursday, October 9, 2008

खिसके हुए लोग - वोटरों का दशहरा

आज विजया दशमी है.

असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीकात्मक दिवस!!

प्रतीकात्मक इसलिए की अब यह बात मात्र प्रतीक के रूप में ही रह गयी है.
आज वह समय आ गया है ,जहाँ सत्य और असत्य की परिभाषाएं एक दूसरे में गड्डमड्ड हो गईं है. जिसे चाहे वो अपने अपने अर्थ लगा कर नमरूद हुआ जा रहा है , सितमगर हुआ जा रहा है. बुद्धिजीवी तर्क या कुतर्क के बल पर चाँद को भी सूरज सिद्ध कराने में धन्य हो रहा है. जो बुद्धिजीवी नही है, वह बावला तो और ही मस्त है. उसे तो चरने के लिए पूरा मैदान खुला है.


आज जब विजया दशमी पर लिखने की सोची तो रावण के किसी अच्छे (?)चित्र को ढूंढने की कवायद शुरू हुई, तब जा कर रावण का उपरोक्त चित्र या कार्टून प्राप्त हुआ. चित्र H.T. से साभार

(जो जानकार नहीं है उन्हें बता दूँ कि चित्र में रावण दायीं तरफ़ है!)


इस चित्र से याद आया कि पिछले दिनों में हमारे प्रदेश में चुनाव का बिगुल बज उठा. ज़ाहिर है कि किसी भी ईंट को उखाडो , दो तीन नेता तो निकल ही आयेंगे. शहर का यह आलम है कि जगह जगह कुकुरमुत्ते की तरह पोस्टर उग आए हैं, जिसमें किसम किसम के नेताओं के फोटू लग रहें हैं. नेता - बड़े ,छोटे, कबर से निकल कर आए हुए, छुटभैये, युवा दिल की धड़कन, युवा सम्राट ( उम्र ६५ साल) सभी.

बिल्ली के भागों छींका टूटा और शहीद भगतसिंग की जयन्ती निकल आई.
फ़िर क्या था, हमारे शहर में जयन्ती मनाने की बाढ़ सी आ गयी. कोंग्रेस ने तो भगतसिंग को पुश्तैनी मिलकियत समझा हुआ है.शहर में गाडी़यों पर पोस्टरों के साथ कान फ़ाड़ू देशभक्ति के तरानों को गाते (?) इन वीरों को देख कर लगा कि हम भी भगतसिंग के साथ शहीद हो जाते तो अच्छा होता , आज का ये दिन तो नही देखना या सुनना पड़ता. भाजपाई भी कमज़ोर नहीं निकले . वे नए शहीदों को तलाश कराने में जुट गये, जिनका भगतसिंग से कोई संबंध कहीं ना कहीं आया हो. आनन फानन में पोस्टरों पर फोटूओं की बरसात होने लगी और पांच साल से लटके हुए सब्र के फल टपकने लगे.

अपने ब्लॉग जगत के पुराने उस्ताद अफलातून जी नें आगाज़ पर छपे भगतसिंग के एक फोटो को मैंने किसी ऐसे ही जलसे में पधारे विधायक जी को दिखा कर पूछा कि " पैचान कौन ? " , तो वो चौंक कर बोल पड़े थे - कोई आतंकवादी है क्या?

अब आया त्योहारों का मौसम. नवदुर्गा , गरबा महोत्सव और दशहरा का घर चल कर आया हुआ चांस. युवक, युवतियों से कहीं ज़्यादा रोमांचित हो उठे ये चुनाववीर !! लगभग सभी गरबा मंडलों पर एक एक ,दो दो नें कब्ज़ा कर लिया. जो बच गए , वे चले गए रावण दहन समिती में. सब जगह फ्लेक्स की कृपा से पोस्टरों पर पोस्टर छपने लगे.पहले चित्र पेंट किए जाते थे तो धोका रहता था, की बनाया तो था सांपनाथ जी का चित्र, बन गया नागनाथ जी का !! जनता तो बेवकूफ थी. ( अब भी है! ) ज़रा चित्र में गलती हुई नही की वोट बैंक खिसक जाता था. ( आज भी खिसकता है) .इसलिए इन खिसके हुए वोटरों के लिए ना जाने क्या क्या पापड़ बेलने पड़ रहे है इन उद्यमशील बन्दों को.वैसे बीच में गांधीजी और शास्त्री जी भी आ कर चले गये, लेकिन इतने सारे कामों की व्यस्तता में वे उपेक्षित ही रह गये. वैसे भी आजकल उनकी प्रासंगिकता है कहां?

मगर ये क्या , सैंकडों रावणों में बेचारे असली रावण का वजूद तो कोने में खिसक गया. रावण की भी तो ज़रूरत है हमें . काला नही होगा तो सफ़ेद को कौन पूछेगा? हर इंसान में तो राम और रावण बसता है. बस ग्रे रंग की स्केल का फरक है. जरूरत है किसी अच्छे डिटर्जेंट की.



आज सरस्वती का दिवस भी है ...!!!


मेरे एक जानकार मित्र नें मुझसे पूछा कि आज के दिन तो हम विजयोत्सव के रूप में मनाते है, जहां शस्त्रों का पूजन होता है. हम सीमोलंघन कर सोना लूट कर लाते है, और बुजुर्गों का आशिर्वाद लेते है.इसमें बुद्धि की देवी सरस्वती का क्या प्रयोजन.

तो मैं कई साल पहले यादों के गलियारे में , अपने बचपन में चला गया.

हमारे पूर्वज करीब दो सौ सालों से इन्दौर के राजघराने होलकर राजवंश के राजगुरु हुआ करते थे.ये होलकर पुणें के पेशवा के सुबेदार थे, और शिन्दे , पवार , गायकवाड़ के समान, इन्दौर ( मालवा ) पर सुबेदारी करते थे.राजगुरु होने की वजह से राज्य में होने वाले सभी धार्मिक कार्य, पूजा अधिष्ठान इत्यादि उनके देखरेख में हुआ करते थे.राज पाट जाने के बाद भी यह चलता रहा, हमारे दादाजी और ताऊजी तक.

उन दिनों बडे़ बड़े त्योहारों पर विशेश उत्सव और आयोजन हुआ करते थे, जैसे दिवाली दशहरा, होली आदि. अनन्त चौदस एवं मोहर्रम आदि पर्वों पर सरकारी झांकी निकला करती थी और सभी धर्मों के लोग उसमें भाग लेते थे. मुझे याद है मोहर्रम के ताज़िये खा़स कर हमारे घर के सामने से गुजरते थे, क्योंकि महाराज की ओर से हमारा परिवार उसकी पूजा करता था.

तो दशहरे के दिन भी शाम को महाराज लाव लश्कर के साथ दशहरा मैदान में जाते थे. वहां शस्त्र पूजन और शमी पूजन करने के बाद रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हुआ करता था.

हम भी बड़े चाव से उस जलूस या शोभायात्रा में हाथी पर बैठ कर शामिल होते थे, और रास्ते में पड़ने वाले इमली के पेड़ों से इमली तोड़ कर खाते थे!!(आजकल इसे रैली कहते है!!)

जब हम वापिस आते थे तो हमारे घर कि स्त्रियां हमारी नज़र उतारती थी, और ’औक्षण" कर आरती उतारती थी. फ़िर हम एक पवित्र स्थान पर शिक्षा की देवी बुद्धि की देवी मां सरस्वती के चित्र के समीप अपने सभी पाठ्यपुस्तकें , कॊपी कलम, या पाटी पेम इत्यादि रख कर उनकी पूजा करते थे.

मैंने एक बार अपने दादाजी से पूछा भी था- नाना, आज जब सभी शस्त्रों की पूजा कर रहे हैं तो हम क्यों अपने पुस्तकों आदि की पूजा कर रहें है?

दादाजी नें बडा़ ही सारगर्भित उत्तर दिया-

"बेटे, हम लोग धर्म और आध्यात्म के सिपाही हैं और सात्विकता के शस्त्रों का वरण करते है- याने शास्त्र! ये शास्त्र, या बुद्धि ही हमारी आराध्य देवता है. राजा एवं उनके सिपाहीयों को प्रजा की रक्षा हेतु राजसिक तत्वों का याने के शस्त्रों का वरण करना धर्म सम्मत है.इसीलिये हम बुद्धि के उपासक आज सरस्वती की आराधना करते है.
एक और बात. आज से २० दिनों बाद लक्ष्मी की पूजा आराधना कर हम अपने उन्नती और खुशहाली का वरदान जब मांगेंगे तब यही बुद्धि हमें सदाचरण का मार्ग पहचानने में हमारी मदत करेगी और उस संपत्ति का सही विनियोग करनें में हमें विवेकहीन बनने से बचायेगी."


मैंने आज भी शाम को अपने बच्चों के साथ पूजा कर अपने पिताजी का आशिर्वाद लिया-

विद्वान सर्वत्र पुज्यते..

Thursday, October 2, 2008

OPEN STANCE बनाम अहिंसा के पुजारी




आज से कई साल पहले जब कुछ चित्र बनाने का शौक था, तो यह Ink Illustration बनाया था. तब से अनाम पड़ा था. आज ही इसका नामकरण किया है :

OPEN STANCE

आज गांधी जी का जन्म दिन है. अहिंसा के पुजारी का जन्म दिन!! और मैं यह क्या लिख रहा हूं?

अभी कुछ ही दिन हुए. अभी अभी बीजींग ऒलंपिक्स में हमारे जांबाज़ों नें अपने देश के लिये व्यक्तिगत पदक हासिल कर भारत वर्ष का नाम रोशन किया.अभिनव बिन्द्रा और सुशील कुमार.

मुक्केबाज़ी में कांस्य पदक लेने वाले सुशील कुमार से ज़्यादा उम्मीदें थी अखिल कुमार से, जो क्वार्टर फ़ाईनल तक का सफ़र तय कर नही पाया.

एक औसत मुक्केबाज़ से ऒलम्पिक में क्वालिफ़ाय करने वाले अखिल कुमार नें बीजिंग जाने से पहले दिये एक साक्षात्कार में कहा था कि उसके कोच नें उसे एक नया मंत्र दिया " OPEN STANCE " .याने जब आपका प्रतिद्वंदी आपको पंच मारने आये तो सामान्यतः आप अपने डिफ़ेन्स को मज़बूत करते हैं और मौका मिलते ही स्ट्राईक बॆक करते है. मगर इस नयी तकनीक से आप अपने डिफ़ेन्स को खुला कर देते हैं , और प्रतिद्वंदी को खुला आमंत्रण देते है कि आ, मार मुझे. उन गाफ़िल लमहों में आप उसके इस कमज़ोर डिफ़ेंस को ढ़हा कर पलटवार करते है, और अंक बटोरते है.

मेरा मानना है कि आज आतंकवाद से निपटने के लिये यही सोच ज़रूरी और लाज़मी हो जाती है. अमेरिका नें 9/11 के बाद कोई भी आतंकवादी हमला नही झेला. पक्का इरादा. दृढ निश्चय और एक मंत्र - Nip in the Bud.

लाल बहादुर शास्त्री अगर आज होते तो क्या यह समस्या होती? (आज उनका भी जम्न दिन है)

हमारे यहां करेगा कोई, भरेगा कोई. आतंकवादी हर समाज में , धर्म में और व्यवस्था (System) में हैं, हम उन्हे छोड़ देते है, और आम इंसान को पकड़ लेतें हैं.

मैंने भी यही करने की सोची. सामान्यतः अहिंसावादी होने की पराकाष्ठा तक अपने चरित्र में अहिंसा को जिया है, कि रावण तक से प्यार करता हूं .मगर यह बात रावणों को कहां पता ? आध्यात्मिक बल कम पड़ गया.ज़ाहिर है इस तामसिकता की फ़िज़ा में सत की क्या बिसात? हमेशा रुसवाई ही रही.

मगर ये तो बड़ी कारगर तकनीक निकली. मेरे सामने हर कोई डिफ़ेंस खुला कर आया, (अल्लाह की गाय )और चौंक कर मुंह के बल गिर पडा़.मगर इसमें खुदी गायब हो गयी, बेखुदी में अपनों को पीड़ा पहुंचायी, और जिनके लिये ज़िंदगी भर के सिद्धांतों पर समझौता किया, वे तो ज़्यादा शातिर निकले. कुछ लोमड़ीयों, और गिरग़िटों नें खिंसे निपोर ली, सौजन्यता की मूर्ति बन गये सामनें, पीठ पीछे छूरी रख बाद में वार किया. और कुछ गेंड़ों नें तो एक ही बात पर अमल किया - Offense is Best Defense.Survival of fittest के जंगली न्याय का Menifestation!

ढाक़ के फ़िर तीन पात..

मगर फ़िर एक अख़बार में महात्मा गांधी पर छपे एक वक्तव्य को पढ़ा ,अपने युरोप यात्रा में उत्तरी धृव से करीब १००० मील पर आख़िरी कस्बे नॊर्वे के ’होनिंगस्वाग ’ से प्रकाशित एक अंग्रेज़ी दैनिक में- जो इस ब्लोग के मुख़पृष्ठ पर डाल दिया गया है:











Quote:

Peace is the most powerful weapon of Mankind. It takes more courage to take a blow than give One. It takes more courage to try and talk things through than to start a war.



(गांधीजी का चित्र नेट से साभार-A collage of humans)

हज़ारों मील दूर एक विदेशी संस्कृति के साये में विदेशी धरती पर कोई विदेशी यह मानता है,तभी तो छापता है. गांधी वैश्विक धरोहर हो गये है, अधिक प्रासंगिक हो गयें है उनके लिय्रे. और हम यहां भारत में , हमारे आध्यात्मिक संस्कारों के अगुआई में भी यह भूल चुके हैं. हमें कोई और चला रहा है, और हम चल रहें हैं.भेड़ों की बहुतायत हो गयी है, सियारों की बन आयी है, और हमारे जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी परजीवी हो कॊफ़ी हाउस में लेक्चर झाड़ रहे हैं.

मैं खूब शर्मिंदा हुआ और अब भी हूं.आप का क्या हाल है? आप किस पार्टी में है दादा?

अखिल कुमार को स्वर्ण नही मिल पाया. पता चला कि Open Stance के चक्कर में खुद का Defense ही कमजोर कर बैठे!!

मैं फ़िर अपनी पुरानी राह पर चल पड़ता हूं, जिसका काम उसीको साझे.

उन्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक, उनके परिभाषित अंधेरे हमें रास आ गये हैं.

और हमारे परिभाषित उजाले और भी प्रकाशवान और दैदिप्यवान हो गये है.आत्मा की शुद्धता लिये निकल पड़े है खुल्ली सड़क पर अपना सीन ताने.कोई तो अगली पीढी़ को बताये गांधी क्या हैं और उनकी प्रासंगिकता आज के ज़माने में क्या है.

मगर मैं अकेला नहीं हूं शायद, आप तसदीक करेंगे इस बात की?



एक चित्र और ...


क्या बात है? अहिंसा के पुजारी की सुरक्षा व्यवस्था ?

Tuesday, September 30, 2008

’अब ना हिन्दी बोलें,हमका माफ़ी दईदो !! ’ छोरा गंगा किनारे वाला..


बहुत दिनों बाद मुख़ाति़ब हो रहा हूं आपसे.

इन दिनों गंगा में से बहुत पानी बह गया.छोरा गंगा किनारेवाला आख़िर में डर ही गया.

"वह इतना डर जाता है कि बीबी के हिंदी बोलने तक की माफ़ी अंग्रेज़ी में मांग लेता है.हिंदी शिरोमणी कवि बच्चन की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढाने वाले इस कुलदीपक ने सलीम जावेद से शब्द उधार ले कभी अकड़कर किसी फ़िल्म में कहा था कि जहां हम खडे़ होते है, लाइन वहीं से शुरु होती है."

पिछले दिनों यहां के अग्रणी एवं प्रतिष्ठित समाचार पत्र ’नईदुनिया’ में प्रसिद्ध हिंदी लेखिका निर्मला भुराड़िया नें अपने स्तंभ ’ अपनी बात ’ में ’अब ना हिन्दी बोलें,हमका माफ़ी दईदो !’ में ऐसा ही कुछ लिखा था. वे आगे बजा फ़रमाती हैं, कि अमिताभजी अगर आप सच के पक्ष में डटे रहते, शान से हिंदी बोलते तो आपके पीछे लाईन बन जाती!(साथ में कार्टून भी नईदुनिया से साभार).

क्या अचूक बात कही है उन्होनें..


आपको याद है दीवार फ़िल्म का वह डायलॊग, जिसमें इस महानायक नें कहा था-

आज खुश तो बहुत होगे तुम, बहुत खुश होगे, कि वो आदमी , जो कभी तुम्हारे मंदिर की सीढ़ी नही चढ़ा ...आदि .. आदि..

आज मैं कुछ इस तरह से कह रह हूं , राज ठाकरे से कि..

आज खुश तो बहुत होगे तुम, बहुत खुश होगे, कि वो आदमी , जो कभी तुम्हारे दरबार की सीढ़ी नही चढ़ा, वह आदमी आज तुम्हारे सामने हाथ जोड कर खडा है...और ये तुम्हारी जीत है.क्या कसूर है उसका, यही कि उसने उसकी मातृ भाषा बोली, या यूं कहें राष्ट्र भाषा बोली?

मगर महानायक, एंग्री यंग मॆन, ये सब फ़ुस्स हो गया.

ठाकरेवाद, या आतंकवाद या जो कोई भी वाद कहें .. राष्ट्रवाद कहां रह गया भाई?

इधर आनन फ़ानन में आमिर खान नें भी पैंतरा बदला. मोदी के सामने डट कर खडे होने वाले और शाबासी बटोरने वाले इस नायक नें यह कहा कि वह तो मराठी ही है, चूंकि उसने यहीं जन्म लिया है.याद है ,तब उन दिनों वह जहां खडा़ हुआ , वहीं लाइन बन गयी थी,एक असली नायक के पीछे.

बात खरी कही. आज से कुछ बीस साल पहले, एक बार किसी अन्य संदर्भ में अभिनेता रणधीर कपूर नें यही कहा था.मै स्वयं मराठी होने के बाद भी अपने आप को मालवी (मालवा अंचल का) समझता हूं. मगर अब आमिर खान को भी यही वक्त मिला था अपनी ये बात कहने का?कहां गया वह असली नायक?

कालाय तस्मै नमः !!!

अभी अभी यहां पोस्टते पोस्टते (!!!) सुबह पढी़ यह छोटी सी ख़बर याद आ गयी, जो उपरोक्त अख़बार में कहीं किसी कोनें में छपी थी.

आख़िर पुलिस नें बडी़ ज़द्दोज़ेहद के बाद अमिताभ बच्चन को धमकी देने वाले ’राज ’ को राजस्थान में पकड ही लिया. क्षमा करें , ये ’वो’ नहीं , वरन कोई देवीसिंग राज पुरोहित है जिसने इस महानायक को SMS कर २५ करोड की रु. की फ़िरौती मांगी थी !!!

चलो, ऐसा नही है कि पुलिस काम नही करती, आप ख़्वामख्वाह ताना देते रहतें हैं.मुम्बई में दादर बांद्रा में नहीं जा सकी तो क्या? राजस्थान तक जाने की मुस्तैदी तो दिखाई.सॊरी, हमका भी माफ़ी दई देब.

कालाय तस्मै नमः !!!



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दुर्गा पूजा और नवरात्रि...


आज से आद्यशक्ति की आराधना का नौ दिवसीय पर्व नवरात्रि उत्सव प्रारंभ हुआ.घर घर में घटस्थापना और देवी मां की मूर्ति स्थापित होगी. गुजरात , महाराष्ट्र , और मध्य प्रदेश में हर मोहल्ले , हर गली में गरबे और डांडिया की धूम मचेगी.बंगाल में काली मां की मूर्ति स्थापना के साथ बंगला संस्कृति और कला का मंचन किया जायेगा.आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें..



तुम्ही वैष्णवी,
तुम्ही रुद्राणी,
तुम्ही शारदा अरु ब्राम्हणी..
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै, नमो नमः ...





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ईद मुबारक ...


















अनेकता में एकता के कथन को सच करने आ गया है ईद-उल-फ़ितर का पाक़ ,पवित्र त्योहार.

तन , मन और आत्मा की शुद्धता के लिये रमज़ान के महिनें में कडे़ रोज़े रखने वाले हमारे मुसस्सल ईमान रखने वाले भाई बहनों को ईद की दिली मुबारकबाद, हार्दिक शुभकामनायें..

नाज़िरीन , ज़रा इन तस्वीरों पर गौर तो फ़रमायें...















क्या इन मासूम चेहरों में आपको कोई आतंकवादी दिखाई दे रहा है?

Thursday, September 25, 2008

आतंकवाद--- बहा के लहू इंसां का मिलेगी क्या...तुमको वो जन्नत...


I am just returning from my solitude , as I was ground due to my accident.

Today , just few minutes back, I hit a site just mentioned below, with a very terrifying title:

बहा के लहू इंसां का मिलेगी क्या...तुमको वो जन्नत...

आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ की 'ऑडियो-वीडियो' पहल ...

Yes, our friend Sanjeev Saarathie has labourously worked upon this timely creation,in association with Team of D - Lab, that I felt a need to just get up, and reach to the top most place of my house & cry. Cry for those innocent lives, those unfortunates, who could not even realise, why they met with that gastly end.

जरा इनकी मार्मिक अपील पर ध्यान दें..

Terrorism at its Worst!!

Friends---


Music with a purpose, that is what we all wants to achieve, isn't it ? these guys from chennai have tried to do the same, being a music person i want u too to give ur valuable opinions about these shocking incidents that happening all around us, together we should make an voice .I need ur support to encourage such efforts so please spare a few moments to comment on this video.

www.podcast.hindyugm.com/2008/09/war-against-terrorism-audio-video.html


How unfortunate I am , that I am unable to post my comments on this blog site due to some technical problem with my site.

Now, here I am trying to achieve two objectives.

THIS VIDEO MUST REACH HUNDREDS OF THOUSAND HOMES, TO ALL CROSS SESTION OF SOCIETY, IRRESPECTIVE OF RELIGION , CASTE OR REGION.

And to put my small reaction as comment to this video, which I could not post.

"What to remark. I am totally speechless and dumbfound. Indeed a very creative fusion of effective and charging lyrics with dramatic visualisation content by array of shocking & heartbreaking visuals."

One line keeps on hauting me.

How can you live in Heaven...?

By creating HELL on earth... ?


All visuals fade out, but HELL remains on your screen. That is reality, a stark reality indeed.

The last nail in the coffin was the picture of young children, who could not even start their journey in this cruel world.

This video must reach to every corner of India , at least the blog world. "

Second objective is not all that important. First is.

Tuesday, September 16, 2008

गुड्डी , महानायक और मराठी माणूस...

शर्म आती है कि आज हम एक ऐसे युग में रहते हैं जहां हमारी प्राथमिकतायें हम तय नहीं करते, मगर राजनैतिक अखाडे के गुण्डे तय करते है.’राज’ करने के उद्देश्य से ’नैतिकता ’ के सभी बंधन नकारते हुए , ये कोहनी तक उगे हुए लोग बरगद की उंचाई नापने का दम भरते है. जनता के दिलों पर नहीं मगर उनके मानस पर भय और Arm twisting की मानसिकता लादने वाले इन बिन लादेनों की, सफ़ेदपोश गुंडों की फ़ेहरिस्त में राज ठाकरे भी शामिल हो गये है.

पुणें में हुए एक महत्वहीन फ़िल्मी समारोह में फ़िल्म की हिरोईन अंग्रेज़ी की जगह हिंदी में बोलने का प्रयास करती है, यह कह कर की सभी लोग हिंदी में भाषण दे रहें है.

तब गुड्डी जया बच्चन यह हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में बोल पडी- मराठी वाले हमें माफ़ करें. यह एक मजाहिया चुटकी थी और इसे खिलाडी भावना से देखा जाना चाहिये. मगर राज ठाकरे नें बात का बतंगड बना दिया.

आम तौर पर जब हम humour की बातें करते है या Sense of Humour, तो हिन्दुस्तान में मराठी हास्य या व्यंग या sattire को काफ़ी समृद्ध और अग्रणी माना जाता है. अमूमन , मराठी साहित्य में गडकरी, आचार्य अत्रे, पु ल देशपांडे, वि आ बुआ आदि अनेक व्यंग साहित्यकारों नें इसमें योगदान दिया है.गद्य, पद्य, नाटक आदि विधाओं में. वैसे हिंदी में व्यंग परसाई और शरद जोशी तक ही सीमित नही रहा , बल्कि दीगर लेखकों नें अपने अपने तईं इसको एक इज़्ज़त के मकाम पर लाने की भरपूर कोशिश की. पुराने समय में संस्कृत में कालिदास,भास आदि नें भी हास्य का उपयोग किया था. हर नाटक में एक विदूषक का चरित्र होता ही था.

फ़िल्मों में भी यह प्रचलन चलता रहा, मगर कभी श्रेष्ठ हास्य या कभी फ़ूहडता लिये.दैहिक भाव भंगिमा से उपजे हास्य या प्रसंगवश निर्मित हास्य, खालिस हास्य.चार्ली चॆपलीन, लॊरेल हार्डी, जॊनी वॊकर, महमूद, गोप, राजेन्द्रनाथ ,ओमप्रकाश और अभी अभी अनुपम खेर, परेश रावल , कादर खान या असरानी . पहले तो हिंदी फ़िल्मों में अलग से विदूषक का रोल रहता था, बाद में अनेकाधिक नायक अभिनेताओं ने हास्य विधा में जोर आजमाईश की, और अब तो वह फ़र्क खतम सा ही हो गया है.

तो बात चल रही थी मराठी माणूस की और मराठी हास्यव्यंग की. मुझे याद है मेरे बचपन में व्यंग को समर्पित एक पत्रिका प्रकाशित होती थी " मार्मिक ", जिसे राज ठाकरे के चाचा और Mentor श्री बाल ठाकरे चलाते थे, जिसमें वे स्वयं एक कार्टूनिस्ट की हैसियत से भी व्यंगचित्र बनाते थे. उसमें अधिकतर राजनैतिक विषयों पर सामयिक व्यंग होते थे.बंबई में उन दिनों हो रहे दक्षिण भारतीय लोगों के बाढ के विरुद्ध वे आवाज़ उठाते थे, जिन्हे वे ’उपरे’ कहा करते थे.

आचार्य अत्रे के साथ उनकी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता मशहूर थी. बाल ठाकरे उन्हे सूअर के रूप में कार्टून में चित्रित करते थे.मगर आचार्य अत्रे ने उसका बुरा नही माना और स्वस्थ व्यंग का मान रखा. उलटवार करते हुए उन्होनें उसी शैली में उत्तर भी दिया- देखिये भाई लोग, सुअर तो हमेशा गंदगी में (Shit) में ही पाया जाता है. तो मार्मिक में मेरा चित्र आश्चर्य की बात नहीं है!!

आज राज ठाकरे और कमोबेश में बाल ठाकरे अपनी रोटीयां सेंकनें की गरज से उन मापदंडों को भूल गये हैं , क्योंकि तब से अब तक राजनीति का विकृतिकरण आज यहां तक हो गया है कि अखिल भारतीय चरित्र के निर्माण की बजाय ये लोग क्षेत्रीय आधार पर बंटवारे की संकिर्ण मानसिकता को पोषित कर रहें है.इस रियलिटी शो के एपिसोड का अंत हुआ महानायक अमिताभ बच्चन को और गुड्डी जया बच्चन को सार्वजनिक तौर से शर्मिंदगी भरी माफ़ी से, यह और दुख की बात.

आम मराठी माणूस को भी यह समझ रहा है. अपने ही घर मुंबई में अपने अस्तित्व की लढाई का हल निकालना ज़रूरी है मगर यूं नही.मै भी मराठी हूं और गर्व से यह कहने में शर्म नही की मैं मराठी हूं. मगर उससे पहले मैं एक भारतीय हूं.

जब बात हास्य व्यंग की निकली ही है इस गंभीर मसले के ज़िक्र के बाद एक हल्की फ़ुल्की बात कहना चाहता हूं.Not to dilute the otherwise Volatile & equally touchy subject, but to establish presence & importance of Sense of Humour.

यहां पोस्ट किया गया यह चित्र जया बच्चन के उन दिनों का है जब वे जया भादुरी हुआ करती थी , और भोपाल में प्रोफ़ेसर कॊलोनी में रहती थी. वहां एक नृत्य संस्था ’कला पद्म’ में भरत नाट्यम का प्रशिक्षण लेते हुए प्रस्तुत किये गये संस्कृत नाटक मालविकाग्निमित्र पर आधारित नृत्य नाटिका का यह एक दृश्य है.साथ में है मेरी बहन प्रतिभा.



प्रोफ़ेसर कॊलोनी ने तीन चार बडी हस्तीयां दी है इस देश को. जया भादुरी, और चरित्र अभिनेता राजीव वर्मा. और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा..

अरे, ये चौथा कौन है ?

कोई नही जनाब, चौथा मैं !!!!


(अगले पोस्ट में एक व्यंग लेख का वादा)

Saturday, September 13, 2008

हिंदी, मात्र भाषा या मातृ भाषा...



आज हिंदी दिवस है.

अपने इस नये ब्लोग पर कई दिनों से आगाज़ करने का मन बना रहा था किसी अच्छे लेख से. आज वह मिल गया इस लिये यहां आपके लिये हाज़िर है हिंदी के लिये अनुभव किये गये कुछ ऐसे पीडादायक विचार,जो लिख गये है दैनिक भास्कर के लिये श्री संजय पटेल ने.

श्री संजय पटेल हिंदी के साहित्य क्षेत्र के एक जाने माने, स्थापित हस्ताक्षर है. विगत कई दिनों से वे अथक (कृपया अथक को रेखांकित करें) प्रयास में लगे हुए हैं की हिंदी में कुछ अच्छा कार्य किया जाये. इसके लिये उन्होने किसी मंच का मोहताज़ होना गंवारा नही समझा, और हिंदी की सेवा में वे लगे रहे हर क्षेत्र में . चाहे वह अखबार मे गद्य हो, पद्य हो, या नैतिकता एवं राष्ट्रीयता का कोई मुद्दा हो, फ़िल्मी संगीत की कोई जाजम हो,हर वह जगह जहां हिंदी का अधिकार पूर्वक उपयोग हो सकेगा , वहां किया.Advertisement की दुनिया में भी हिंदी लेखन को महत्व,प्राधान्य देते रहें हैं .ब्लोग दुनिया में भी छा कर प्रेम बटोर रहे ही हैं.चूंकि ख्यातिप्राप्त करने के बजाय उनके कई दूसरे पावन उद्देश्य है, इसलिये निस्वार्थ भावना से वे हिंदी के कर्मठ सिपाही का कार्य कर रहे हैं.

कृपया लेख पढें और अपने विचारों से अवगत करायें...मूल लेख का एक छोटा सा सम्पादित अंश ही यहां प्रस्तुत है.मूल बातों को ही यहां लिखा गया है.

कम नहीं... अधिक नाम ’कमा’ रही है हिंदी !

हिंदी की दुर्दशा के लिये हम हिंदी वाले ही दोषी है. हिंदी कैसी हो, कैसी बोली जाये, कैसे जुडाव हो हिंदी का नयी पीढी से, इस बारे में एक तयशुदा नीति अपनानी पडेगी.

अंग्रेज़ी के विस्तार से भयभीत होने की ज़रूरत नही है, यह रोज़गार का आसरा भर है.

भाषा समभाव और सहृदयता सिखाती है.विस्तृत होना उसका चरित्र है और उसी में भाषा की सार्थकता भी है. हम हिंदी के प्रचार के लिये अमीन सायानी को क्यों सन्मानित नही कर सकते? हिंदी को जन जन तक पहूंचाने में जाने माने कमेंट्रेटर जसदेवसिंह और सुशील दोशी का अवदान किसी साहित्यकार से कम क्यों आंका जाना चाहिये? पीयुष पांडे को हिंदी का रहनुमा क्यों न माना जाये या तारे जमीं पर का मां गीत लिखने वाले प्रसून जोशी को युवा हिंदी गीतकार के रूप में नवाज़ा क्यों न जाना चाहिये?

जब तक पूर्वाग्रहों के ये बंधन नहीं टूटेंगे हिंदी मात्र एक भाषा रहेगी , मातृ भाषा नही बन पायेगी!!


श्री संजय पटेल के उपरोक्त लेख की अंतिम बात सबसे महत्वपूर्ण और सारगर्भित है- मात्र भाषा या मातृ भाषा, आप खुद ही तय कर लें...

Sunday, September 7, 2008

एकलव्य - सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं

गुरु पर्व
(वो जब याद आये, बहोत याद आये)

कल शिक्षक दिवस था. कईयों नें तो अपने अपने माड साब को याद किया होगा.अपने अपने तईं, कुछ मन से, कुछ जतन से जो यादें संजोई रखी होगी उसकी जुगाली भी की होगी.

व्यवसाय के फ़ेर में भटकने पर मजबूर दिलीप का ये दिल अंदर से कसमसा रहा है, कि कल क्यों नही कुछ लिखा. खैर, आज ही सही. हाले दिल का बयां, दिन के गुज़रने के बाद ही हो सकता है ना?अपना ब्लॊग बाद में ही सही.

तो आज आप लोग थोडा समय मेरे मन के अंतरंग को भी दे, कुछ नितांत व्यक्तिगत , स्वगत..कल से फ़िर अपने मकाम पर वापिस.

आज यहां संगीत की बात करें तो याद आते है मेरे वो गुरुजन , जिनसे मै चाहते हुए भी सीख नही पाया-

भोपाल में उस्ताद सलामत अली खां साहब, जिन्होने मुझे शास्त्रीय संगीत सिखाने का जिम्मा लिया. करीब ६ महिने सिर्फ़ सुर ही लगवाते रहे, और फ़्री स्टाईल में गवाते रहे. कहते थे की बेटा पहले सुर तो लगाओ, बंदीशें, रागमाला, तराना तो अभी दूर है.६ महिने बाद जब हायर सेकंडरी के छः माही रिज़ल्ट आया तो डब्बा गोल!! अब्बा हुज़ूर शिक्षा क्षेत्र के अग्रणी, फ़ौरन गाने पर पाबंदी लगा दी.कहा पहले इंजिनीयर बन जाओ, फ़िर गाते रहना. जब खां सहाब को बताया तो जो उनके आंसू निकले थे वो शिक्षक दिवस पर याद कर ,खुद आंसू बहा के उनसे मुआफ़ी मांग लेता हूं. आज कहां है वे?

मां को भी यह डर सताया की कही अपना बेटा गवैय्या नही बन जाये, तो उन्होने ने भी कसम डलवा दी की की कभी गाने से या संगीत से पैसे नही कमाऊंगा. आज तक निभा रहा हूं. ब्लोग तो फ़्री है ना, आप भी प्यार ही देना बस!!!

इधर इंजिनीयर बनने के बाद जब एम.बी.ए. के लिये इंदौर आया तो एक राखी बहन मिली, कल्पना जो क्लासिकल संगीत की शिक्षा ले रही थी अपने गुरु और पिता श्री मामासहाब मुजुमदार जी से.(कुमार गंधर्व के मित्र).आज वह पूरे भारत में शास्त्रीय संगीत में एक उंचा स्थान रखती है.घर पर आना जाना, सुरों की खुशबू से महकती फ़िज़ा, बघार भी लगे तो पंचम और निशाद से.. मगर फ़िर वही कहानी. जिनके गंडाबद्ध शिष्य होने के लिये सुर साधक तरसते थे, उन मामासहाब नें भी कई बार कहा. मगर होनी तो होनी ही थी.अपनी ही धुन में रहे.

उन्हे भी कल याद किया.

फ़िर अनायास ही मुड गये सुगम संगीत की ओर. गाने तो बचपन से सुनते ही रहते थे, सभी के गाने, और इसीलिये ये सभी मेरे गुरु है उन्हे भी नमन..

मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत मेहमूद, हेमंत कुमार ..
इन फ़िल्मी संगीत के मूर्धन्य गायकों ने जो पंचामृत का खजाना रख छोडा है, इसे लूट रहा हूं. अनायास ही एकलव्य की भूमिका में अपने आप को पाता हूं.यहीं से तो कानसेन बने हैं, और तानसेन बनने की ख्वाईश नही..

गज़ल की दुनिया में भी सुनने को मिला मेहंदी हसन और गु़लाम अली को..उनके लिये उनकी लंबी आयु के लिये भी दुआ की.

फ़िर अपने आध्यात्मिक गुरु भी याद आये- नानासाहेब तराणेकर महाराज, और इस्लाम की रूहानी तालीम देने वाले बाबा सत्तार जी.. और मेरी मां भी .. नमन...

नाट्य शास्त्र की अल्प तालीम के लिये विजया मेहता, और चित्रकारी के लिये सच्चिदानंद नागदेवे याद आये..

उच्च संस्कार, सादे रहन सहन और वस्तुनिष्ठ विचारों के लिये और अपने अंदर समाहित इस लेखक के प्रणेता जन्मदाता महामहोपाध्याय डॊ. प्र.ना.कवठेकर को भी व्यक्तिगत रूप से साष्टांग प्रणाम किया, देर रात तक उनकी सेवा में रहा.

अंत में whole thing is that कि मन में जो भाव उमड रहे है,उसकी अभिव्यक्ति के लिये मन्ना दा का एक मात्र गीत यहां सुनवा रहा हुं, उसे स्वीकार किजीये.. यह मूल गीत नही है.

सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं ..

सुर की सुराही तो रीती ही रह गई.



परसों आशाजी पर कुछ.

Friday, August 29, 2008

कहीं दूर जब दिन ढल जाये- मुकेश

आनंद
यह फ़िल्म आप हम सभी के मानस में कहीं दूर तक जा बसी है. आपके संवेदनशील मन नें हृषिकेश मुखर्जी के उस फ़िल्म के दोनों चरित्र आनंद और भास्कर के कलेवर के अंदर जा कर या उनके हल्के फ़ुल्के उल्हास के क्षणों की या दर्दो ग़म की अनुभूति ज़रूर की होगी.

यह गाना इस शाश्वत सत्य को भोगने की पीडा को अभिव्यक्त करता है, कि जीवन क्षण भंगुर है, एक यात्रा जिसकी शाम तय है.फ़िल्म का नायक आनंद युवावस्था में ही अनचाहे इस यात्रा के अंत में अपने आप को पाता है. उसनें भी सपनोंका एक जहां बसाया था,जिसके बारे में फ़िल्म के आरंभ में वह कहता भी है:

मैने तेरे लिये ही सात रंग के सपने चुने, सपने सुरीले सपने..

कुछ हंसते, कुछ ग़म के ये सपने लिये इस खुशमिज़ाज़ इंसान से आप हम जब रूबरू होते है तो उसके Exterior के आनंदित और उल्हास भरे व्यक्तित्व के पीछे छिपी उसके मन की वेदना से हम रूबरू होते है इस गीत के ज़रिये.मौत की भयावह सच्चाई से.

यह गीत योगेश ने लिखा है . (एक और गीत लिखा है इस फ़िल्म का- ज़िंदगी , कैसी है पहेली..) सलिल दा नें शाम के किसी राग में इसकी रचना की है, और इस जीवन के यथार्थ दिखाने वाले नगमे को मुकेश से अलावा और कौन गा सकता है भला?

अब आप इसका विडिओ देखें और मेरे साथ साथ चलें, आनंद के मन में झांकने..उसके सपनों में और ग़म में शामिल होने..




गाने के प्रारम्भ में समुंदर के क्षितिज पर अस्त होते हुए सूरज से आनंद के मन को उद्वेलित होते हुए हम पाते है, मृत्यु की आहट को वह डूबते सूरज में महसूस करता है, और उदास हो जाता है. मगर अगले क्षण ही एक बैलगाडी दिखाई है निर्देशक नें, जिसे देख नायक थोडा मुत़मईन हो जाता है, शांत हो जाता है . अपने दिल को आश्वस्त कर देता है, कि जिंदगी एक सफ़र ही तो है.

कहीं दूर जब दिन ढल जाये , सांझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये..
मेरे खयालों के आंगन में ,कोई सपनो के दीप जलाये, दीप जलाये......


आप ज़रा यहां बोलों का चयन देखें - सांझ की दुल्हन.. मृत्यु के बारे में आज तक कही गयी एक मात्र उपमा..

नायक भी इस दुल्हन का वरण करने के लिये अपने मन को तैय्यार करता है, और जो सपने उसने पहले देखे थे , उन्हे भुला कर इस दुल्हन द्वारा सपनों के दीप जलाने का स्वागत करता है.

गाने के पहले Interlude में उसके मन का अंतर्द्वंद को ,संत्रास को पत्ते गिरते हुए पेडों के झुरमुट द्वारा और समुंदर के लहरों का मन पर आघात करता हुए विज़्युअल से, साथ ही बांसुरी के हार्मोनी और वायोलीन के समूह के उतार चढाव से हृषी दा और सलिल दा नें बखूबी निर्मित किया है.

फ़िर देखिये पहला अंतरा..

कभी युं हीं जब हुईं बोझल सांसें, भर आयी बैठे बैठे जब युं ही आंखें,
तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र ना आये, नज़र ना आये..


क्या कुछ समझाने की ज़रूरत है? मौत में रोमांस खोजने का यह अंदाज़ , क्या बात है..

दूसरे अंतरे के पहले के interlude में आप सुनेंगे मृत्यु की आहट, Bass Trumpets के खरज़ स्वरों के प्रयोग द्वारा. साथ ही बांसुरी की उत्सवी और विरोधाभास भरी सरगम पूरी Octave में, साथ में विज़्युअल में आनंद के पुराने प्रेम की यादें दर्शाता हुआ सूखे हुए फ़ूल का किताब मे से निकलकर प्रेम की असफ़ल परिणीती का वर्णन करता है, और साथ में नये रिश्तों का मोह भी..

तभी तो वह दूसरे अंतरे में कह उठता है-

कहीं तो ये दिल कभी मिल नही पाते, कहीं पे निकल आये जनमों के नाते,
ठनी थी उल्झन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये,दर्द पराये..


प्रेमिका के बिछडने की पीडा़ , साथ में नये रिश्तों के अपनत्व का अहसास, दोनॊ भाव इस अंतरे में...

फ़िर तीसरे अंतरे में-

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गये वैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो है अपने,मुझसे जुदा ना होंगे इनके ये साये.. कहीं दूर जब दिन ढल जाये.....

क्या आप बता सकेंगे यहां रचयिता तिकडी के मन के भाव क्या रहे होंगे? यह आप के लिये. और साथ में मुखडे और पहले दोनों अंतरों के कुछ अलग भाव, अर्थ अगर हैं तो आईये, सिरजने दिजिये आप के दिल से..

हां, इस गीत को पिछले एक हफ़्ते से भोग रहा हूं , सुर और अर्थ मानों दिल में गहरे पैठ गये है. इसी गाने को गाकर भी पीडा हल्की कर रहा हूं. आप भी सुनना चाहें तो यहां प्रेषित है.. सुनने का नम्रता से अनुरोध. वैसे इस बार पार्श्वसंगीत के सा्थ.

मैं, आप, संगीत और मुकेश !! दिलीप के दिल की आवाज़ से....

Friday, August 22, 2008

मानस के अमोघ शब्द

अपने एक नये ब्लोग के बारे में थोडी चर्चा..

कुछ सालों पहले जब इस दुनिया में आया था तो जिंदगी के सफ़र के दौरान पाया की अपन तो श्री ४२० के राज कपूर जैसे निकल पडे थे खुल्ली सडक पे अपना सीना ताने,यह मिशन लिये की किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वासते हो तेरे दिल में प्यार,क्योंकि जीना इसीका नाम है..

मगर पाया कि सब कुछ सीखा हमनें ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों, हम है अनाडी..बस चलते रहे सुनसान डगर और अनजान नगर में, यह कहते हुए कि आवारा हूं..

मगर क्या करें? दि़ये और तूफ़ान की कहानी की मानींद, दि़या तो अपनी धुन मे मगन ,आस्था के तिनके पर सवार ,मन के और समाज के अंधकार को मिटाने फ़ड्फ़डाता रहा..

मगर वह तो अपनी कहानी है.ज़माने नें कुछ ऐतबार किया , कुछ ना ऐतबार किया. हकीकत से रूबरू हो , बेआबरू हो, ग़ैरते मेहफ़िल से भी बेखबर ,कभी बाखबर चलते रहे. इंसानीयत से बडी शिद्दत से, नेक नीयत से ,भूले से मोहोब्बत कर बैठा यह दिल,नादां था बेचारा .. दिल ही तो है..

अब हम आपकी मेह्फ़िल में शिरकत कर रहें है, तो सोचा क्यों ना हम अपने फ़लसफ़े को भी आप के साथ शेयर करें, वह जो हमने इस जहां से पाया, तिनका तिनका जोड कर..

तो एक और ब्लोग बनाया है” मानस के अमोघ शब्द ’. मानस के याने मन के गहरे पैठ जा कर मेह्सूस की गयी बातें अमोघ याने अचूक शब्दों में ..

यहां पर कोशिश रहेगी कि कुछ ऐसा लिखा जा सके,जो संगीत के अलावा हो, जिस पर जीवन में सीखे मॆनेजमेंट के फ़ंडे, कुछ तकनीकी बातें, कुछ कलात्मक चित्र, कुछ सिंदबादी किस्से,और बहुत कुछ. दिलीप के दिल से पर संगीत की बातें तो चलती रहेंगी ही, जहां हर चीज़ ज़रा शऊर और तेह्ज़ीब के दायरे में रहेंगी. कभी कभी अपने दिल की आवाज़ भी सुनायेंगे .इसका मतलब यह नही की मानस के अमोघ शब्द पर कुछ ठिलवायी होगी. कहने का मतलब है, जो मन नें पाया वही लौटाने का जतन है ये, आ अब लौट चलें..

और हां, यहां लिखे हर वाक्य में एक बात जो लगभग हर जगह प्रतिध्वनित हो रही है है, वह है मुकेश की आवाज़ .जी हां, मुकेशचंद्र माथुर ... जिनकी पुण्यतिथी आज है. तो उन्हे भी याद करें , बडी शिद्दत से, बडे सूकूं से, बडी नज़ाकत से, जैसा की मुकेश जी के गानों का आलम होता था.

उन पर कोइ गीत लगाना क्या ज़रूरी है?

आप खुद ही गा लिजिये ना..हो जायेगी उनकी याद दिल से.

हर आम व्यक्ति को यह दिली सूकूं है की वह मुकेश के किसी ना किसी गीत को अपनी ज़िंदगी में कहीं ना कहीं अपने उपर भुगता हुआ, भोगा हुआ पाता है. दर्द भरे पलों की याद या खुले मन से बेबाक प्रेम अभिव्यक्ति करते हुए.जिसके होटों पे सचाई रहती है, दिल में सफ़ाई रहती है.जो कभी गर्दिश में रहा, तो कभी आसमान का तारा .

तभी मुकेश जी नें हमेशा कहा की - कोइ जब तुम्हारा हृदय तोड दे , तडपता हुआ जब कोइ छोड दे, तब तुम मेरे पास आना- मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा , आप जैसे दर्दीले गीत को सुनने वालों के लिये.

और जिसने यह सब नही मेहसूस किया है, उसकी चिन्ता मैं और आप व्यर्थ में क्यों करें? आप ने यहां तक मेरा साथ दिया है , इतने दूर यह पढने चले आये है,मेरे दिल से निकले कुछ अमोघ बोल सुनने, तभी , क्योंकी आप भी तो मेरे जैसे है> अपनी धुन में रहता हूं,मैं भी तेरे जैसा हूं...यह जो सब लिखा गया है, क्या सिर्फ़ मेरे बारे में है? नही दादा, यह सब आप के मानस कि तो अभिव्यक्ती है.

तो आयें , मिल कर गा उठे -

जीना यहां , मरना यहां इसके सिवा जाना कहां ?
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