Monday, March 29, 2010

मौत लपेटी हुई कविता....हिस्सा हिलाल -एक साहसी कवियत्री.


महिलाओं की स्थिती पर हम सभी बातें कर रहे थे, और मेरी पिछली पोस्ट पर मैने कुछ लिखा भी था, कुछ एकेडेमिक ,कुछ व्यक्तिगत. साथ में ही एक और परिचित महिला की हम बातें करने जा रहे थे.

मगर अभी रविवार को मैने कहीं कुछ पढा और साथ ही नेट पर जाकर कुछ और जानकारी ली और एक साहसी महिला की कहानी सामने आई, जिसका नाम है हिस्सा हिलाल.

हिस्सा हिलाल अमीरात में रहने वाली एक कवियत्री है, जिसनें अभी अभी पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात में अबु धाबी में चल रहे एक रियलिटी शो " Poets of Millions " में भाग लिया और अपने कविता की साहसी, बोल्ड एवम निर्भय अभिव्यक्ति से ना केवल सेमी फ़ाईनल में जगह बनाई, बल्कि दुनिया की लाखों महिलाओं और पुरुषों को पूरा झंझोडा़ , और नेट्दुनिया में एक तहलका ही मचा दिया.

अमेरिकन आईडल की तर्ज़ पर होने वाले इस रेयलिटी शो में संगीत या गानें की जगह अरबी, बदायुनी जीवनशैली, इतिहास,और संस्कृती पर आधारित काव्य पठन होता है.जिस तरह अमेरिका में रॊक स्टार को जैसी लोकप्रियता मिलती है, वैसी ही अरब दुनिया में कवि या शायरों को मिलती है.

इस स्पर्धा में ये नियम है कि हर शायर को अपनी लिखी हुई शायरी ही पेश करनी होगी.प्रतिभागी का आवाज़, शायरी पेश करने का मुख्तलिफ़ अंदाज़, और अश’आर की अदबी गहराई इस पर मार्क्स मिलते हैं.

इसी प्रतियोगिता के सेमी फ़ाईनल्स में एक महिला को स्टेज पर बुलाया गया, जिसनें सर से पैर तक काला नकाब पेहन रखा था.उसके ढके हुए चेहरे पर नकाब की झिरी से दो शक्तिशाली आंखे ही दिख रही थी, और उसका स्पष्ट , निडर और गरजता आवाज़ जब कविता पाठ करने लगा तो वहां उपस्थित दर्शकों की सैकडों आंखें आश्चर्य और विस्मयता से फ़टी की फ़टी रह गयी.सिर से पैर तक काले कपडे में ढकी हुई इस महिला नें बुर्के की ओट से कठोर प्रतिबंध और फ़तवे लगाने वाली मुल्ला मौलवीयों के कपडे उतारना जो शुरु किये,उससे सारे यू ए ई और संसार में ये संदेश गया कि अरब देश की एक महिला मुस्लिम कवियत्री मौत से बिना डरे अपने शब्दों का हथियार लिये एक जेहाद का प्रण ले लिया है, या यूं कहें , विद्रोह का बिगुल बजा दिया है.

जैसे जैसे उसके पैने शब्द धर्म सत्ता के मद में अंधे ठेकेदारों ,तुगलकी फ़तवे ज़ारी करने वालों,आम आदमी का धर्म के नाम पर अत्याचार करने वालों के लिये कविता की नर्म नाज़ूक और मखमली पैरहन लिये माध्यम से दुनिया में पहुंचे तो अधिकतर महिलाओं का उसे साथ मिला,जैसे उनके मन की भावनाओं की ही वह अभिव्यक्ति थी.

ज़रा देखें -


फ़तवों की आंखों में दिखता है मुझे सैतान,

जो अनुमति को बदल देता है प्रतिबंध में,

एक हैवान, जो सत्य के चेहरे से बुर्का फ़ाडकर अंधेरे में छुप जाता है,

ज़हरीली ,धहकती आवाज़ लिये, क्रूर और अंधा,

कमरबंद से कपडे को पकडने जैसा उसने मृत्यु का परिधान पहन रहा था.....

ये मौत के पैरहन लिये आवाज़ याने आत्मघाती आतंकवादी.


मगर साथ ही कट्टर, धर्मांध व्यक्तियों को ये बात रास नहीं आयी. कई वेबसाईट्स पर हिस्सा को मार डालने की भी धमकीयां दी गयी.मगर हिस्सा नहीं डगमगाई. उसने कहा- मेरी कविता हमेशा ही रही है. धर्म और संस्कृति के नाम पर अनगिनत अरब महिलाओं की आवाज़ दबाने वाली मानसिकता के विरोध में ये मेरी छोटी सी कोशिश है.

कहने की ज़रूरत नहीं कि कि उस शो में निर्णायकों नें हिस्सा के जलते हुए शब्दों और मिले हुए उत्साहपूर्ण प्रतिसाद को देखते हुए उसे फ़ाईनल में पहुंचा दिया है.

फ़ाईनल ३१ मार्च को याने कल होगा. देखते हैं कल क्या होगा? शायद अल्पना जी यू ए ई से हमें इस शो का आंखो देखा हाल सुनवायेंगी, १ अप्रिल को!!

ये विडियो देखें,


Monday, March 8, 2010

Women Access To Education- अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष पर ....


आज अंतराष्ट्रिय महिला दिवस है - ८ मार्च २०१०.

मेरे लिये ये एक खास दिन यूं है, कि दुनिया की आधी आबादी को समर्पित है यह दिन, और मेरा जो भी कुछ वजूद है आज , वह मेरी मां की वजह से है, और मैं इस बात को आज गर्व के साथ महसूस करता हूं, कि पिछले हज़ारों वर्ष से हम अपनी संस्कृति, हमारे मूल्यों और सभ्यता को इतना विकसित पा रहे हैं, वह केवल महिलाओं की वजह से है.

दुनिया की हर मां एक शिक्षिका है, भले ही वह शिक्षित हो या अनपढ़.

लेकिन यह बडा ही दुख का विषय है की आज पूरे विश्व भर में शिक्षा के अनुपात में महिलायें, पुरुषों से पिछडी हुई है. भारत में मात्र ६५% महिलायें शिक्षित हैं,(पुरुष ८०%).

अभी पिछले हफ़्ते, कॊलेज से मेरी पत्नी नेहा का फोन आया कि उसे Indian Institute of Management (IIM, Indore) से आज के दिन महिलाओं की शिक्षा पर बोलने हेतु आमंत्रण दिया गया है,एक शिक्षाविद के तौर पर, तो मैंने तुरंत उसे स्वीकार करने को कहा, हालांकि हमारे बेटे अमोघ की वार्षिक परिक्षा आज ही से शुरु होनी थी,और वह थोडा़ चिंतित थी.

तो उसके लिये जब उसने विषय की तह में जाकर जानकारीयां एकत्रित करना शुरु की और मेरे साथ शेयर करना शुरु किया तो मैं हैरान रह गया!

हालांकि नेहा का पेपर अंग्रेज़ी में पढा गया, मैं उसमें से कुछ जानकारीयां आपके साथ शेयर करना चाहूंगा:

Friends, It is proven fact that presently half of this global population is living in a state of disparity in all Socio-Economic Areas, and is lagging far behind men in terms of economic & political power.

As a civilized society, it is certainly our concern today that without their engagement, empowerment and contribution, we can not hope to effectively meet challenges nor achieve rapid economic Progress in this country. Hence, it should be a commitment from all socio- political & Educational fraternity to plan a suitable strategy to bridge this gap of disparity.

The greatest single factor , which can incredibly improve the status of Women in any Society is EDUCATION.

Low level of Literacy at all levels not only has a negative impact on Women’s lives , but also on their families’ lives. This surely affects the Economical Development of Country.

Incidentally, Education would certainly become a powerful instrument of Social, Economical & Cultural Transformation of our people Men & Women. This will also help accelerating process of Modernization, to cultivate high standards of Living, with Moral & Spiritual Values.

So, when Women gain access to education, they increase their chances of participation in Labour Market, improving health & wellbeing of their families. This will ensure increasing financial independence & participating even in Political System.

This can only happen when women have improved access to Education.


(IIM Director स्वागत करते हुए,सबसे दायें पद्मश्री शालिनी ताई मोघे - उम्र ९७ वर्ष और नेहा सबसे बायें)

इस बात को प्रतिपादित करते हुए कुछ जानकारीयों कों (Facts & Figures) रखा गया और फ़िर इस चुनौती को स्वीकार कर अलग अलग स्तर पर सरकार, शैक्षणिक संस्थाओं, NGOs, एवम अन्य माध्यमों की मदत से ये कैसे सम्भव हो सकेगा उसपर सिलसिलेवार प्रकाश डाला. समापन में...


To conclude, I do not wish to paint a total dark picture here. Women have certainly proved their excellence , intelligence, & leadership in all spheres of Life. Today’s women is a SUPERWOMEN in real senses, and currently occupying TOP POSITIONS in all fields.Today women are more aware of their role and contribution in nation Building, and wish to work hard to raise level of Living Standard of herself and family.

However, it is still not enough and hence through this single point agenda for Women empowerment thru Education, we can achieve our goal for better economic health of family & Nation. This will ensure creation of opportunities in High end jobs significantly , sufficiently backed by educated Work Force of women for overall development of India’s Future.


In other words, educating girls is a Most Important Investment in the world, is how much they give back to their families, society and Nation.


नेहा नें इस विचार गोष्ठी का समापन किया गया संस्कृत के इस श्लोक से:

यत्र नार्यस्तु पुज्यते
रमंते तत्र देवता ...


मुझे याद है, कि आज से कई सालों पहले जब नेहा शादी हो कर हमारे घर आयी थी तो वह B.Pharm. में Gold Medalist थी , और Post Graduation और Ph.D. करना चाहती थी. मगर एक पुरुष की टिपीकल मानसिकता लेकर मैने उससे परिवार की ओर समर्पण चाहा था. उसनें चुपचाप मान भी लिया.

आज इतने सालों बाद देखता हूं,कि कैसे मुझे अकल आयी, (देर आयद दुरुस्त आयद), और मेरे बच्चों और मां पिताजी की सेवा करते हुए कैसे उसनें यह सब किया , और आज मुझे एक साथ शर्म और गौरव का अनुभव करा गयी वह.

मगर अब मैं अगली पोस्ट में ज़िक्र करूंगा, एक बहुत ही बडे विरोधाभास की.

मेरे यहां नेहा के कॊलेज जाने की वजह से अमोघ के लिये एक आया रखी हुई है. अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस पर आज सुबह उसके पति की उसे प्रताडित करने के कारण महिला थाने में पेशी हुई थी. कुछ रोशनी उसकी ज़िंदगी पर, और उससे जुडी हुई मेरी एक दीदी की जीवनी पर जिसनें सन १९७५ में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर काठमांडु भेजे गये सबसे पहले भारतीय महिला दल का नेतृत्व किया था.

कल ही पढियेगा दिलीप के दिल से - पर शायर साहिर पर कुछ यादें...

(चित्र रवि वर्मा- साभार)

Monday, March 1, 2010

भारतीय रेल में सुहाना सफ़र -- मेरे सपनों की रानी -डबल डेकर -कब आयेगी तू?

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दो चार दिनों पहले, दो ख़बरें प्रमुखता से छा गयी थी टी व्ही पर,

एक तो सचिन का एक दिवसीय क्रिकेट में विश्व एक दिवसीय क्रिकेट का पहला दोहरा शतक, और दूसरी ममता दीदी का रेल बजेट.

पहले तो सचिन को लाख लाख बधाईयां. वाकई बहुत ही बढियां काम किया है और देश का नाम रोशन किया है. मगर शाम को अधिकांश न्युज़ चेनलें बस सचिन सचिन चिंघाडती रही और रेल बजेट पर बहस कबाडखाना पहुंचा दी गयी.अब तो उन्हे भारत रत्न की भी शिफ़ारिस हो गयी है.

रेल्वे बजट पर कोई खास गहमा गहमी नहीं रही.

वैसे भी उस बजेट में कोई खास बात तो थी नहीं. बंगाल और सिर्फ़ बंगाल छाया रहा. मन मसोस कर रह गया कि , कभी मेरे इंदौर शहर से चुने हुए प्रकाशचंद्र सेठी रेल्वे मंत्री हो गये थे, और मेरे शहर को बच्चों की झुक झुक गाडी भी नसीब नहीं हुई थी. चलो किस्मत अपनी अपनी.

मगर एक बात मेरे दिमाग में कौंध गयी. ममता नें कई बिज़नेस मोडेल्स सामने रखे,मगर कोर बिज़नेस पर खास प्रभावित नहीं किया.

मैं एक फ़्रीक्वेंट ट्रेवेलर हूं,रेल और हवाई जहाज़ का. ये मानता हूं कि रेल विभाग में कुछ अच्छे परिवर्तन हुए ज़रूर है, और काया परिवर्तन भी हुआ है, मगर ये काफ़ी है?

एक बात कहना चाहूंगा कि रेल को सर्व प्रथम ये तो करना ही चाहिये कि हर रेलगाडी के डब्बे ज़रूर बढायें. अभी परसों मैं हैदराबाद से पूना आ रहा था तो गाडी में एक रिटायर्ड रेल्वे अफ़सर था, जिसनें खुलासा किया कि रेल्वे के पास कुल ११०० रेक्स ही हैं, और वे भी काफ़ी नहीं है.जितने बन रहें है,उससे से ज़्यादह की दरकार है, और अब कुछ बाहर से लाने की बात चल रही थी.

डब्बे बढाने में कोई तकनीकी समस्या नहीं है, बस हमारे अधिकतर स्टेशनों के प्लेटफ़ार्म ही छोटे हैं.

एक बात नें और ध्यान खींचा. कलकता से दिल्ली तक डबल डेकर ट्रेन का भी आश्वासन दिया गया है. ये बात तो बढियां ही है. मगर मुंबई से पूना या सोलापुर/कोल्हापुर चलने वाली सीटिंग वाली डबल डेकर जो दस पंद्रह साल से चल रही थी उसके डिज़ाईन को बेहतर काने की काफ़ी गुंजाईश थी.



मगर मैं जब पिछले साल यूरोप गया था तो २० दिन के प्रवास में १५ दिन सिर्फ़ यू रेल में ही घूमा, ८ देश और ३५ शहर. तो मैंने डबल डेकर का भी सफ़र किया और खूब आनंद भी लिया.मिलान में होटल में जगह नहीं मिली, मगर ट्रेन में कभी रिज़र्वेशन की ज़रूरत नहीं पडी.(ये अलग बात है कि रात को ११ बज़े हम मिलान से रोम की ट्रेन में सवार हो गये, सुबह ७ बज़े रोम के प्लेटफ़ार्म नं ७ पर पहुंचे और ७.३० की गाडी में वापिस प्लेटफ़ार्म नं १४ से बैठ कर १ बजे दोपहर को मिलान पहुंचे-ज़रूरी मीटिंग जो थी)





उसके कुछ चित्र लगा रहा हूं. आप देखेंगे, कि रात की गाडी में दो और चार के केबिन थे, जो हालांकि बडे छोटे थे, मगर
हर केबिन में एक छोटा सा कबर्ड और नल के साथ बेसिन होता था.



कोर्रिडोर से मैं घूमते घूमते जब टॊईलेट पहुंचा तो मेरी आंखे फ़टी की फ़टी रह गयी. विकलांगों के लिये बने उस टाइलेट का साईज़ एक चार बर्थ के केबिन से भी बडा था, और उसमें सभी लक्ज़्युरी की सेवायें उपलब्ध थी.




दिन की डबल डेकर जो वेनिस से निकलते हुए पकडी थी उसमें आरामदायक सीटें मिलीं, और Ist Class और IInd Class की सीटों में कोई खास अंतर नहीं था.(मेरे यु रेल पास में प्रथम श्रेणी का टिकट था, तोभी हम कहीं भी बैठ जाते थे!!!)

आश्चर्य तो तब हुआ जब मैंने लोगों को टाइलेट के नल से पानी पीते हुई देखा!!!







वहां के स्टेशनों का क्या कहना. साफ़ सफ़ाई, और दुकानों की सजावट सभी देखते ही बनती थी. अब ये चित्र देखें- ये स्वीडन के एक छोटे स्टेशन पर एक दुकान का है.




तो चलो , हम भी सर पर रज़ाई या चादर ओढकर सो जायें , और ये खुश नज़ारा देखें, मीठा सपना देखें कि भारत में भी कभी वह दिन आये कि हम भी इन जैसी ट्रेनों मे सफ़र करें, कभी भी स्टेशन पहुंच जायें, बर्थ अवेलेबल!! , टी टी को बर्थ के लिये आगे पीछे नहीं करना पडे़,,सभी ट्रेनें ए सी रहें...

आल इज़ वेल यारों!!

होली की सभी को शुभकामनायें.

एक विडियो देखें.यूरोप की तराईयों में दिली सुकून के लिये भटक रहा था, डबल डेकर के लिये. मिली और बाखुदा, खूब मिली!!! घबराईयेगा नहीं. इस बार मैंने गाना नहीं गाया है!!

मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू?

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