असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीकात्मक दिवस!!
प्रतीकात्मक इसलिए की अब यह बात मात्र प्रतीक के रूप में ही रह गयी है.
आज वह समय आ गया है ,जहाँ सत्य और असत्य की परिभाषाएं एक दूसरे में गड्डमड्ड हो गईं है. जिसे चाहे वो अपने अपने अर्थ लगा कर नमरूद हुआ जा रहा है , सितमगर हुआ जा रहा है. बुद्धिजीवी तर्क या कुतर्क के बल पर चाँद को भी सूरज सिद्ध कराने में धन्य हो रहा है. जो बुद्धिजीवी नही है, वह बावला तो और ही मस्त है. उसे तो चरने के लिए पूरा मैदान खुला है.

आज जब विजया दशमी पर लिखने की सोची तो रावण के किसी अच्छे (?)चित्र को ढूंढने की कवायद शुरू हुई, तब जा कर रावण का उपरोक्त चित्र या कार्टून प्राप्त हुआ. चित्र H.T. से साभार
(जो जानकार नहीं है उन्हें बता दूँ कि चित्र में रावण दायीं तरफ़ है!)
इस चित्र से याद आया कि पिछले दिनों में हमारे प्रदेश में चुनाव का बिगुल बज उठा. ज़ाहिर है कि किसी भी ईंट को उखाडो , दो तीन नेता तो निकल ही आयेंगे. शहर का यह आलम है कि जगह जगह कुकुरमुत्ते की तरह पोस्टर उग आए हैं, जिसमें किसम किसम के नेताओं के फोटू लग रहें हैं. नेता - बड़े ,छोटे, कबर से निकल कर आए हुए, छुटभैये, युवा दिल की धड़कन, युवा सम्राट ( उम्र ६५ साल) सभी.
बिल्ली के भागों छींका टूटा और शहीद भगतसिंग की जयन्ती निकल आई.
फ़िर क्या था, हमारे शहर में जयन्ती मनाने की बाढ़ सी आ गयी. कोंग्रेस ने तो भगतसिंग को पुश्तैनी मिलकियत समझा हुआ है.शहर में गाडी़यों पर पोस्टरों के साथ कान फ़ाड़ू देशभक्ति के तरानों को गाते (?) इन वीरों को देख कर लगा कि हम भी भगतसिंग के साथ शहीद हो जाते तो अच्छा होता , आज का ये दिन तो नही देखना या सुनना पड़ता. भाजपाई भी कमज़ोर नहीं निकले . वे नए शहीदों को तलाश कराने में जुट गये, जिनका भगतसिंग से कोई संबंध कहीं ना कहीं आया हो. आनन फानन में पोस्टरों पर फोटूओं की बरसात होने लगी और पांच साल से लटके हुए सब्र के फल टपकने लगे.
अपने ब्लॉग जगत के पुराने उस्ताद अफलातून जी नें आगाज़ पर छपे भगतसिंग के एक फोटो को मैंने किसी ऐसे ही जलसे में पधारे विधायक जी को दिखा कर पूछा कि " पैचान कौन ? " , तो वो चौंक कर बोल पड़े थे - कोई आतंकवादी है क्या?
अब आया त्योहारों का मौसम. नवदुर्गा , गरबा महोत्सव और दशहरा का घर चल कर आया हुआ चांस. युवक, युवतियों से कहीं ज़्यादा रोमांचित हो उठे ये चुनाववीर !! लगभग सभी गरबा मंडलों पर एक एक ,दो दो नें कब्ज़ा कर लिया. जो बच गए , वे चले गए रावण दहन समिती में. सब जगह फ्लेक्स की कृपा से पोस्टरों पर पोस्टर छपने लगे.पहले चित्र पेंट किए जाते थे तो धोका रहता था, की बनाया तो था सांपनाथ जी का चित्र, बन गया नागनाथ जी का !! जनता तो बेवकूफ थी. ( अब भी है! ) ज़रा चित्र में गलती हुई नही की वोट बैंक खिसक जाता था. ( आज भी खिसकता है) .इसलिए इन खिसके हुए वोटरों के लिए ना जाने क्या क्या पापड़ बेलने पड़ रहे है इन उद्यमशील बन्दों को.वैसे बीच में गांधीजी और शास्त्री जी भी आ कर चले गये, लेकिन इतने सारे कामों की व्यस्तता में वे उपेक्षित ही रह गये. वैसे भी आजकल उनकी प्रासंगिकता है कहां?
मगर ये क्या , सैंकडों रावणों में बेचारे असली रावण का वजूद तो कोने में खिसक गया. रावण की भी तो ज़रूरत है हमें . काला नही होगा तो सफ़ेद को कौन पूछेगा? हर इंसान में तो राम और रावण बसता है. बस ग्रे रंग की स्केल का फरक है. जरूरत है किसी अच्छे डिटर्जेंट की.

आज सरस्वती का दिवस भी है ...!!!
मेरे एक जानकार मित्र नें मुझसे पूछा कि आज के दिन तो हम विजयोत्सव के रूप में मनाते है, जहां शस्त्रों का पूजन होता है. हम सीमोलंघन कर सोना लूट कर लाते है, और बुजुर्गों का आशिर्वाद लेते है.इसमें बुद्धि की देवी सरस्वती का क्या प्रयोजन.
तो मैं कई साल पहले यादों के गलियारे में , अपने बचपन में चला गया.
हमारे पूर्वज करीब दो सौ सालों से इन्दौर के राजघराने होलकर राजवंश के राजगुरु हुआ करते थे.ये होलकर पुणें के पेशवा के सुबेदार थे, और शिन्दे , पवार , गायकवाड़ के समान, इन्दौर ( मालवा ) पर सुबेदारी करते थे.राजगुरु होने की वजह से राज्य में होने वाले सभी धार्मिक कार्य, पूजा अधिष्ठान इत्यादि उनके देखरेख में हुआ करते थे.राज पाट जाने के बाद भी यह चलता रहा, हमारे दादाजी और ताऊजी तक.
उन दिनों बडे़ बड़े त्योहारों पर विशेश उत्सव और आयोजन हुआ करते थे, जैसे दिवाली दशहरा, होली आदि. अनन्त चौदस एवं मोहर्रम आदि पर्वों पर सरकारी झांकी निकला करती थी और सभी धर्मों के लोग उसमें भाग लेते थे. मुझे याद है मोहर्रम के ताज़िये खा़स कर हमारे घर के सामने से गुजरते थे, क्योंकि महाराज की ओर से हमारा परिवार उसकी पूजा करता था.
तो दशहरे के दिन भी शाम को महाराज लाव लश्कर के साथ दशहरा मैदान में जाते थे. वहां शस्त्र पूजन और शमी पूजन करने के बाद रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हुआ करता था.
हम भी बड़े चाव से उस जलूस या शोभायात्रा में हाथी पर बैठ कर शामिल होते थे, और रास्ते में पड़ने वाले इमली के पेड़ों से इमली तोड़ कर खाते थे!!(आजकल इसे रैली कहते है!!)
जब हम वापिस आते थे तो हमारे घर कि स्त्रियां हमारी नज़र उतारती थी, और ’औक्षण" कर आरती उतारती थी. फ़िर हम एक पवित्र स्थान पर शिक्षा की देवी बुद्धि की देवी मां सरस्वती के चित्र के समीप अपने सभी पाठ्यपुस्तकें , कॊपी कलम, या पाटी पेम इत्यादि रख कर उनकी पूजा करते थे.
मैंने एक बार अपने दादाजी से पूछा भी था- नाना, आज जब सभी शस्त्रों की पूजा कर रहे हैं तो हम क्यों अपने पुस्तकों आदि की पूजा कर रहें है?
दादाजी नें बडा़ ही सारगर्भित उत्तर दिया-
"बेटे, हम लोग धर्म और आध्यात्म के सिपाही हैं और सात्विकता के शस्त्रों का वरण करते है- याने शास्त्र! ये शास्त्र, या बुद्धि ही हमारी आराध्य देवता है. राजा एवं उनके सिपाहीयों को प्रजा की रक्षा हेतु राजसिक तत्वों का याने के शस्त्रों का वरण करना धर्म सम्मत है.इसीलिये हम बुद्धि के उपासक आज सरस्वती की आराधना करते है.
एक और बात. आज से २० दिनों बाद लक्ष्मी की पूजा आराधना कर हम अपने उन्नती और खुशहाली का वरदान जब मांगेंगे तब यही बुद्धि हमें सदाचरण का मार्ग पहचानने में हमारी मदत करेगी और उस संपत्ति का सही विनियोग करनें में हमें विवेकहीन बनने से बचायेगी."
मैंने आज भी शाम को अपने बच्चों के साथ पूजा कर अपने पिताजी का आशिर्वाद लिया-
विद्वान सर्वत्र पुज्यते..













