Saturday, February 13, 2010

आल इज़ स्टिल वेल- इजिप्ट में एक्सिडेंट


मुसाफ़िर हूं यारों.. ना घर है ना ठिकाना,
मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना....

जीवन की इस सच्चाई से रूबरू हुआं हूं अभी अभी... जी हां.

पिछले रविवार को अचानक इजिप्ट की राजधानी काइरो या अल-काहिरा जाना पडा, प्रोजेक्ट के सिलसिले में. अब तो आना जाना लगा ही रहेगा, और एक मुसाफ़िर की तरह मैं बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत गाते हुए बंजारे की तरह निकल पडा़.

मगर क्या मालूम था कि किस्मत में कुछ यूं भी लिखा है, कि आप पीछे मुड कर देखें कि जीवन कितना प्रेशियस या कीमती है.सुएज़ शहर से काईरो आते हुए गाडी का ज़बरदस्त एक्सिडेंट हो गया और आपका ये मित्र बच गया. याने बॊटम लाईन यही है कि आल इस स्टिल वेल!!!

हुआ यूं कि इजिप्ट के एक बडे शहर सुएज़ के पास हमारी साईट है, जहां एक फ़ेक्टरी बन रही है, जिसमें मैं वेयरहाऊस इंजीनीरिंग के एक भाग के निर्माण प्रक्रिया के लिये गया हुआ था.सुएज़ शहर सुएज़ केनाल या नहर के लिये विश्व विख्यात है.यहीं से एक मानव निर्मित नहर से बडे बडे जहाज़ रेड समुद्र से मेडिटेरियन समुद्र जाते हैं, और भारत से एक सीधा रास्ता युरोप के लिये खुल जाता है, बजाय साऊथ अफ़्रिका से होकर गुज़रने के.

बात अभी पिछले बुधवार की है.साईट से लौट कर सुएज़ केनाल देखने हम सुएज़ शहर में घुसे, और लौटने लगे काहिरा की ओर, ताकि शाम तक हम काहिरा पहुंच जायें , जहां हम होटल में रुके थे. मेरे साथ कंपनी गेलेक्सी के एक प्रोजेक्ट इंजिनीयर इंचार्ज अविनाश भी थे.

सुएज़ से काहिरा का हाई वे 130 KM का ६ लेन है और इतना बढियां है, कि हर कोई १४०-१६० की स्पीड से गाडी चलाता है.

ज़ाहिर है, शहर छोडते ही ड्राईवह एहमद नें 160 KM/Hr की गति पकड ली, और अगली सीट पर बैठे बैठे मुझे ठंड में भी पसीने छूटने लगे.इसके पहिले पहली बार जब अबु धाबी से दुबई गया था तो 140 की स्पीड अनुभव की थी. मगर सच कहूं, मैंने घबरा कर एहमद से स्पीड कम करने को कहा. उसने थोडी कम ज़रूर की, मगर अचानक सामने एक आर्मी का ट्रक जो जा रहा था उसे कट मारने में चूक हो गयी.पैर ब्रेक की जगह एक्सीलरेटर पर पड गया और हम धडाम से उस ट्रक में घुस गये.

एक ज़ोरदार टक्कर हुई जिससे हमारी गाडी उछल कर ट्रक के पिछवाडे में अटक कर आधा कीलोमीटर घसीटता चला गया. भगवान की कृपा ही समझो, आगे की सीट पर बैठे होने के बावजूद, सीट बेल्ट पहनने की वजह से मुझे उस इम्पॆक्ट का असर कम लगा. मैं उस क्षण से कुछ ही सेकंद पहिले विडियो शूटिंग कर रहा था अपने छोटे केमेरे से, तो थोडा मानसिक रूप से रिफ़्लेक्स की वजह से मैने अपने शरीर को उस आघात के लिये तैयार कर लिया, मगर पीछे बैठे मेरे मित्र अविनाश चूंकि सीट बेल्ट नहीं पहने थे, और थोडा सुस्ता रहे थे, एकदम से अपने आप को सम्हाल नहीं पाये और उन्हे थॊदी ज़्यादह चोट आये. ड्राईवर एहमद के तो पंजे में फ़्रेक्चर हो गया, और सर में चोट आयी.

चूंकि गाडी को ज़्याद क्षति पहुंची और गेट भी जाम हो गये, आर्मी के जवानों ने आनन फ़ानन में हमें गाडी से उठाया. दर्द या शॊक का एहसास भी कुछ मिनीट नही रहा, और जैसे कि हम फ़िल्म देखते हैं , या सपना, मैं अपने आपको और दूसरों को गाडी में से निकालने की मशक्कत को एक त्रयस्थ याने तीसरे शख्स़ की नज़रिये से देख रहा था.

बस , किसी तरह से काहिरा से दूसरी कार मंगवाई, सूरज डूबने चला था.फ़िज़ा में ठंडक और घुलने लगी थी. हम इंदौर से लाये स्वादिष्ट नमकीन खाते हुए, अंदरूनी दर्द के बढते हुए एहसासात लिये हुए काहिरा के एक अस्पताल के लिये रवाना हुए..

संक्षेप में, जिसको राखे सांई, मार सके ना कोई. थोडा़ एक फ़ुट ज़्यादा हो जाता तो कुछ भी हो सकता था. चलो , जान बची ,लाखों पाये. अब आप से फ़िर रू ब रू होते रहेंगे.इंशा अल्लाह!!

इंशा अल्लाह. ताऊ की पहेलीयां बूझेंगे, अल्पना जी के गाने और कवितायें सुनेंगे, लावण्या दीदी के संस्मरण, समीर जी की सिगरेट की पन्नी में लिखी हुई जीवन की सच्चाईयां, अनुराग जी के होस्टल के किस्से, अनुराग शर्माजी के पोडकास्ट, मनीष कुमार के और आवाज़ के सजीव सारथी और सुजॊय के संगीतमय पोस्टें, राज भाटिया जी के जोक्स, यूनुस भाई के मधुर और अनोखे गीत लोकगीत,और जिसका इंतज़ार रहता है.. संजय भाई के संस्मरण और OLD MONK के सारगर्भित कमेंट्स का.. तो फ़िर से अविरत चलते रहेंगे.

आखिर सच ही तो कहा है कि - मुसाफ़िर हूं यारों, ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना...

तो देखिये , उस मंज़र की कुछ झलकियां , जो आपके लिये, अगर समय निकाल सकें तो..




ये पंक्तियां लिखते लिखते समाचार मिला कि पुणे में ओशो अश्रम के पार जर्मन बेकरी में एक आतंकवादी विस्फ़ोट हुआ. मैंने ताबड़तोब पुने फ़ोन लगाया , क्यों कि मेरी पत्नी, बेटी नुपूर और बेटा अमोघ इन दिनों वहीं हैं. पता चला वे कुशल हैं, लेकिन उस समय वे वहां से केवल आधा किलोमीटर दूरी पर थे.

ALL IS STILL WELL!!

Tuesday, February 2, 2010

आल इज वेल !!! - परेशानीयों को कंट्रोल, आल्ट और डिलीट !!!


"आल इज वेल !!!"

हां. इतने दिनों के अंतराल के बाद फ़िर आपसे मुखतिब हूं आपका ये खा़दिम.

पिछली पोस्ट के आसपास ही पिताजी को हार्ट की तकलीफ़ हुई थी और वे आई सी यू में भर्ती हो गये थे. दो हफ़्ते के मशक्कत के बाद फ़िर घर पर स्वास्थ्य लाभ, और अब लगभग दो महिने के भीतर आल इज़ वेल.

धन्यवाद हे ईश्वर!! धन्यवाद आप सभी ब्लोगर परिवार के मित्रों !!!

आज पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि जो भी विरासत में मिला है वह भौतिक रूप में कम ज़्यादा हो सकता है, मगर मानस के आत्मीय और आध्यात्मिक तौर पर जो भी मिला है वह अनमोल है. संस्कार, संस्कृति, साहित्य, संगीत, चित्रकारी, और आध्यात्म, सभी कुछ आज मेरे पिताजी महामहोपाध्याय डॊ. प्रभाकर नारायण कवठेकर की वजह से है. जैसे माता ही सबसे पहली गुरु है, मगर पिता भी .उनके रूप में पिता और बाद में परमपिता परमेश्वर का वजूद हर क्षण हर पल साथ लिये चलता हूं.

उस दिन एक बात बडी़ खास जेहन में ठस के रह गयी थी. जब घर पहुंचा तो पता चला पिताजी को अटेक आया है और अस्पताल ले जाने के लिये एम्ब्युलंस आ रही है. बस , वही क्षण था , १० सेकंद में निर्णय लेना था, कि क्या एम्ब्युलंस के लिये रुका जाये या स्वयं ही चला कर ले चलें... शायद , इतना भी घातक हो सकता था.

अब समझ में आया. बडे बडे प्रोजेक्ट में ऊपर के स्तर पर डिसीशन लेने में और ये निर्णय लेने में ज़मीन आसमान का अंतर है. एम बी ए का पाठ याद किया, सभी ऒप्शन्स को तौला, और सबसे बेहतर पर अमल किया. याने , जो कुछ भी हो जाये , और रुकने से अच्छा है कि खुद ही ले जाऊं.

पिताजी को गाडी में बिठाया, और गाडी अस्पताल की ओर मोडी जो सौभाग्य से बेहद नज़दीक ही था.अपोलो होस्पिटल , जिसकी इमारत करीब २५ साल से भी पहले मैने ही बनाई थी, शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में से था, और मेरा छोटा भाई डा. गिरीश वहीं हार्ट का स्पेशलिस्ट था!!वह कहीं बाहर था और सीधे अस्पताल पहुंचने वाला था .बस एक बार उसे सौंप दूं , तो फ़िर आल मस्ट बी वेल !!

जब गाडी चली तो संयोग से सी डी डेक पर एक गीत बज रहा था.चूंकि राजकपूर जी की जन्म तिथी पास ही थी, आदत के अनुसार मैं राज जी के गाने सुन रहा था. मैं चौंक पडा:

गाना था - हम तो जाते अपने गांव, अपनी राम राम राम....

मैं थंड और गाने के बोल सुन कर ठिठुर सा गया. क्या ये विधाता का संकेत तो नहीं?

मगर पिताजी नें भी जब ये गाना सुना तो मुझ से निश्चयी स्वर में बोले: बंद कर दो ये गाना. मैं कहीं हमेशा के लिये थोडे ही जा रहा हूं. बस दो दिन में वापस आते हैं.

मैं झूटमूट हंस पडा. मगर बाद में रेस्ट्रोस्पेक्ट में देखता हूं तो पाता हूं कि अमूमन , अधिकतर ये उनकी सकारात्मक सोच
या Positive thinking ही तो थी, जो बाद में ३ ईडीयट्स में भी विस्तृत हुई, मेनीफ़ेस्ट हुई.

अब देखता हूं तो पाता हूं कि यही सकारात्मकता ही तो जीवन के ऊबड खाबड रास्ते पर, विषम परिस्थितियों में हमें इस दुख और पीडा के सागर में डूबने से बचाते हैं, और उस पार स्मूथ सेलिंग के साथ तैरने में मदत करते हैं.

वे दिन याद आये जब विक्रम युनिवर्सिटी के कुलपति के तौर पर छात्रों से मुठभेड , अर्जुन सिंग से वैचारिक मतभेद, माम की बीमारी ... यही धनात्मक उर्जा ही तो उन्हे ८७ वर्ष के पार ले आयी है.




फ़िल्म का एक वाक्य था जो बडा ही प्रसिद्ध हुआ - आल इज़ वेल. यह मंत्र वाकई में हमारे सिस्टम में हमारी पीडा़, दुख और परेशानी को बाई पास कर देता है, और हम सामान्य हो जाते हैं.

पिताजी के भी दो वाक्य याद आते है, अब जब ये फ़िल्म देख ली है, और इस के रीफ़रेंस में उनकी महत्ता समझ आयी.

काही विशेष नाही ...(कुछ खास नहीं) और
गम्मत आहे !! ( मज़ा है या बढिया है)

जब भी कोई परेशानी या अडचन आती थी तो वे कह देते थे - काही विशेष नाही याने कुछ खास नहीं. ताकि उसकी ग्रेविटी या सबब थोडा हलका हो जाता था.

फ़िर अंत में बात को खत्म करते हुए वे कहते हैं, गम्मत आहे.. याने मजा है, बढिया है, या फ़िर आल इस वेल!!!

याने उन यादों को कंट्रोल, आल्ट और डिलीट कर दिया, और मन के रेडियो में नया स्टेशन लगा दिया.




क्या कहते हैं आप सभी? बुरी यादों को कट पेस्ट करते रहने से क्या बेहतर नहीं कि हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला जाये (विस्मरण की धुंधलके में-सिगरेट के धुएं में नहीं).

Don't think this is escapism.This is positivity indeed.It is ability to combat weakening forces , win over it, or at least FLOAT !

मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं?

Monday, December 14, 2009

अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी का मज़ाक और २००१ के हमले का आंखो देखा हाल..




ये तो वाकई हद ही हो गयी कि मैंने अपने इस ब्लोग पर पिछले दो पूरे महिनों में कुछ भी पोस्ट नहीं किया.मुआफ़ी चाहूंगा.

अभी परसों सुरेशजी चिपलूणकर की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होनें अपने चिर परिचित अंदाज़ में व्यंग करते हुए २००१ में हुए संसद पर हमले का सरगना मास्टरमाइंड अफ़ज़ल गुरु को बर्थ डे पर विश किया था.

ये वाकई शर्म की बात है कि आज उस दिन को आठ साल हो गये हैं, और हमारी शिखंडी जमात उसे अभी तक फ़ांसी तक नहीं चढा पायी.

शिखण्डी हम इसलिये हैं कि जिसनें हमारे देश के संप्रभुता को चुनौती देते हुए प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंदिर पर हमला करने का षडयंत्र रचने का दुस्साहस किया, उसको फ़ांसी देने के लिये में आप , मैं और करोडो भारतीय बृहन्नलाओं की तरह ताली पीट पीट कर अपने अपने बिल में घुसे हुए ही गुहार मचा रहे हैं, और अफ़ज़ल गुरु जैसा ही और कोई विनाशकारी दिमाग कहीं दूर बैठ कर मुस्कुराते हुए एक नयी योजना बना रहा होगा, बेखौफ़ हो कर, क्योंकि हम जैसों को राष्ट्र भक्ति या राष्ट्राभिमान का जज़बा सिर्फ़ फ़िल्मी गीतों की रिकोर्ड बजा देने से पूरा हो जाता है.

वैसे अफ़ज़ल गुरु से मेरा व्यक्तिगत दुश्मनी का नाता भी है.

एक तो उसने मेरे भारत (Repeat MY INDIA)्की सहिष्णुता का मज़ाक उडाते हुए ये दुस्साहस किया.

दूसरे, आज भाग्य की वजह से मैं आपके सामने ये पोस्ट लिखने को ज़िंदा बचा हुआ हूं, वरना उसके अनुयायी की एक गोली उस दिन दिल्ली के संसद प्रांगण में मेरी समाधी बना चुकी होती.

बात ज़्यादह विस्तार से नहीं लिखूंगा. बस यही कि ऐसी यादें भूलनें के लिये नहीं होती, क्योंकि इससे आपके देश का सन्मान जुडा होता है.

उन दिनों मेरा काम संसद भवन के आहाते में ही बन रहे Parliament Library Project में चल रहा था. मेरी टीम के ५० से भी ज़्यादा आदमी पिहले देड महिनें से रात दिन एक करके लायब्ररी के फ़र्नीचर को असेंबल करने में लगे हुए थे जिसे मैने डिज़ाईन और सप्लाय किया था.

मैं उसी दिन अल सुबह वहां पहुंचा था, क्योंकि प्रधान मंत्री के लिये बनाई हुई टेबल में कुछ बुनियादी बदल करना थे, क्योंकि श्री अटल बिहारी बाजपेयी की घुटनों की तकलीफ़ की वजह से , उस खास डिज़ाईन में उन्हे तकलीफ़ आ रही थे.

मैं जैसे ही लायब्ररी के ६ मंज़िल की भव्य वास्तु (३ मंज़िल गाऊंड लेवल से ऊपर , और तीन बेसमेन्ट ) में जाकर काम का जायज़ा ले ही रहा थे कि अचानक गोलीयों की और मशीनगनों की आवाज़ से हम सभी काम करने वाले चौंक गये. वहां हमारे साथ करीब अलग अलग कंपनीयों के १५०० मज़दूर और २०० अफ़सरान काम कर रहे थे क्योंकि २६ जनवरी को उदघाटन तय था.

पहले तो समज़ ही नहीं पाये कि क्या हो रहा है, क्यों कि अकसर फ़िल्मों में सुनाई देने वाली आवाज़ से ये आवाज़ें अलग ही थी.

मैं भागकर उस हॊल में पहुंचा जहां से संसद का वह VIP GATE दिखाई दे रहा था जहांसे अक्सर प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और अन्य विशिष्ट व्यक्ति आया जाया करते थे.

वहां एक बडा़ सा कांच का खिडकीनुमा पार्टिशन था, जहां से सभी गतिविधियां साफ़ दिखाई पडती थी.

मैं जैसे ही वहां से झांकने का प्रयास कर ही रहा था, दूसरी तरफ़ से याने VIP GATE की तरफ़ से दो गोलीयां कांच से टकराई.कांच अच्छी क्वालिटी का था एक ईंच मोटा, और संयोग ही हुआ कि एक गोली उसे छेदते हुए इस पार निकली और दूसरी छिटक कर रिफ़्लेक्ट हो गई(चूंकि तीखे कोण से आई थी).

बस , जो गोली अंदर आयी उसपे मेरा नाम नहीं लिखा था, और वह सामने दिवार में धंस गयी, और जो पलटी थी वह लगभग बिल्कुल मेरी ओर ही आ सकती थी!!

मैं ताबड़तोब पीछे मुड़कर वापिस हो लिया. मैं और मेरे साथ के सभी मौजूद लोग अब तक ये पूरी तरह से समझ चुके थे कि संसद पर आतंकवादीयों का हमला हो व्हुका है, और अब हमारी भी खैर नहीं.

भय की और मौत की एक थंडी़ लहर मन के किसी कोने से गुज़र गयी. दिमाग काम नहीं कर रहा था कि अब हम अपने आप को कैसे बचायें. हम सभी बाहर की ओर भागने की सोचने लगए, मगर मालूम पडा़ कि बाहर सभी ओर सेना नें परिसर को घेर लिया है, और अब सबसे मेहफ़ूज़ जगह थी यही लायब्ररी की भव्य इमारत.

मैंने और मेरे मातहत इंजीनीयरों/सहायकों नें तुरंत ही अपन आदमीयों को समेटा और बेसमेन्ट नं. १ में स्थित हमें एलॊट किये गये कमरे में जाकर बैठ गये.(यहां अभी तक दरवाज़े नहीं लगाये गये थे). आप अंदाज़ा लगा सकते हैं हमारी मनस्थिति का, कि एक सामूहिक भय का और अफ़वाहों का वातावरण बन गया था, और लगातार ये आशंका व्यक्त की जा रही थी,कि आतंकवादी बडी संख्या में थे और अब वे हमारी बिल्डींग में घुसने वाले ही थे.

तभी हमने अपने बेसमेंट के कमरे की छोटे से रोशनदान से देखा कि कैसे हमारे ज़ांबाज़ सिपाही आतंकवादीयों से लोहा ले रहे थे. एक बार तो हमारे सामने एक सिपाही कवर में से एकदम बाहर निकला.शायद उसनें किसी आतंकवादी को देख लिया था,जो उस द्वार के ऊपर की छत पर छिपा हुआ था.

मगर उससे पहले आतंकवादी नें खडे हो कर उस सिपाही को शूट कर दिया. हम असहाय से , उसे चिल्ला चिल्ला कर आगाह करने लगे, जैसे कि हमारी आवाज़ उस तक पहुंच रही होगी. हम तो सिनेमाहॊल में मूव्ही देख रहे उस दर्शकों की तरह से ये सब देख रहे थे,एक मायाजाल के वर्च्युअल जगत में स्लो मोशन में फ़टी फ़टी आंखों से देख रहे थे ये नज़ारा.वक्त जैसे ठहर ही गया था.

मगर बाद में पता चला कि उस सिपाही नें गोली लगने के बावजूद अपनी राईफ़ल से उस आतंकवादी को निशाना लगाकर मार गिराया और खुद शहीद हो गया. शायद ये सिपाही शहीद नानकचंद था, जिसने देशभक्ति के और कर्तव्यपूर्ति के उस जज़बे की वजह से अपनी जान दे दी.

फ़िर एक लंबी खामोशी छा गयी. भय और बढ गया, क्योंकि यूं लगने लगा कि शायद अब आतंकवादी भाग रहे थे, और शायद यह नई निर्माणाधीन भवन छिपने या भागने के लिये बेहतर होगा. बीच में ये भी सुना कि उन्होनें किसी VIP को भी बंधक बना लिया है.

मौत की आहट की उस खामोशी को तोडते हुए कुछ लोगों की भागते हुए बेसमेंट में आने की आहट होने लगी.यह भवन इतना बडा था कि अब तक हमें उसके सभी रास्तों और सीढीयों का पता हो गया था. तब मुझे याद आया कि बेसमेंट नं. २ में नीचे कुछ कमरे ऐसे भी थे जहां दरवाज़े लग चुके थे और कहीं अस्थाई ताले भी लगा दिये थे.

मैं अपने साथ कुछ लोगों को लेकर नीचे की ओर भागा.मगर रास्ते में ही हमें कुछ दस बारह लोगों की भीड दिखाई दी ,जो और नीचे की ओर जा रही थी.

पहले तो हम ठिटक कर खडे हो गये , कि शायद आतंकवादी तो नहीं. मगर बाद में पता चला कि बिहार के कुछ बाहुबली सांसद उस तरफ़ से भाग कर यहां छिपने के लिये आ गये थे. बडा ही अजीब नज़ारा था कि ऐसे रौबिले और स्वयं आतंकवादी की शक्ल वाले ये माफ़िया के गुंडे लठैत संस्कृति के नुमाईंदे, जिन्होने अपने अपराधी इतिहास के बावजूद, गुंडा राजनिती के बल पर चुनाव जीत कर संसद में आ गये थे, मेरे सामने थर थर कांप रहे थे मौत के भय से. एक पहलवान नुमा सांसद का तो पजामा तक गीला हो गया था. उसनें मुझे देख कर हाथ पैर जोड़ कर मुझसे दया याचना की भीख मांगने लगा जैसे कि मैं ही कोई आतंकवादी हूं. फ़िर दूसरे नें स्थिति भापकर मुझसे बिनती की कि उन्हे तहखाने में कहीं किसी अंधेरे कमरे में बंद कर दें और बाहर से ताला लगा दें. दूसरे नें साथ में और ये जोड दिया कि ताले की चाबी कहीं अंधेरे में फ़ेंक दे!!

मैं ठगा सा विधि का विधान देख रहा था. एक वह सिपाही था , जो अपनी जान तक कुर्बान कर गया, और दूसरे जान से डरके थर थर कांपने वाले ये सांसद हैं, जिनके लिये उसनें अपनी जान दी.

खैर, मौत का खौफ़ शहादत से ऊपर चढ़ कर बोलता है. हम सभी दूसरे नीचे के तल के बेसमेंट में चले गये और करीब चार बजे तक छोटे कमरों में छुपे रहे. बाद में जब हमारे एक साथी नें ऊपर जाकर वस्तुस्थिति का पता किया (BRAVE) तब जाकर हम सभी बाह्र निकले. मगर हमारे बहादुर साथीयों नें(सांसद) फ़िर भी ऊपर जाने से मना किया, और स्वयं नज़मा हेपतुल्ला जी आयीं और उन्हे बाहर निकाला.

क्या विरोधाभास और मज़ाक नही है, कि आज आठ साल के बाद भी अफ़ज़ल गुरु , जिसे हमारे न्यायालय ने बाकायदा न्याय प्रक्रिया के तेहत दोषी करा देते हुए फ़ांसी की सज़ा मुकर्रर की , उसे अभी तक किसी ना किसी खोखले तर्क के बिना पर ज़िंदगी मुहैय्या कराई जा रही है. ये उन्शहीदों और सच्चे देशभक्त लोगों की शहादत का मज़ाक है, और हम सभी उसे समझ कर भी कर्महीनता के कारण चुप बैठे है.

पता चला है कि कोई श्री राधा रंजन नें Hang Afazal Guru के नाम से ओनलाईन हस्ताक्षर अभियान चला रखा है,और अब तक १४०० लोगों ने उसपर समर्थन दिया है. मगर दुख की या शर्म की बात ये भी है कि किसी तथाकथित मानव अधिकार संगठन नें Justice for Afazal Guru नाम से समानांतर अभियान चला रखा है नेट पर, और उसपर १६६६ लोग अपना नाम दर्ज़ करा चुके हैं.

याने यहां भी हमारी हार?

क्या आप मुझसे सेहमत हैं?

क्या आप नहीं चाहेंगे कि हम सभी ब्लोगर दुनिया के भाई और बेहनों को नही चाइये कि हम अपना विरोध दर्ज़ करायें और एक सामाजिक चेतना में अपना भी सहभाग दें?
http://www.petitiononline.com/hmag1234/petition.html

Sunday, December 13, 2009

अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी का मज़ाक और २००१ के हमले का आंखो देखा हाल..




ये तो वाकई हद ही हो गयी कि मैंने अपने इस ब्लोग पर पिछले दो पूरे महिनों में कुछ भी पोस्ट नहीं किया.मुआफ़ी चाहूंगा.

अभी परसों सुरेशजी चिपलूणकर की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होनें अपने चिर परिचित अंदाज़ में व्यंग करते हुए २००१ में हुए संसद पर हमले का सरगना मास्टरमाइंड अफ़ज़ल गुरु को बर्थ डे पर विश किया था.

ये वाकई शर्म की बात है कि आज उस दिन को आठ साल हो गये हैं, और हमारी शिखंडी जमात उसे अभी तक फ़ांसी तक नहीं चढा पायी.

शिखण्डी हम इसलिये हैं कि जिसनें हमारे देश के संप्रभुता को चुनौती देते हुए प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंदिर पर हमला करने का षडयंत्र रचने का दुस्साहस किया, उसको फ़ांसी देने के लिये में आप , मैं और करोडो भारतीय बृहन्नलाओं की तरह ताली पीट पीट कर अपने अपने बिल में घुसे हुए ही गुहार मचा रहे हैं, और अफ़ज़ल गुरु जैसा ही और कोई विनाशकारी दिमाग कहीं दूर बैठ कर मुस्कुराते हुए एक नयी योजना बना रहा होगा, बेखौफ़ हो कर, क्योंकि हम जैसों को राष्ट्र भक्ति या राष्ट्राभिमान का जज़बा सिर्फ़ फ़िल्मी गीतों की रिकोर्ड बजा देने से पूरा हो जाता है.

वैसे अफ़ज़ल गुरु से मेरा व्यक्तिगत दुश्मनी का नाता भी है.

एक तो उसने मेरे भारत (Repeat MY INDIA)्की सहिष्णुता का मज़ाक उडाते हुए ये दुस्साहस किया.

दूसरे, आज भाग्य की वजह से मैं आपके सामने ये पोस्ट लिखने को ज़िंदा बचा हुआ हूं, वरना उसके अनुयायी की एक गोली उस दिन दिल्ली के संसद प्रांगण में मेरी समाधी बना चुकी होती.

बात ज़्यादह विस्तार से नहीं लिखूंगा. बस यही कि ऐसी यादें भूलनें के लिये नहीं होती, क्योंकि इससे आपके देश का सन्मान जुडा होता है.

उन दिनों मेरा काम संसद भवन के आहाते में ही बन रहे Parliament Library Project में चल रहा था. मेरी टीम के ५० से भी ज़्यादा आदमी पिहले देड महिनें से रात दिन एक करके लायब्ररी के फ़र्नीचर को असेंबल करने में लगे हुए थे जिसे मैने डिज़ाईन और सप्लाय किया था.

मैं उसी दिन अल सुबह वहां पहुंचा था, क्योंकि प्रधान मंत्री के लिये बनाई हुई टेबल में कुछ बुनियादी बदल करना थे, क्योंकि श्री अटल बिहारी बाजपेयी की घुटनों की तकलीफ़ की वजह से , उस खास डिज़ाईन में उन्हे तकलीफ़ आ रही थे.

मैं जैसे ही लायब्ररी के ६ मंज़िल की भव्य वास्तु (३ मंज़िल गाऊंड लेवल से ऊपर , और तीन बेसमेन्ट ) में जाकर काम का जायज़ा ले ही रहा थे कि अचानक गोलीयों की और मशीनगनों की आवाज़ से हम सभी काम करने वाले चौंक गये. वहां हमारे साथ करीब अलग अलग कंपनीयों के १५०० मज़दूर और २०० अफ़सरान काम कर रहे थे क्योंकि २६ जनवरी को उदघाटन तय था.

पहले तो समज़ ही नहीं पाये कि क्या हो रहा है, क्यों कि अकसर फ़िल्मों में सुनाई देने वाली आवाज़ से ये आवाज़ें अलग ही थी.

मैं भागकर उस हॊल में पहुंचा जहां से संसद का वह VIP GATE दिखाई दे रहा था जहांसे अक्सर प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और अन्य विशिष्ट व्यक्ति आया जाया करते थे.

वहां एक बडा़ सा कांच का खिडकीनुमा पार्टिशन था, जहां से सभी गतिविधियां साफ़ दिखाई पडती थी.

मैं जैसे ही वहां से झांकने का प्रयास कर ही रहा था, दूसरी तरफ़ से याने VIP GATE की तरफ़ से दो गोलीयां कांच से टकराई.कांच अच्छी क्वालिटी का था एक ईंच मोटा, और संयोग ही हुआ कि एक गोली उसे छेदते हुए इस पार निकली और दूसरी छिटक कर रिफ़्लेक्ट हो गई(चूंकि तीखे कोण से आई थी).

बस , जो गोली अंदर आयी उसपे मेरा नाम नहीं लिखा था, और वह सामने दिवार में धंस गयी, और जो पलटी थी वह लगभग बिल्कुल मेरी ओर ही आ सकती थी!!

मैं ताबड़तोब पीछे मुड़कर वापिस हो लिया. मैं और मेरे साथ के सभी मौजूद लोग अब तक ये पूरी तरह से समझ चुके थे कि संसद पर आतंकवादीयों का हमला हो व्हुका है, और अब हमारी भी खैर नहीं.

भय की और मौत की एक थंडी़ लहर मन के किसी कोने से गुज़र गयी. दिमाग काम नहीं कर रहा था कि अब हम अपने आप को कैसे बचायें. हम सभी बाहर की ओर भागने की सोचने लगए, मगर मालूम पडा़ कि बाहर सभी ओर सेना नें परिसर को घेर लिया है, और अब सबसे मेहफ़ूज़ जगह थी यही लायब्ररी की भव्य इमारत.

मैंने और मेरे मातहत इंजीनीयरों/सहायकों नें तुरंत ही अपन आदमीयों को समेटा और बेसमेन्ट नं. १ में स्थित हमें एलॊट किये गये कमरे में जाकर बैठ गये.(यहां अभी तक दरवाज़े नहीं लगाये गये थे). आप अंदाज़ा लगा सकते हैं हमारी मनस्थिति का, कि एक सामूहिक भय का और अफ़वाहों का वातावरण बन गया था, और लगातार ये आशंका व्यक्त की जा रही थी,कि आतंकवादी बडी संख्या में थे और अब वे हमारी बिल्डींग में घुसने वाले ही थे.

तभी हमने अपने बेसमेंट के कमरे की छोटे से रोशनदान से देखा कि कैसे हमारे ज़ांबाज़ सिपाही आतंकवादीयों से लोहा ले रहे थे. एक बार तो हमारे सामने एक सिपाही कवर में से एकदम बाहर निकला.शायद उसनें किसी आतंकवादी को देख लिया था,जो उस द्वार के ऊपर की छत पर छिपा हुआ था.

मगर उससे पहले आतंकवादी नें खडे हो कर उस सिपाही को शूट कर दिया. हम असहाय से , उसे चिल्ला चिल्ला कर आगाह करने लगे, जैसे कि हमारी आवाज़ उस तक पहुंच रही होगी. हम तो सिनेमाहॊल में मूव्ही देख रहे उस दर्शकों की तरह से ये सब देख रहे थे,एक मायाजाल के वर्च्युअल जगत में स्लो मोशन में फ़टी फ़टी आंखों से देख रहे थे ये नज़ारा.वक्त जैसे ठहर ही गया था.

मगर बाद में पता चला कि उस सिपाही नें गोली लगने के बावजूद अपनी राईफ़ल से उस आतंकवादी को निशाना लगाकर मार गिराया और खुद शहीद हो गया. शायद ये सिपाही शहीद नानकचंद था, जिसने देशभक्ति के और कर्तव्यपूर्ति के उस जज़बे की वजह से अपनी जान दे दी.

फ़िर एक लंबी खामोशी छा गयी. भय और बढ गया, क्योंकि यूं लगने लगा कि शायद अब आतंकवादी भाग रहे थे, और शायद यह नई निर्माणाधीन भवन छिपने या भागने के लिये बेहतर होगा. बीच में ये भी सुना कि उन्होनें किसी VIP को भी बंधक बना लिया है.

मौत की आहट की उस खामोशी को तोडते हुए कुछ लोगों की भागते हुए बेसमेंट में आने की आहट होने लगी.यह भवन इतना बडा था कि अब तक हमें उसके सभी रास्तों और सीढीयों का पता हो गया था. तब मुझे याद आया कि बेसमेंट नं. २ में नीचे कुछ कमरे ऐसे भी थे जहां दरवाज़े लग चुके थे और कहीं अस्थाई ताले भी लगा दिये थे.

मैं अपने साथ कुछ लोगों को लेकर नीचे की ओर भागा.मगर रास्ते में ही हमें कुछ दस बारह लोगों की भीड दिखाई दी ,जो और नीचे की ओर जा रही थी.

पहले तो हम ठिटक कर खडे हो गये , कि शायद आतंकवादी तो नहीं. मगर बाद में पता चला कि बिहार के कुछ बाहुबली सांसद उस तरफ़ से भाग कर यहां छिपने के लिये आ गये थे. बडा ही अजीब नज़ारा था कि ऐसे रौबिले और स्वयं आतंकवादी की शक्ल वाले ये माफ़िया के गुंडे लठैत संस्कृति के नुमाईंदे, जिन्होने अपने अपराधी इतिहास के बावजूद, गुंडा राजनिती के बल पर चुनाव जीत कर संसद में आ गये थे, मेरे सामने थर थर कांप रहे थे मौत के भय से. एक पहलवान नुमा सांसद का तो पजामा तक गीला हो गया था. उसनें मुझे देख कर हाथ पैर जोड़ कर मुझसे दया याचना की भीख मांगने लगा जैसे कि मैं ही कोई आतंकवादी हूं. फ़िर दूसरे नें स्थिति भापकर मुझसे बिनती की कि उन्हे तहखाने में कहीं किसी अंधेरे कमरे में बंद कर दें और बाहर से ताला लगा दें. दूसरे नें साथ में और ये जोड दिया कि ताले की चाबी कहीं अंधेरे में फ़ेंक दे!!

मैं ठगा सा विधि का विधान देख रहा था. एक वह सिपाही था , जो अपनी जान तक कुर्बान कर गया, और दूसरे जान से डरके थर थर कांपने वाले ये सांसद हैं, जिनके लिये उसनें अपनी जान दी.

खैर, मौत का खौफ़ शहादत से ऊपर चढ़ कर बोलता है. हम सभी दूसरे नीचे के तल के बेसमेंट में चले गये और करीब चार बजे तक छोटे कमरों में छुपे रहे. बाद में जब हमारे एक साथी नें ऊपर जाकर वस्तुस्थिति का पता किया (BRAVE) तब जाकर हम सभी बाह्र निकले. मगर हमारे बहादुर साथीयों नें(सांसद) फ़िर भी ऊपर जाने से मना किया, और स्वयं नज़मा हेपतुल्ला जी आयीं और उन्हे बाहर निकाला.

क्या विरोधाभास और मज़ाक नही है, कि आज आठ साल के बाद भी अफ़ज़ल गुरु , जिसे हमारे न्यायालय ने बाकायदा न्याय प्रक्रिया के तेहत दोषी करा देते हुए फ़ांसी की सज़ा मुकर्रर की , उसे अभी तक किसी ना किसी खोखले तर्क के बिना पर ज़िंदगी मुहैय्या कराई जा रही है. ये उन्शहीदों और सच्चे देशभक्त लोगों की शहादत का मज़ाक है, और हम सभी उसे समझ कर भी कर्महीनता के कारण चुप बैठे है.

पता चला है कि कोई श्री राधा रंजन नें Hang Afazal Guru के नाम से ओनलाईन हस्ताक्षर अभियान चला रखा है,और अब तक १४०० लोगों ने उसपर समर्थन दिया है. मगर दुख की या शर्म की बात ये भी है कि किसी तथाकथित मानव अधिकार संगठन नें Justice for Afazal Guru नाम से समानांतर अभियान चला रखा है नेट पर, और उसपर १६६६ लोग अपना नाम दर्ज़ करा चुके हैं.

याने यहां भी हमारी हार?

क्या आप मुझसे सेहमत हैं?

क्या आप नहीं चाहेंगे कि हम सभी ब्लोगर दुनिया के भाई और बेहनों को नही चाइये कि हम अपना विरोध दर्ज़ करायें और एक सामाजिक चेतना में अपना भी सहभाग दें?
http://www.petitiononline.com/hmag1234/petition.html

Thursday, October 8, 2009

मन रे तू काहे ना धीर धरे..... करवा चौथ-- बनाम सातवां जन्म


नहीं, मैं यहां आपको ये गीत नहीं सुनवा रहा हूं. ना ही अपनी आवाज़ में , ना ही रफ़ी जी के स्वार्गिक स्वर में.मैं तो आज बडा ही खुश हूं , मूड में हूं , क्योंकि आज का दिन बडा ही भाग्यशाली दिन है,जो पूरा खुशनुमा गुज़रता है, और पत्नी की तरफ़ से कोई रिस्क नहीं होती.

जी हां,आज करवा चौथ के व्रत का पावन दिन है. आपको मालूम ही है कि आज के दिन उत्तर भारत में पत्नीयां अपने (अपने) पति की लंबी उमर के लिये व्रत रखती हैं, दिन भर उपवास रखती हैं, और रात को चंद्रमा को देखकर ही व्रत तोडती हैं.

मगर हमारे यहां महाराष्ट्रीय परिवार में करवा चौथ नहीं मनाया जाता.

इसलिये हमारी एक मात्र पत्नी डॊ. नेहा नें जब आज मुझसे सुबह यह बताया कि वह भी आज व्रत में उपवास रख रही है, तो मैं हैरान हो गया.मगर उन्होने बाद में स्पष्टिकरण दिया कि आज संकष्टि चतुर्थी है और इस बार से वह हर महिने यह व्रत रखा करेगी.

मैंने चैन की सांस ली. चूंकि हमारे यहां हरतालिका का व्रत रखती हैं पत्नीयां जो करवा चौथ से बहुत ज़्यादा कडा होता है.एक रात पहले के डिनर के बाद पूरा दिन और रात बारह बजे तक कोई अन्न या जल तक नहीं लेती.जबकि सुना है, कि करवा चौथ में सुबह उठ कर पहले कुछ खा लिया जाता है, और शाम को चांद को देखकर व्रत तोडा जाता है.

वैसे हमारे देश में यह बात बडे महत्वपूर्ण और असर के साथ कही जाती है, कि हर पत्नी सात जन्मों के लिये एक ही पति की कामना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती है, और व्रत रखती है.

अब बताईये ,मेरे मित्र की पत्नी का एक SMS नेहा को आया था जो जंच गया अपुन को, कि पत्नीयां इसलिये हर जन्म उसी पति को ईश्वर से मांगती हैं , क्योंकि अगले जनम में पति पर इस जनम की गई उसकी मेहनत बेकार नहीं चली जाये!!!(सात जनम तो लगेंगे ही एक अदद पति को पूरी तरह से ’सुधरने’ को!!!)

इसीलिये मैंने पत्नी को इस बार भी आश्वासन दिया( हमेशा की तरह ) कि इस साल तो मैं सुधर कर दिखाऊंगा. मगर पत्नी सिर्फ़ हंस दी. गोया , ना मैं सुधरूंगा, और ना ही अगले जनम की बर्थ पक्की.

वैसे नेहा अपने उस मित्र से फोन पर कह थी कि यह जनम आखरी है.याने सातवां!!!!!

याने , इसका क्या मतलब हुआ?

याने अपन पूरे सुधर गये है?
या
अपने में अब सुधरने का कोई चांस नही रहा?
या
जो भी हो, अब बहुत हुआ.नई घोडी(या नया घोडा) नया दाम ?
या
क्या आपको ही सेंस ओफ़ ह्युमर है?, हम मज़ाक नहीं कर सकते?(इति-पत्नी)

वैसे अब ये गीत कहां तक सार्थक होता है - और किसके लिये -(मेरे या पत्नी के लिये) कि मन रे तू काहे ना धीर धरे- बस ये तो सातवां जन्म है!!!

अब बताईये , अगर कोई चेनल वाला आ गया और मुझसे पूछ बैठा कि आपकी क्या रियेक्शन है? तो मैं क्या जवाब दूंगा?

Friday, September 18, 2009

डेंग्यु बनाम वाईरल फ़्ल्यु


अंत भला तो सब भला.

बिटिया भी चंगी हो गयी और अपन भी.

दरसल स्वाईन फ़्यु के चक्कर में मीडीया इतनी व्यस्त हो गयी है कि घबराहट ज़्यादा हो रही है, मौतों के बनिस्बत.

ये चित्र मेरी बडी बेटी नूपुर नें पुणें से भेजी है, एक शादी का विचित्र किंतु सत्य चित्र. सत्य यूं कि पूणें में भी हास्य बोध की कमी नहीं है.

वैसे मानसी को डेंग्यु हुआ था और मुझे वाईरल फ़्ल्यु, मगर दोनों में लक्षण एक होने के बावजूद डेंग्यु घातक है, क्योंकि उसमें खून में प्लेटलेट्स की मात्रा काफ़ी कम हो जाती है, और रक्त स्त्राव शुरु हो जाता है, जो कि जानलेवा भी हो सकता है.
इंदौर में इस समय हर १० में से ३ व्यक्ति डेंग्यु या वाईरल से पीडीत है( डेंग्यु की मोर्टेलिटी रेट ५% है जबकि स्वाईन फ़्यु का १%)

मेरे मित्र के बेटे का केस इतना बिगडा कि रातो रात मुम्बई लीलावती हस्पताल में भरती करना पडा.वहां पता चला कि चूंकि बदन दर्द की वजह से एनल्जेसिक गोली दी गयी थी उसने प्लेटलेट्स और भी खतरनाक स्तर तक कम कर दिये.बिटिया को भी गलती या अनजाने में मैने भी यही गोली दी थी, मगर मालूम होते ही स्वयं को दूर रखा, पीडा के गहरे एहसास के बावजूद.

अब पता चला है, कि भारत में अन्य शहरों में भी यही बुखार फ़ैल रहा है, जिसे मीडीया ने अधिक तवज्जो नहीं दी है, जो ठीक ही है.

भगवान ना करे, किसी को ये बुखार हो, मगर ये पोस्ट लिखने का मुख्य उद्देश्य ये ही है, कि अगर हड्डी तोड दर्द के साथ बुखार आये तो प्लेटलेट्स का ध्यान रखें , और एनल्जेसिक गोली से या अस्प्रिन से एकदम परहेज करें.....(डॊ. की सलाहनुसार)

Tuesday, September 15, 2009

हिंदी डे के ग्रेट ऒकेज़न पर आपसे रिक्वेस्ट


आपमें से कई ब्लॊगर्स जानते ही होंगे कि कल हिंदी डे था.

कल वैसे मैं ज़्यादा ही बीज़ी था , क्योंकि एक दम से मुझे भी फ़ीवर आ गया था.ऊपर से मेरे दोनों लेपटॊप मेंटेनेंस में,याने करेला और नीम चढा. मगर आई लव हिंदी, इसलिये मेरी बडी डिज़ायर थी कि हिंदी पर कुछ लिखूं.इसीलिये आज लेपटॊप आते ही ये राईट अप.वाईफ़ पहले से दो पेशंट्स से डिस्टर्ब थी और अब १०२ टेंपरेचर में मेरा पोस्ट लिखना कुछ टू मच ही हो गया.मगर मेरे हिडी सोरी हिंदी प्रेम नें मुझे मोटीवेट किया और मिसेस के ऒब्जेक्शन के बावजूद लिखने बैठ गया.

अब आप से क्या छुपाऊं.एक्च्युअली मेरा हिंदी प्रेम तो पूरे वर्ल्ड में फ़ेमस है.मैं जब भी हिंदी बोलता हूं तो ये काफ़ी ट्राई करता हूं कि सिर्फ़ हिंदी के ही वर्ड्स बोलूं, और साथ में राईटिंग में जब भी मैं कोई सेंटेंस लिखता हूं तो मेरी कोशिश होती है, कि इंग्लिश का युज़ ना करूं.

दर असल, हमें अपनी मातृ भाषा पर प्राईड होना चाहिये. यह मात्र भाषा नहीं , लेकिन मदर टंग है हमारी.

इसलिये आप सभी से मेरा रिक्वेस्ट है कि जहां तक हो सकें हिंदी को अपलिफ़्ट करें, और उसके सामने इंग्लिश को कही भी इम्पोर्टेंस ना दें. ये कोई डिफ़िकल्ट नहीं है,बडा ही ईज़ी है.बस आपके माइंड में आप डिसाईड कर लें तो ये कोई इम्पोसिबल नही हैं.

तो आप सब मुझे प्रोमिस करें कि सभी मिलकर इस ग्रेट ऒकेज़न पर याने हिंदी डे पर हम हिन्दी को और इसके कल्चर को , लिट्रेचर को सपोर्ट करें ताकि एक दिन हम गर्व के साथ कह सकें कि हिंदी है हम, हिंदी हैं हम,हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा.....


क्या आप मेरे लॊजिक और फिलॊसॊफ़ी से एग्री करतें है?
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