Monday, May 4, 2009

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक के प्रमाण - २

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक (रविवार , ४ डिसेंबर ,७३२३ ई.सन पूर्व ) के प्रमाणों के लिये पिछली पोस्ट पर मैंने ज़िक्र किया था ३ प्रमुख प्रमाणों का, जिसमें पहला था –पुरातात्विक प्रमाण, दूसरा था साहित्यिक प्रमाण, और तीसरा था ज्योतिषीय एवम खगोलीय प्रमाण.

कृपया यहां पढें...

मैं बडा़ ही शर्मसार हूं, वादाशिकन भी, कि आपकी उत्कंठा के विपरीत इतने दिनों नेट से अनुपस्थित रहा और आगे इस महत्वपूर्ण एवम रोचक विषय पर आगे कुछ नही लिख सका. कारोबारी सिलसिले में इन दिनों बाहर ही हूं अधिकतर, जिससे, इतने गंभीर मसले पर हल्का फ़ुल्का लिख पाना मुनासिब नही समझता. मुझे यकीं है कि आप मुझे मुआफ़ करेंगे.कोशिश करूंगा कि इस बार देर नही होगी…….
१. पुरातात्विक प्रमाण:

हमने पिछली कडी में पढा कि दुर्भाग्य से हमें राम के जीवन काल पर कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिल पाये. मगर जैसा कि हमारे ब्लोगर        श्री पी एन सुब्रमन्यन नें सही लिखा है, कि दर असल आज जिस जगह हम अयोध्या मान कर चल रहें है, वहां मूल अयोध्या है ही नही. वह कही और ही आस पास होनी चाहिये.

बाकि अन्य राम को आस्था का विषय तो मानते हीं है, मगर कुछ  उनके ऐतिहासिक वजूद को मानने में पूर्ण तयः निश्चित नहीं हैं. अब हम देखें कि अन्य क्या तर्क दिये जा सकते हैं , जिससे हम इस बात की संपूर्ण पुष्टि कर लें.

ramaइसलिये इस लेख के प्रारंभ में मैं ये स्पष्ट  कर दूं , कि मेरा ये निश्चित मत है कि श्री राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे जिन्होने इस भारत वर्ष की पावन धरती पर सांस ली थी. अतः, उनके ईश्वरत्व और आस्था के परे जाकर अभी तो हम उन्हे एक पुरुषोत्तम महामानव की दृष्टि से ही देखेंगे. मेरी राय से इत्तेफ़ाक नही रखने वालों से विनम्र निवेदन है, कि जैसा कि शास्त्रार्थ का नियम है, अपने मत और तर्क बुद्धिमत्ता, विवेक, और ग्यान के धरातल पर जांच कर ही रखें तो इस विषय को सार्थक और नयी दिशा मिलेगी. दूसरी बात ये भी है, कि यहां जो भी लिखा जा रहा है, मूल कंटेंट में काफ़ी विस्तार से विवेचना उपलब्ध है, मगर मूल भावना को ही यहां रेखांकित किया जा रहा है.
२. साहित्यिक प्रमाण :

भारत में किसी  ऐतिहासिक महापुरुष या साहित्य कृति का सही काल निर्णय करना बडी ही कठिण समस्या है. वह इसलिये कि बडे़ बडे़ ग्रंथ, ऋचायें, महागाथायें, और पोथियां हमारे स्वयंसिद्ध ऋषियों नें लिख कर अगली पीढी को सौंपी है, उसमें उन्होने कभी भी ये गर्वोक्ति नही की हैं कि फ़लां काव्य मैने लिखा है. परमेश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्य  मानकर किये गये कार्य की भावना के कारण हमें वेदों , उपनिषदों तक के लेखकों के नाम नहीं मिलते. इसलिये ही हमें ये देखना पडता हैं, कि प्रस्तुत विषय पर किस ग्रंथ में कहां क्या क्या संदर्भ है, जिससे बेहद हद तक अनुमान की बजाय निष्चित किया जा सकता है. 
vrhd
इस बात में संदेह नहीं कि  वाल्मिकी रामायण वह ग्रंथ है, जो कि  महाकवि ऋषि वाल्मिकी नें लिखा है जो स्वयं  श्री राम के तत्कालीन थे, और उनके जीवन काल में ही यह सभी घटनाक्रम घटा था. अतः , इस महा गाथा को एक प्रामाणिक या Authentic  सूत्र माना जा सकता हैं. अतः , जहां जहां भी इस ग्रंथ का, या वाल्मिकी ऋषि का संदर्भ आयेगा और उसी तरह श्री राम का या उनसे जुडी घटनाओं का या पात्रों का ज़िक्र कहीं आयेगा तो निष्चित ही रामायण की घटनाओं की तारीख  नक्की होती चली जायेगी.


previewश्री राम एक काल्पनिक पात्र नही है, जैसे कि सुपरमेन, मिकी माऊस, रॊबिन हूड जो किसी Fiction या कपोल कल्पित उपन्यास का मात्र एक नायक हो, वरन एक ऐतिहासिक पुरुष है जैसे कि येशु ख्रिस्त, हज़रत मोहम्मद पैगंबर , महात्मा बुद्ध एवम महावीर स्वामी .इसका सबसे महत्वपूर्ण और ठोस तर्क यह है,इतने हज़ारों साल से सैंकडो ग्रंथों में, महाकाव्यों मे, साहित्यिक और ऐतिहासिक रचनाओं में श्री राम का उल्लेख और संदर्भ आता है, जिसके समकक्ष किसी और काल्पनिक पात्र का नाम हमें नही दिखता. 
                           
अब हम संदर्भों को तलाशतें हैं इस्वी सन के आरंभ के आसपास से, और फ़िर पीछी अतीत में जायेंगे-
 
ईस्वी सन से पूर्व ५५० वर्ष :


१. सबसे पहले महाकवि कालिदास की रचना रघुवंश में हम श्री राम के कुलपुरुष एवम दादा अयोध्या नरेश रघु के जीवन पर वृत्तांत पाते हैं. कालिदास का जीवन काल ईसा पूर्व पहला या दूसरा शतक ठहराया जाता है(इसके बारे में मेरे पूज्य पिता डॊ. प्र. ना. कवठेकर नें अभी एक पुरातात्विक प्रमाण अपनी पुस्तक – कालिदास , व्यक्ति और अभिव्यक्ति मॆं प्रकाषित किया है).

२. उसीके आसपास भास द्वारा लिखित दो संस्कृत नाटक हम पाते हैं, जो  रामायण की घटनाओं पर ही लिखे गये है.विद्वानों नें भास का काल ईस्वी सन पूर्व ५०० वर्ष के आसपास निष्चित किया है. भास के किसी भी साहित्य कृति में बुद्ध का ज़िक्र नही है, इसलिये ये स्वप्रमाणित है, कि श्री राम और रामायण बुद्ध और महावीर से पुराने हैं. (जैन धार्मिक ग्रंथों में भी तीर्थंकरों एक संदर्भ मॆं कहीं श्री राम का उल्लेख पाया गया है. हालांकि धार्मिक ग्रंथों को पूर्णतयः प्रामाणिक नही माना जा सकता, मगर ये तो तय है, कि उल्लेल्ख तो है ही.)

३.भास से समकक्ष है राजा शूद्रक जिसनें अपनें संस्कृत नाटक म्रूच्छ कटिकम में हनुमान का उल्लेख किया है. वैसे ही कवि कल्हण के राज तरंगिनी इस महाकाव्य में काश्मीर के राजा दामोदर के संदर्भ में रामायण का उल्लेख है.इस राजा का काल खंड भी लगभग यही है. कात्यायन के ग्रण्थ कर्म प्रदीप और कात्यायन स्मृति में ,कामंदकीय नीतिसार , शुक्र नीति  आदि में भी राम और सीतात्याग का  उल्लेख है.
180px-SeatedBuddhaGandhara2ndCenturyOstasiatischeMuseum
४. अनेक बौद्ध, जैन, ग्रीक साहित्य में कोशल देश की राजधानी ’ श्रावस्ती’ का वर्णन है, जिसे स्वयम श्री राम नें लव को स्थपित कर दी थी. 

५. पाणिनी और पतंजली के महाभाष्य में रामायण का उल्लेख है जिसका काल लगभग ईसा से लगभग  ८०० -  ११०० साल का है.

ईस्वी पूर्व १५०० वर्ष  के पहले :

१. जैमिनि ऋषि के  अश्वमेध ग्रंथ में और  गर्गसंहिता  , विष्णु पुराण ,पद्मपुराण , ब्रम्ह पुराण आदि में भी श्री राम का उल्लेख है.

२. रामायण में सिंहल द्वीप का कहीं वर्णन नही है, जब कि बुद्ध के जन्म के समय एक राजा हुआ था, विजय नाम का, जिसनें अपने पिता सिंहल के नाम से लंका का पुनर्नामकरण किया था. सिलोन या श्री लंका में महाराजाबलि नामक बौद्ध ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है के बुद्ध  जन्म के पूर्व इस द्वीप का नाम लंका था और बुद्ध निर्वाण के १८४५ वर्ष पहले रावण युद्ध हुआ था. इस गणित से रामायण का समय आता है -  ईसा पूर्व २३८८ वर्ष .

३. सिंधु संस्कृति के (ई.पू.२३५० लगभग) काल में शहरों के चारो ओर सुरक्षा तटबंदी  और  खंदक हुआ करती थी . रामायण  में भी अयोध्या और लंका की सुरक्षा का ऐसाही  वर्णन है.

४. इससे भी  पुराना ग्रंथ है तैत्तिरीय ब्राम्हण, जिसमें वाल्मिकी का उल्लेख है. लोकमान्य तिलक और केतकर नें इसका कालखंड माना है  ईसा पूर्व ४६५० वर्ष.

५. महाभारत उपरोक्त सभी ग्रंथोंसे  पुराना है, और इसका कालखंड अनेक विद्वानों नें अलग अलग माना है. वैदिक विग्यान संशोधन मंडल नें इसका काल माना है, ईसा से ५५६१ साल पूर्व. इसमें भी रामायण के कई पात्रों का ज़िक्र है, और कथाओं में रामायण की घटनाओं का उल्लेख हर जगह पाया जाता है.मगर रामायण में कहीं भी महाभारत के किसी भी घटनाक्रम का उल्लेख नही है.

महाभारत के समय रामायण बडा ही लोकप्रिय था क्योंकि अधिकतर पात्रॊं के जुबानी रामायण की घटनायें और पात्रोंका  उल्लेख है. (इसकी बृहद चर्चा यहां नहीं करेंगे, मगर किसीको अगर रुचि हो तो कृपया बतायॆं.)

कभी अलग पोस्ट मॆं महाभारत के काल समय की विवेचना अलग से करूंगा .
(श्री कृष्ण जन्म दिनांक- ?  !!!)

६. रामायण मॆं चारों वेदों का वर्णन है. मगर ऋग्वेद में  एक जगह इक्वाषु वंषी  राम का जिक्र है.संभवतः ये हमारे  ही राम हो सकते है. तिलक जी नें ऋग्वेद का काल ई.पू. ६००० वर्ष लगभग बताया है.

७. देवता – रामायण में ऋग्वेदकालीन देवता है, और महाभारत से  अलग हैं. रामायणमें इंद्र का अधिक उल्लेख है,मगर  महाभारत में नही के बराबर.महाभारत में गणपति है, मगर रामायणमें नहीं.(कार्तिकेय की पूजा का जिक्र है). महाभारत में स्त्रीयां होम  हवन नहीं करती थी मगर रामायण में ये प्रथा थी .

वेदों में और रामायण में स्त्रीयों का युद्ध पर जाने का जिक्र है, मगर महाभारतमें नही.सती की प्रथा रामायण में नही थी.

८. वंशावलीयां- हरिवंश , श्रीमद भागवत , महा भारत और रामायण में भी कुछ वंशावलीयां उपलब्ध है. उसके संदर्भों से  भी लगभग  रामायण का काल ई.पू. ७००० वर्ष आता है.

इसीलिये अब हम  मोटे तौर पर ये कह सकते हैं कि रामायण का समय ईसा पूर्व करीब सात हज़ार साल के आसपास हो सकता है.
४ डिसेंबर ई.पू. ७३२३…..

जन्म दिनांक का अब इतना अचूक गणित  मात्र ज्योतिष शास्त्र और खगोल विग्यान कि सहायता से ही  संभव है. हम भागशाली हैं कि हमारे ऋषियों को इस विषय पर पूर्ण अधिकार था, अतः उन्होने अपने  कथानक में हर संभव प्रयास किया है कि उन घटनाओं के समय आकाश में नक्षत्रों की स्थिति , आदि का स्पष्ट वर्णन नमूद किया गया है.

मित्रों, ये बात फ़िर से कबूल करने में कोई शर्म नही कि आपका ये खाकसार चाह कर भी समय पर पोस्ट नहीं लिख सका. तो कोशिश रहेगी कि अगले शनिवार/रविवार तक इसकी समापन किश्त भी प्रस्तुत की जायेगी.

यहां मैं हमारे हर दिल अज़ीज़ ताऊ का बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा कि मानस के अमोघ शब्द के इस नये रंग रूप लिये कलेवर के लिये मुझे यथा संभव मार्गदर्शन दिया है.

(पिछली एक पोस्ट में लगाये गये नटराज के चित्र श्री पंकज के सौजन्य से साभार प्राप्त किये गये.)

Friday, April 10, 2009

भगवान श्री राम के जन्म दिनांक के प्रमाण..

 

पिछले अंक में राम नवमी के दिन मैने आपको श्री राम जन्म दिन की अचूक तारीख और उनसे संबंधित अन्य घटनाओं के भी दिन, वार और सन बताये थे.

कृपया यहां पढें

krama


राम जन्म                        -    रविवार - ४ डिसेम्बर  ७३२३  ई.स.पूर्व

राम विवाह                        -    शुक्रवार - ७ अप्रिल  ७३०७  ई.सन.पूर्व

राम -वनवास गमन          -    गुरुवार - २९ नवम्बर ७३०६ ई.सन.पूर्व

रावण वध                        -   रविवार  - १५ नवम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व

राम -अयोध्या प्रवेश          -   रविवार  - ६ डिसेम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व


हमारे कई ब्लोगर साथियों नें ये जानने की उत्कंठा व्यक्त की है, जैसे ताऊ नें ये पूछा है, कि क्या इसका कोई सोफ़्ट्वेयर है. राज भाटिया जी को सबूत भी चाहिये, और अन्य जैसे अर्श,अल्पनाजी,उडन तश्तरी,संगीताजी इस रोचक तथ्य को जानने को उत्सुक हैं.

हालांकि, इतिहास मेरा विषय कभी नही रहा है, मगर चूंकि पिताजी एक जानेमाने Indologist   और संस्कृत के विद्वान और प्राचीन संस्कृति के , साहित्य के शोधक रहे हैं, मुझे हमेशा ही इन बातों में रुचि रही है, और उनके पास आने वाले बृहद शोध प्रबंधों और मूर्धन्य विद्वानों के रिसर्च पेपर्स को खंगालने की आदत भी.

पूणे में एक ऐसे ही विद्वान है, जिनका नाम है, डॊ. पद्माकर विष्णु वर्तक.पेशे से सर्जन हैं और एक नर्सिंग होम भी चलाते है. मगर साथ ही में उन्होने प्राचीन ग्रंथों, वेदों , उपनिषदों और इतिहास पर पूरा संशोधनात्मक अध्ययन किया है.साथ में आपने अपने जैसे अन्य अभ्यासू और जिग्यासू विद्वानों के साथ वैदिक संशोधन मंडल का भी गठन किया है जिसमें इन ग्रंथों में छुपे हुए रहस्य, विग्यान संबंधी रोचक और तथ्यात्मक अध्ययन किया जा रहा है. पिताजी के साथ साथ मैं भी इस संस्था से कई सालों से जुडा हुआ हूं, और इसीलिये अपनी ओर से मैंने भी कुछ प्रयास किये है, अन्य विषयों पर भी.
img0881
आपने अपने एक मराठी प्रबंध पुस्तक वास्तव रामायण में भगवान श्री राम के चरित्र, रावण और अन्य पात्रों और घटनाओं को इतिहास की दृष्टी से देखा है और विवेचना की है.

मेरे मित्रों, सबसे पहले हम यहां इस बात की विवेचना में पडने की आवश्यकता नहीं समझते कि क्या वास्तव में श्री राम एक ऐतिहासिक पुरुष थे या नहीं. यह बात हज़ारों वर्षों से परंपरा, साहित्य, लोकगाथायें, पुरातात्विक और एतिहासिक घटनाओं से स्वयंसिद्ध रही है. हमारी विवेचना के साथ साथ इस सत्यता की परख अपने आप भी  रेखांकित होती जायेगी.

जब हम किसी भी घटना, या काल या विवरण का वस्तुपरक अध्ययन या शोध करते है, तो हमें उसे मोटे तौर पर तीन विधाओं  के प्रमाणों की कसौटी पर परखना होता है:

1. पुरातात्विक प्रमाण
    (Archeological Evidence)
2. साहित्यिक प्रमाण 
   ( Literary Evidence)
3. ज्योतिषिय और खगोलीय प्रमाण
    ( Astrological &   Astronomical  Evidence)

1. पुरातात्विक प्रमाण :

    दुर्भाग्य से, हमें राम की जीवनी पर पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलते. वर्तमान अयोध्या के पास किये गये खुदाई के प्रयासों से हम लोग अधिकतम ईसा से १५०० से २००० वर्षों तक ही पहुंच पाये है. कार्बन डेटिंग के माध्यम से हमें उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं की आयु सीमा का मान हो पाता है.

मगर , हमारे देश में और देश के बाहर भी कई ऐसे स्थान मिलते है, जहां कि लोक कथाओं मे या लोकोक्ति में राम जी के जीवन संबंधी वर्णन मिलते हैं. मगर ये सभी तथ्यात्मक प्रमाण नहीं माने जा सकते.

2. साहित्यिक प्रमाण   :

सौभाग्य से हमारा इतिहास और संस्कृति की धरोहर रहे है हमारे प्राचीन ग्रंथ , जिनमे प्रमुख हैं – चारों वेद, उपनिषद, पुराण, वाल्मिकी रामायण, वेद व्यास रचित महाभारत, और अनेक ऋषि मुनियों द्वारा लिखे गये ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ग्रंथावलीयां आदि….

अब हम अपनी अगली कडी़ में इस प्रमाण पर विस्तृत चर्चा करेंगें. चूंकि हम बात को प्रमाणित करने का प्रामाणिक प्रयत्न कर रहें है, अतः थोडा गहराई में जाना आवश्यक हो जाता है. अगर आपमें से कोई जानकार इसमें कोई नई जानकारी देकर कोई नयी रोशनी डालना चाहे तो स्वागत ही है…….

मिलते हैं ब्रेक के बाद……
img0891
डॊ. वर्तक आध्यात्मिक शक्ति के भी साधक हैं, जिसका उपयोग उन्होनें वैदिक विग्यान के कई अबूझ रहस्यों को सुलझाने के लिये किया है. जैसे गुरु और मंगल ग्रह सूक्ष्म देह से विचरण इत्यादि.इसके बारे में अगले किसी अंक में…

Saturday, April 4, 2009

राम नवमी - भगवान श्री राम के जन्म दिन की अचूक तारीख ,

आज राम नवमी है !!

भगवान श्री राम का जन्म दिन ---



चैत्र शुक्ल नवमी. आप सभी को याद होगा कि राम नवमी हम सभी हिंदु पंचांग से मनाते हैं , और अंग्रेज़ी केलेंडर के अनुसार मार्च से अप्रिल के महिने में ये शुभ पर्व मनाया जाता है.

पहले अक्सर हमारी वार्षिक परिक्षायें होती थी इसलिये दोपहर को राम जन्म के अवसर पर परिक्षा स्थल पर होते थे. हमारे पुराने पुश्तैनी ग्घर के एकदम पडोस में एक प्राचीन राम मंदिर था, तो हम बाद में दर्षन करने जाते थे और प्रसाद के तौर पर पंजरी मिलती थी जो भगवान को बडी प्यारी है.

अब मैं अगर आपको पूंछूं कि राम जन्म की असली और अचूक तारीख कौनसी है? शायद आप कहेंगे, कि ये कैसे संभव है.

मगर मैं आपको बताता हूं कि श्री राम की जीवनी से जुडी तारीख या दिन कौन सा है?


राम जन्म - रविवार - ४ डिसेम्बर ७३२३ ई.स.पूर्व

राम विवाह - शुक्रवार - ७ अप्रिल ७३०७ ई.सन.पूर्व

राम -वनवास गमन - गुरुवार - २९ नवम्बर ७३०६ ई.सन.पूर्व

रावण वध - रविवार - १५ नवम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व

राम -अयोध्या प्रवेश - रविवार - ६ डिसेम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व


स्वाभाविक ही है कि मुझे अब आपके कई प्रष्नों का उत्तर देना है, कि ये सब किसने , कैसे, और कहां बताया है.आप ये भी पूछेंगे कि राम जन्म डिसेंबर में कैसे.

आपसे क्षमा मांगते हुए मैं अर्ज़ करना चाहूंगा कि चूंकि मैं फिर से चेन्नई और वेल्लोर के प्रवास पर निकल रहा हूं , इतनी बडी पोस्ट इतने कम समय में लिखना संभव नही. मेरा वादा कि आते ही इस पहेली का समाधान करने का पूर्ण प्रयत्न करूंगा.

क्षमा, और मिलते हैं ब्रेक के बाद....

Wednesday, April 1, 2009

गुडी पाडवा और नव वर्ष की शुभकामनायें


पिछले दिनों जब फ़िर बाहर था, तो कुछ अभिलाषायें मन की मन में ही रह गयी. चाहता था कि आप सभी अपनों को , स्वजनों को नव वर्ष की बधाईयां दे दूं. दुख ये यूं हुआ , कि हमारे देश में कॆलेंडर के नव वर्ष पर जनवरी में जो उल्ल्हास , जोश , उमंग हम सभी में , विशेषकर युवाओं में रहता है, वह हिंदुओं के नव वर्ष, मराठीयों के गुडी पाडवा पर, सिंधीयों के चेटिचंद उत्सव पर हमारा उत्साह क्यों नहीं दिखता.

वैसे सारे महाराष्ट्र में गुडी पाडवा बडी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, इसलिये यहां हर जगह छुट्टी होती है, जबकि मेरे बेटे अमोघ, जो यहां के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल डेली कॊलेज में पढता है, नव वर्ष पर छुट्टी नही थी.

चलो , देर आयद दुरुस्त आयद, आप सभी को .साईड बार में अवश्य लगा दी थी मगर दिल है कि मान नही रहा था, इसलिये फ़िर से रूबरू दे दी!!!

ये चित्र हमारे घर में स्थापित गुडी का है, जिसमें कि जैसे आप सब को पता ही होगा , एक दंड होता है, जिसपर गुडी के प्रतीक के रूप में एक चांदी के लोटे को उल्टा करके साडी पहनाई जाती है. एक मंगलसूत्र भी होता है, सौभाग्य की निशानी,और नीम के कुछ पत्ते.


आपने देखा ही होगा कि ये जो गुडी है, एक पेडस्टल पर बाकायदा फ़िट की हुई है, अन्यथा , अधिकतर सभी घरों में बांस का दंडा ले कर उस पर साडी ’मिरे’ कर के याने कि करीने से घडी कर के बांधी जाती है.मगर जैसा कि हर जगह इन्स्टॆंट चीज़ो का ज़माना आ गया है, मुम्बई में पिछले कुछ सालों पहले एक उद्यमी युवा महिला नें कुछ नया करने की चाह में अलग अलग साईज़ में गुडीयों की निर्मिती की , जिसके कारण मुंबई जैसे शहर में जगह और समय के अभाव में ये परिकल्पना या कंसेप्ट लोगोंने हाथो हाथ उठाया और उस महिला का नाम काफ़ी मशहूर भी हुआ. संयोग से वह महिला, मेरे पत्नी डॊ, नेहा की सगी मौसेरी बहन ज्योति थी. और थी इसलिये कि दुर्भाग्य से पिछले साल युवावस्था में कॆन्सर से उसका निधन हो गया.

हमारे यहां आज श्रीखंड बनता है, मगर हमें सुबह सुबह परंपरा के अनुसार कडवे नीम की कोमल पत्तीयों की चटणी भी खानी पडती है, जिसे हम छुटपन में बडे मुंह बनाकर,रोते कलपते खाते थे( कभी कभी नज़र बचाकर थूकने का भी प्रयत्न करते थे, मगर एक बार पकडे जाने पर दादाजी की मार पडी थी)

आज हम बडे हो गये हैं(ऐसा हमें लगता है),नही खायेंगे तो कोई टोकने वाला नही है, पिताजी के अलावा. उन्होने पूरे जीवन में हम पर कभी हाथ नही उठाया, तो अपने पोतों को क्या मारेंगे. ये पीढी के सरकने का एक संकेत है.

Monday, March 23, 2009

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ,महिलायें और विशिष्ट संयोग !!!

अर्धनारीश्वर नटराज..

मेरी पिछली पोस्ट पर मैने समयाभाव के कारण दो विषयों पर एक साथ पोस्ट की थी, जिसके कारण , विश्व महिला दिवस पर मैने कुछ पूछा था उस पर प्रतिक्रिया कम आयी.

मगर क्या करूं, इन दिनों लगभग हर हफ़्ते तीन दिन बाहर हूं. अभी अभी नागपुर जा कर आया, जहां साले के बेटे की जनेऊ थी और साथ ही प्रोजेक्ट का काम भी. फ़िर मुम्बई और पुणें.

मैने एक बात आपको अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में बताई नही, वह ये कि इन दिनों मैं एक अंतरराष्ट्रीय महिला के साथ काम कर रहा हूं. युरोप के फ़ेशन परिधान के एक बडे चेन ग्रुप नें इंदौर के पास पिथमपुर में एक गारमेंट कारखाना डाला है, जहां हर दिन ६००० वस्त्र बनेंगे छोटे, बडे, विशेष कर महिलाओं के लिये ,सिर्फ़ युरोप मार्केट में एक्सपोर्ट के लिये.

पिथमपुर हिन्दुस्तान का डेट्रोइट कहा जाता है, क्योंकि यहां ओटोमोबाईल इंडस्ट्री के बडे बडे नामचीन ब्रांडस के कारखाने है.कायनेटिक होंडा स्कूटर, आइशर मोटर्स,हिन्दुस्तान मोटर्स, ब्रिजस्टोन,एल एंड टी केस (भारी मशिनेरी),बजाज टेम्पो,आदि.साथ ही में कपास का बेल्ट होने के कारण धागे से लेकर गारमेंट बनाने के कारखाने है.उसी की कडी में ये फ़ेक्टरी जोइंट वेंचर में डाली गयी है जिसकी मुख्य कार्यपालक अधिकारी (C E O ) है मिस राया, जो इटालीयन है. ( संयोग से हमारे देश की सरकार की CEO भी इटालियन ही है!!)

हालांकि इस कंपनी के प्रेसिडेंट भी है श्री गुप्ता , मगर उनकी हालत श्री मनमोहन जी जैसी ही है. पूरे प्रॊडक्शन की , तकनीकी मशिनरी और प्लांट के लिये मॆडम ही जिम्मेदार है. मुझे इस प्लांट में स्ट्रक्चर्स ,स्पेस फ़्रेम केनोपी, मटेरीअल हॆंडलिंग ऒटोमेशन ,और अन्य कामों के डिज़ाईन और इंस्टालेशन का काम मिला है, एक कंसल्टंट की भूमिका में, तो मिस राया से ही वास्ता पड रहा है.

दुर्भाग्य से इससे पहले के सिविल कार्य और अलग अलग प्लांट्स के एक्ज़ीक्युशन में हमारे देश के लोगों नें समय पर काम नही कर के दिया, जिससे मॆडम के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में किये गये कमिटमेंट्स झूठे पड गये. इसलिये स्वाभाविक तौर पर शांत यह महिला पिछले दिनों बहुत ही गुस्सैल , उग्र और अधीर हो गयी है. ऊपर से उसे अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं आती. तो ठेकेदार भी मुंह तकते हैं.इसलिये मुझसे भी वह पहले ऐसा ही कुछ पेश आयीं.

चूंकि मेरा काम अंतरराष्ट्रीय कंपनीयों से काफ़ी पड रहा है, मुझे काम के प्रति Accountibilty और समय की प्रतिबद्धता का काफ़ी शऊर है.मगर , इस तरह से किसी पूर्वाग्रह के रहते मैं काम नहीं कर सकता. इसलिये मैंने उन्हे मना कर दिया. मेरे साथियों ने मुझसे यही कहा कि आप एक स्त्री के नीचे काम नहीं कर सकते.शायद आपका ईगो आडे आता है.

यह बात तो अजीब ही है. काम में उच्च दर्ज़े की professionalism में विश्वास होने के कारण और साथ में एक कलाकर्मी का दिल होने की वजह से सभी तरह के ईगो के पाश से दूर हूं(शायद यही कमज़ोरी है).

मगर जब बाद में उस महिला नें मेरा काम के प्रति समर्पण और उनके युरोप में चल रहे अत्याधुनिक ऒटोमेशन सिस्टम का डिज़ाईन कर के दिया (वह भी समय पर) तो उसनें भी माफ़ी मांगी.

पिछले दिनों पता चला कि इटली और मॊरिशस से चार फ़ॆशन डिझाइनर्स आने वाले थे तो वहां के सभी भारतीय अफ़सर और कर्मचारी और हैरान होने लगे, कि एक से ही परेशान है, और चार को कैसे झेलेंगे?साथ ही में पुरुष के परंपरागत वर्चस्व के संस्कारों का पत्थर गर्दन पर किसी बैल की तरह ढोते हुए उन व्हाईट कॊलर बंदों को जब पता चला कि वे चार डिझाइनर्स भी महिला ही है, और पूरे प्लांट्स की देखरेख भी उन्हीके जिम्मे रहेगी, तो उनकी डाह और कुंठायें मन की बावडीयों से उठ कर सतह पर आ गयी.और अब पता चल रहा है, कि कटिंग, स्टिचिंग,एक्सेसरी फ़िटिंग, और आयरनींग का काम भी सभी महिलायें ही करेंगी!!!(शायद प्लांट के मेंटेनेंस या रख रखाव के लिये तो पुरुष ही होंगे). तो महिलायें खुश हो जायें कि यह सभी व्यवस्थायें संभव हो रही है, और डंके की चोट पर सफ़लता के कदम चूमेंगी.

मगर मेरी बात अभी खतम नही हुई है.

मुझे एक गारमेंट हॆंगर का कन्वेयिंग सिस्टम डिज़ाईन करना था. मिस राया नें एक ऐसा कंसेप्ट दिया जो उनके मॊरिशस के प्लांट में अभी चल रहा है. मगर मेरी परेशानी ये थी कि वह सिस्टम पुराना है, और आज हिंदुस्तान में और संसार में इससे बेहतर और Convenient सिस्टम आ गये है. लगभग इसी तरह से इससे ज़्यादा Complicated सिस्टम मैने अभी दोहा (कतर) के एयरपोर्ट के कार्गो के लिये किया है. मगर मिस राया नें नही समझा, और समझने का समय भी नही है. ऐसे में बडी कोफ़्त होती है, एक creative व्यक्ति के लिये.विशेषकर इस बात का एहसास कि चूंकि मैं भारतीय हूं , हम कहीं इन युरोपीयन रेस से कमतर हैं, इनकी निगाह में.

अभी परसों , उन चार महिलाओं से भी वास्ता पडा. अब एक और दिक्कत पेश आयी इनके साथ. मिस राया तो थोडी बहुत अंग्रेज़ी जानती थी , अमर इनको तो सिर्फ़ इटालीयन ही आती है.मगर भगवान की कृपा रही कि उन्होने मात्र इशारों से बताई हुई सिस्टम मुझे समझ में आ रही थी और उन्हे भी बडी राहत पहुंची , क्योंकि वे विश्वास नही कर पा रहे थे.वह शायद इसलिये संभव हुआ कि मैने जिन प्रॆक्टिकल , और लॊगिकल बातों का ध्यान रखा उसमें मूल तत्व था ये कि इसे महिलाओं द्वारा ही संचालित करना था, और ऒपरेट भी करना था. इंटेरियर डिज़ाईन करते हुए, जब मैं किचन का डिज़ाईन करता था, तो यही बात ध्यान देने की वजह से गृहिणी के मन की बात समझ जाता था.(कौन कहता है आर्किटेक्ट को एक अच्छा मनोवैग्यानिक नही होना चाहिये)

अब सबसे मज़दार बात. तीन दिन पहले मैं पुणे में था, एक ऐसे कारखाने में जहां से मै अपनी डिज़ाईन के अनुसार सिस्टम बनवा सकता हूं और सप्लाई करवा सकता हूं.वहां जनरल मेनेजर (प्रोजेक्ट) से मेरी मुलाकात तय हुई थी जिसके लिये एक महिला से मेरी बात फ़ोन पर हुई थी.जब मैं वहां पहुंचा, वही महिला ने मेरा स्वागत किया, जिनका नाम था नैना (नैनो नही!!)

मैने पहुंचते ही उनसे कहा कि मुझे जल्दी से वापिस जाना है मुम्बई जहां शाम को फ़्लाईट पकडनी थी, तो उन्होने मुझे चौंका दिया. वह बोली, मैं स्वयं G M हूं और आपके साथ इस डिज़ाईन पर काम करूंगी.( उन्हे इस काम का १७ साल का अनुभव था ).यकीन मानिये, पहले तो मैं थोडा सोच में पड गया. सदियों से पडे संस्कार का एक मिनीट तो असर पड ही गया था शायद. मगर मेरी शंका उसकी काबिलियत से अधिक इस बात पर ज़्यादा थी कि शायद डिज़ाईन के comlications को समझा जायेगा या नही, क्योंकि ये अपेक्षाकृत एक नया की कंसेप्ट था, विश्व में और भारत में भी.(इसके बारे में एक अलग पोस्ट लिखूंगा, उनके लिये जिन्हे इस बात की उत्सुकता होगी कि ऐसा क्या है जो इस इक्कीसवीं सदी में भी नया है)

बस दो घंटे का ही समय था हमारे पास, और आनन फ़ानन में काम बडे ही सुगमता से और संतोषप्रद तरीके से विकसित होने लगा. देड घंटे में तो मैने उनकी फ़ेसिलिटीज़ भी देखी, और अंत में वे मुझे अपने M D से मिलाने ले गयीं. मैं फ़िर से चौंक पडा. वे भी एक महिला ही थी. मेरा मन इस अजीब और सुखद संयोग से खुश हो गया. मैं एक ऐसा सिस्टम डिज़ाईन कर रहा था जिसे एक महिला गारमेंट फ़ेक्टरी में लगना था, जिसे चलाने वाले और उपयोग करने वालीं भी महिलायें ही है, और अब ये भी संयोग रहेगा कि इसे manufacture करने वाली कंपनी भी महिलाओं द्वारा ही संचालित हो रही है!!

मैनें झट से उन महिलाओं से कहा कि आप बस दो दिन में इंदौर आ जायें और अपना ऒफ़र मिस राया को दे दें जो, एक हफ़्ते यहां रहती है, और अगले हफ़्ते इटली की मौजूदा फ़ॆक्टरी में. मगर उन विदुषी महिलाओं ने माफ़ी मांगी. नैना जी बोलीं, एक परेशानी है. मेरे बेटे की अभी दसवीं की महत्वपूर्ण परिक्षा चल रही थी, इस लिये, वे चाहेंगी कि इसके बाद ही वे इण्दौर आ सकेंगी. MD भी चूंकि स्वयं नारी ही थी, तो इस बात को उसनें भी पूरी सपोर्ट के साथ मानी भी.

मैं सोचने लगा, आज नारी कहां कहां पहुंच कर कार्य कर रही है. मगर सामाजिक व्यवस्थायें और मान्यतायें भी यही बात रेखांकित कर रही हैं कि स्त्री का सर्व प्रथम कर्तव्य है एक मां का, जो नैना नें निभाया. कोई आधुनिक विचारों वाली महिला शाय्द इसे पुरातनवादी , या बंधुआ मजदूरी के समक्ष रखेगी. मगर शायद यह कायनात, ये संस्कृति, ये सिविलाइज़ेशन, सभ्यता , आज इसीलिये टिकी है, कि एक मां ने अपने सबसे प्रथम कर्तव्य को पहचाना है, कि उसे एक अगली पीढी का निर्माण भी तो करना है. क्या ये महान कार्य एक पुरुष अंजाम दे सकता है?(आप क्या कहते है?)

मैने उस मां को मन ही मन सल्युट किया, और समय नही होने के बावजूद उस मां के जज़बे की कद्र कर खुशी खुशी लौट आया.(अब चाहे मां रुठे या बाबा, मैने तो हां कर दी)

अब आप ये कहेंगे कि इस कडी में अब सिर्फ़ एक ही पुरुष है, और वह है मैं.

मगर जरा अपनी सीट पर ठीक से बैठ जायें और गौर से पढें मेरी बात..

मीरा जी नें क्या खूब कहा था--

इस जगत में सर्व शक्तिमान ईश्वर ही एक मात्र पुरुष तत्व है, बाकी हम सभी स्त्री तत्व ही तो है....!!

क्या कहते हैं आप?

Friday, March 6, 2009

मुशर्रफ़,क्रिकेट, और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

चलो, वहां पाकिस्तान में भी ३/३ हो गया. हमारे ज़ख्म २६/११ के अभी ताज़े हैं, और लाहौर के ज़ख्मों से कुछ को सुकून मिला होगा तो कोई ये सोच रहा होगा, कि क्या ये कभी थमेगा? कोई कह रहा है श्रीलंका की क्रिकेट टीम को - और जाओ, कहा था तो माने नहीं, अब भुगतो.


वैसे ,श्री लंका की टीम की क्या गलती. आपने देखा नहीं , पैसे के लिये आदमी क्या क्या नहीं करता.कितने हैं जो देशसेवा(?) करने को उद्युत रहते है.(चुनाव पास है). ये जो सेना में हैं उन्हे जान की क्या परवाह नहीं? चलो , देशभक्ति भी तो कोई चीज़ है, मगर उन भाडे के सैनिकों का क्या, जिनका काम ही है युद्ध करना, पैसे लेकर. कसाब को आपने सुना नही कबूल करते हुए कि ये सब इसलिये मारा कि देड लाख रुपये मिल रहे थे?क्या पुलिस, या जोखिम वाली नौकरी आदमी थ्रिल के लिये कर रहा है? The whole thing is that सबसे बडा रुपैय्या !!

वैसे ये बात तो शर्मनाक है, कि जिस सिक्युरिटी की बातें पाकिस्तान को देनी थी वह नाकाम रहा.मगर ,हम कतई मुतमयीन ना हों इस बात पर कि क्या बेवकूफ़ है वे, और हमारी सिक्युरिटी बडी पुख्ता है.

भारत का भी हाल यही है जनाब. किसी को कोई ज़ेड सिक्युरिटी नही.( २० नेताओं को छोडकर,जो खत्म भी हों तो देश को कोइ फ़रक नहीं पडेगा)

अभी अभी नवंबर में इंग्लॆंड की टीम आयी थी इन्दौर , एक अंतरराष्ट्रीय मॆच खेलने. एक दिन पहले दोपहर को प्रेक्टीस कर के भारतीय टीम स्टेडियम से होटल जा रही थी तो मेरे सामने एक मोड पर उनकी बस को अचानक ब्रेक मारकर रुकते देखा, तो पाया कि एक साईकल उसके नीचे करीब करीब आ ही गयी थी, और संयोग से साईकलवाला बच गया था ,और खडा खडा कांप रहा था. दो हवलदारों नें हमारे सब के सामने आव देखा ना ताव , जो टूट पडे उसपर गाली और लातों की बौछार करते हुए. वो तो अच्छा हुआ कि ईशांत शर्मा नें ये देख कर बस से उतरकर उसको बचाया, और साईकल उठा कर उसे दी. (नया है, वर्ना युवराज की तरह नाक चढा कर बैठा रहता.)

बात यहां ये है, कि सब मिला कर ज़ेड सिक्युरिटी का क्या हुआ? ये वही दिन थे जब आतंकवादी सचिन और अन्य खिलाडीयों को अगुवा करने की मंशा में थे.पायलट कार तो कहीं दिखी ही नही.या तो आगे निकल गयी होगी या अंग्रेज़ टीम को सम्हाल रही होगी.

तभी कल जब जनाब मुशर्रफ़ को India Today के Annual Conclave में हमारे सभी संभ्रांत बुद्धीजीवीयों के बीच में सभी सीधे, उलटे और तीखे सवालों का जवाब देते हुए देखा सुना (टीवी पर), तो हर चीज़ पाकिस्तान के नज़रिये से समझने का मौका मिला.

मुशर्रफ़ नें माना कि अब यहां ये कतई ज़रूरी नहीं है हम पुरानी बातों को पकड कर बैठ जायें और रस्सी को सांप समझ कर पीटते रहे. इस प्रायद्वीप में अमन की बहाली के लिये दोनों देशों को मिलकर कदम उठान पडेंगे. उन्होने ये आशा जगाई कि जैसा कि उन्होने बडी शिद्दत और ईमानदारी के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच के कश्मीर मसले को और दूसरे मसाईलों को सुलझा की पूरी कोशिश की उसकी आज ज़रूरत है. दाऊद की बात को कन्नी काट कर उन्होने ये बात बडे साफ़ लहजों में कही कि पाकिस्तान तो victim है पश्चिम के सरमायेदारों की सियासत का जिसकी बेवारिस औलाद है अलकायदा और तालिबान और उनके यहां सभी, याने पाक की सरकार , फ़ौज और ISI उससे निपटने में लगी है, और हम सब यहां भारत में उनके विरुद्ध विषवमन कर रहें है.

वैसे, उनकी इस दलील को किसी नें माना नहीं पर आखरी में हमारे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मलिक की बात सोलह आने अचूक और मर्म तक पहुंची हुई थी और जिसने मियां मुशर्रफ़ को भी बेजवाब कर दिया. वह ये, कि भारत भी यही चाहेगा कि पाकिस्तान एक लोकतंत्र की सरकार के Politically Stable Governance से चले, आतंकवाद और अलगाववाद को उखाडनें में उनको अगर परेशानी आ रही है, तो हमें कहें , हम उनको वहां आ कर नेस्तनाबूत कर देंगे.

क्या खूब बात है. अगर hypocracy में नहीं है हमारी और पाकिस्तान की सरकार , तो क्या ही मज़ेदार समां होगा.

महिलाओं की स्थिती पर मुशर्रफ़ नें ये माना कि वहां हालात सही नहीं है, मगर क्या भारत में सही है?


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज ही है. मेरे ब्लोग पर मैने कल से लिख रखा है, कि हर मां , बहन और पुत्री को सलाम.इसमें जीवन संगिनी रह गई.

फ़िर मेरे समझ में लग गया कि नारी इस बारे में क्या सोच रही है. आज दिन भर से अलग अलग जगह से एक बात जो सभी नारीयां शायद चाहती है(य़ा जो नारीयां इतने प्रगतीशील माहौल से आयी है, जो ऐसा बयान देने की स्थिती में है)

आज नारी यह चाहती है, कि उसे सिर्फ़ नारी समझ कर ही मान्यता मिले, एक मां,पत्नी, बहन या बेटी के रूप में नहीं.

बात में दम है. वह एक महिला है सर्व प्रथम , बाद में ये बाकी सब रोल या किरदार. मगर फ़िर इन किरदारों से क्या दुश्मनी. भारत में जिस तरह के संस्कारों और परंपराओं का इतिहास है, और जो संस्कृति आज यहां है, पाश्चात्य देशों के संदर्भ में , तो नारी के यही रूपों ने तो आज की सामाजिक व्यवस्था मजबूत की है, सिर्फ़ महिला के रूप में नहीं. ये रूप है तभी तो नारी सत्यम, शिवम, सुन्दरम है.

चलो इस बात को विस्तार से अगले कडी में बहस करे> आप भी क्या कहना चाहेंगे? जरा खुल के कहें.
संयोग से पिछले कुछ दिनों में मेरे व्यवसायिक कार्य में एक ऐसा अनुभव मुझे आ रहा है, जो मेरी इस बात से बाबस्ता है. अगली कडी तक , जो plot या कथानक रच रहा है, उसका समापन भी हो जायेगा.

Sunday, March 1, 2009

काले बंदर का बाल, मसक्कली, और गली का चौकिदार...

अब एक महिना पूरा चला गया नई पोस्ट के लिये. पता नहीं , मन में कई छोटे बडे विचार आकर ऊंगलीयों के कोने तक टंग जाते हैं, और की बोर्ड पर फ़िसलने को आतुर रहते है.एक कहानी की शक्ल की रेत की मूर्ति हर दिन मन में बनती है, और दूसरे दिन समय के समंदर की लहरों में घुल जाती है.

घर में शादी थी, बडे कज़िन के छोटे बेटे की शादी . सभी रिश्तेदार , दोस्त ,अपने, नये , पुराने ....फिर से मिले लीज़ रिन्यु करने जैसे, और ऊपर से नये प्रोजेक्ट की तल्खी..

वैसे कज़िन बोलते या लिखते ऊंगलियां कांपती हैं, क्योंकि बचपन से संयुक्त परिवार के आनंद को जीया है .तीनों भाईयों के परिवार के हम सब 10 भाई बहन है, तो जब कोई पूछ बैठता था तो कह देते कि १० भाई बहन है हम सब, तो चकित रह जाता था.

इन्ही दिनों हमारे कालोनी में हमारी गली या लेन की सीमेंट की सडक बनना शुरु हुई. सोचा दो दो कारें है, दो स्कूटर है, रखेंगे कहां? तो बिटिया एक स्कूटर तो अगली गली में अपने मित्र की मां के पास चली गयी कि मौसी के यहां रख देंगे.मगर वहां तो पहले से ही चार स्कूटरें खडी दिखी. अच्छा हुआ कि मौसी नें निराश नहीं किया,बस कारों की आफ़त थी. टेप वगैरे निकाल कर पिछली लेन में रख देंगे ये सोच कर जब रख दी, और सुबह जब आफ़िस के प्युन के साथ लेने गये तो चौकिदार नें अडा दिया- बाबुजी, गाडी यहां नहीं रख सकते. वह उस लेनवालों के चंदे का जाया था इसलिये कुछ जिरह करने की बजाय, उससे प्रेम से ,मुस्कान का लिफ़ाफ़ा थमाते हुए कहा कि भाई हमारे यहां प्राब्लेम है इसलिये रखा है. मेरे प्युन को लगा मेनेज करना पडेगा, जिस के लिये कटकट कर रहा है, तो उसनें कहा, भै्य्या देख लेंगे..

तो सोच के विपरीत वह बोला, साहब, रात को जब आप रख कर चले गये तो लगा कहीं मिलने आये होंगे, चले जायेंगे. मगर जब नहीं आये तो मैं रात भर किसी आशंका से परेशान रहा, और गाडी के पास ही चक्कर काटता रहा. यहां इस गली में हर चीज़ मेरी जिम्मेदारी पर है.इसलिये आप इस गाडी को रख सकते हैं मगर मेरी गुमती की पास के खाली प्लॊट पर ताकि मैं नज़र रख सकूं.

हम सभी तभी परिक्षा के मंजर से गुजरते है, जब इस तरह के छोटे मगर महत्वपूर्ण अनुभवों से गुज़रते है. जिसे मेनेज करने चले थे उसने ही सरल और आत्मीय व्यवहार से हमें मेनेज कर दिया.

मुझे एक शेर याद आ गया जो कहीं पढा था -(कुछ इसी तरह)

मेरी मां न जाने कितनी ही रातें सो नहीं पायी,
मैने कभी ऐसे ही कह दिया था कि डर लग रहा है.


तब से दोनों गाडीयां हर रात को वहां लगती थी. सुबह का चौकिदार हमेशा घूर घूर कर देखता रहा, सोचा उसे तो कुछ देना ही पडेगा, मगर उसकी नज़र से यूं लगता था कि हम कोई गुनाह कर रहें है, इसलिये मैने पत्नी नेहा से कहा था कि रात वाले को ज़रूर दे देंगे, इन्सानियत का तकाज़ा है. हम हर महिने में एक बार तो मल्टीप्लेक्स में जब फ़िल्म देखनें जाते है, तो सहज ही ६-७०० रुपये लग जाते है.तो सोचा कितना ठीक रहेगा? १००-२००-५००? समझ नही आया,सोचा जब आयेगी तो देखेंगे.

आज अभी हम एक फ़िल्म देखनें गये थे, आखरी शो.देहली -६. किसी नें कहा बोर है, ६-७ सौ डूब जायेंगे. मगर कल टूर पर निकल रहा हूं तो सोचा परिवार के साथ देख ही लेते हैं.किसी कारणवश थोडा लेट हो गये थे तो मल्टीप्लेक्स एड्लेब की बजाय पास की श्रमिक बस्ती से लगी टाकीज़ में चले गये. १५० रु. की जगह ६० रु. का टिकट देख कर संतोष हुआ.नेहा वैसे भी नाराज़ थी , बेटा भी कि कहां ले आये हो. मैने कहा- देखो, एक तो आर्थिक मंदी है, दूसरा फ़िल्म की अच्छी रिपोर्ट नहीं है,तो रिस्क कम रहेगी. तीसरे, तुम तो रात को हर फ़िल्म में झपकी ज़रूर लेती हो, तो क्या फ़रक पडेगा तुम्हे.

हर चीज़ के दो पहलू थे. टाकीज़ में पुराने दिनोंकी यादें अस्त व्यस्त हर कोनें में छिटकी पडी थी मेरे लिये. स्टाल की जाली वाली लाईन में फ़िल्म के पहले शो के लिये सुबह से लाईन लगाना याद आया. बाद में मच्छरदानी के किसी खुले कोने में से घुसने वाले मच्छरों की भांति हाल मे घुसने के बाद बिना नम्बर की सीटॊं पर पंखे के नीचे बैठने की वो कवायद भी याद आयी. ( १० पैसे में कोकाकोला पिया था जाली में से हाथ बाहर निकाल कर).मगर ,नेहा और बेटे अमोघ के लिये कुछ असहज सा अनुभव.

यहां तो बालकनी खाली पडी थी, फ़िर भी किसी पंखे के नीचे बैठ गया. पहले गेट कीपर जहां बिठा रहा था जिस पंखे के नीचे, तो मना कर दिया, क्योंकि पता था वह पंखा चलते हुए शोर करता था. आज भी इतने सालों में मैं वही, पंखा वही, और शोर वही.(या कुछ बढ गया)अब तो सभी पंखे शोर कर रहे थे.

फ़िल्म शुरु हुई, सामने की सीटों के पिछवाडे में पडी पान की पींक की महक लेते हुए,मसक्कली गाने पर नीचे से आती हुई सीटीयां और फ़ब्तियां कसने का पुराना नोस्टालजिया वाला माहौल , खटमलों का अंदेशा लिये फ़िल्म देखी.इंटरवल में समोसे खुले है, इसलिये नहीं खाये, क्रीमरोल मिल गया पन्नी में लिपटा तो बेटे अमोघ को दिलाया,खारे दाने लिये और खुद मौसम का पहला कोल्ड ड्रिंक पिया. ३५ रु में वह सब लिया जो २०० रु. में लाईन मे लग कर एडलेब में लेते थे(दाने और क्रीमरोल कहां मिलेंगे वहां?). ५०० रुपये बच गये जनाब.

फ़िल्म तो अच्छी लगी. पुरानी दिल्ली का एम्बियेंस , वातावरण निर्मिती अच्छी की है. ज़रा हेंडलिंग अलग है, केमेरे मूव्हमेंट और गंगा जमुनी तेहज़ीब, एक सहज सा अहसास. मैं भी एयर कंडीशन मल्टीप्लेक्स की जगह ज़मीन से जुडा, अपने ओहदे, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऊंची नाक को पार्किंग किये गये कार में छोड आया था.पत्नी नें भी बडे दिनों बाद पूरी फ़िल्म देखी.(क्या करे)

बाद में काले बंदर के हमले में पुरानी हिंदी फ़िल्मों की रेसेपी घोल कर ओम प्रकाश मेहरा नें हमें पिलाया.फ़िल्म की रामलीला में सीता हरण पहले होता है, बाद में शबरी के बेर, इस पर बेटे की आपत्ती को खारीज कर अपने अपने मन के अंदर छिपे काले बंदर के अस्तित्व को नकारते हुए हम सभी मानसिक जन गण मन करते घर लौटे.

चूंकि रोड बन चुका था हमने सीधे घर में गाडी पार्क की. रात के एक बजे थे, पत्नी नें कहा चौकिदार का क्या किया? मैने सोचा कल शाम को तो बाहर चला जाऊंगा, और सुबह वाले चौकिदार को तो एक पैसा नहीं देना है, क्योंकि उसका घूरना मन को खंरोच मार गया था.वह रात वाला भी सोचेगा कि साहब की गाडी अब नही लगेगी, और साहब गच्चा दे गये,इनाम नही दिया.काला बंदर मन के कोने में दुबके बैठा होगा यूं एक पल लगा. लेकिन नहीं, रावण के साथ फ़िल्म में ही हम सभी उसे जला कर आये थे.लेकिन शायद उसका बाल रह गया होगा.मन दुविधा में था.

तो मन नें निश्चय किया कि अभी जायेंगे और और चौकिदार को पैसे (इनाम) दे आयेंगे. नेहा नें कहा, ज़रा ठीक ही देना. अब ठीक से क्या मतलब, मैने पूछा- कम या ज़्यादा? तो उसनें कहा कि थोडा अधिक ही देना. रात को जब भी वो अपनी गाडी लगाती थी तो उसको भी बडे आदर से वह चौकिदार अदब से खडा रहता था, बजाय सुबह के चौकिदार के, जो उसे भी यूं घूरता था जैसे, गाडी चोरी कर के ले जा रहे है.व्यवहार की खरोंच उसे भी नागवार गुज़री थी.

मैने सोचा आज ५०० रुपये बच गये है, अपने लिये कोई खास कीमत नहीं होगी, मगर उस चौकिदार के एक हफ़्ते की तनख्वाह का इन्तेज़ाम होगा. तो नोट निकाला, थोडा चल कर चौकिदार की गुमटी में पहुंचकर उसे आवाज़ दी. वह सडक पर ही दूर से आता नज़र आया. देर हो रही थी, मैने, उसे वहीं ५०० रुपये का नोट देते हुए कहा कि लो इनाम लो , गाडी देखने के लिये. वह पास आया, अंधेरे में से उजाले में और बोला धन्यवाद,. मैं चौंक पडा. ये रातवाला चौकिदार नहीं था, बल्कि सुबह वाला था. तम्बाखू से सने दांत दिखाते हुए १५ दिनों में पहली बार सलाम किया.

मैं सकपका गया. उससे कडक कर पूछा रातवाला चौकिदार कहां गया?

उसने बडे संवेदनारहित भाव से कहा- साहब वो तो कल रात ही मर गया. इसीलिये आज से मै रात को............

मुझे बाद में कुछ सुनाई नही दिया. घर लौटते हुए रात की खामोशी में मन के अंदर के काले बंदर के बाल के चुभने की वेदना
से कसमसाया मै,(सुबह वाले चौकिदार को ५०० रुपये व्यर्थ देने की पीडा लिये), लेपटोप के कीबोर्ड के माध्यम से उस रात के अनाम गरीब संस्कारित चौकिदार को मन की मुखाग्नि देने के प्रक्रिया में लगा हुआ हूं.
Blog Widget by LinkWithin