नये साल की शुरुआत मैं एक ऐसे पोस्ट से करना चाहता था, जिसे सिंहावलोकन या Restrospect कहा जा सकता है. पिछले ६ महिनों से जब से यहां आप से मुखातिब हो रहा हूं , कई उतार चढाव देखे, महसूस किये,अंतरंग के भावनात्मक पहलूओं को स्पर्श किया, कुछ कड़वे अनुभव लिये, कुछ कडवा बोल लिख भी दिया होगा शायद..
पर इस साल के resolution में मानस के अमोघ बोल पर नियमित लिखने का प्रण ज़रूर लिया है, और छोटे छोटे मगर गंभीर विषयों पर कभी मन कभी उद्वेलित हो लिखने को करे तो लिखा करूंगा, क्योंकि पोस्ट छोटी या बडी़ ना होकर उथली या गहरी होती है, ये समझ आ गयी है.
वैसे, जब पीछे मुड कर देखा तो पाया,कि इस साल कुछ दोस्त गंवाये , कुछ नये बनाये ( ब्लोग जगत में भी ). जो मिले वे स्वागत योग्य है ही, मगर जो खो दिये वो हानि बहुत बडी है, ये मन स्वीकार करता है.

मित्रता में एक बात मैं मानता हूं , कि मेरे लिये मैत्री कोई बेलेंस शीट नहीं है, कि जिसमें डबल एंट्री हो.मैंने अपने बुक्स में एंट्री कर ली तो वो अकाउंट कायम हो गया. ये अलग बात है कि मित्र अगर मैत्री के भावबंधन से छूटना चाहता हो तो वो भले ही अपने बुक्स से एंट्री डिलीट कर दे, मेरे यहां तो वह डिलीट हो ही नही सकती.
अब ये बात ज़रूर तर्क से परे नहीं कि उस मित्र नें अगर यूं सोचा तो शायद उसका कोई कारण होगा, और उस कारण के पीछे अधिकतर उसका आपकी किसी बात पर या किसी कहे पर या किसी बर्ताव से हर्ट हो जाना होगा.उचित भी हो सकता है, उसके नज़रिये से, क्योंकि जो उसे दुखी करे उससे नाता रखना ही क्यों.अब जब यह तय पाया ही है , तो बहानों की मकड़जाल बुनना भी आसान है.
मगर मेरा नज़रिया वैसा कभी नही बन पाया ,और मैं हमेशा सकारात्मकता से उसकी इस हरकत में मजबूरी ढूंढता था और इसीलिये मेहदी हसन साहब की एक गज़ल हमेशा याद आती रहती है-
हमको आये नही जीने के करीने यारों,
वर्ना उस शोख़ पे क्यूं जान कर मरते यारों..अब जब इतनें ज़ख्म़ खा लिये कि आदत सी हो गई. ज़ख्मों को वक्त के लेप से, भावनाओं की फ़ूंक से भरने का जतन करते करते खपली आ गयी तो मान लिया कि ज़ख्म़ भर गया है.मगर टीस तो गहराई में मौजूद है,और खुदा ना खास्ता अगर कभी ये खपली उखड जाये तो?
आज का दिन ज़रा खास यूं है,कि आज भी एक पुराना ज़ख्म खुल गया है.
बरसों पहले मेरे एक मित्र नें अचानक मुझ से नाता तोडा़ था .एक तरफा . बीच में उसकी कोई अच्छी बुरी खबर नहीं आयी, और ना ही कभी ये भी बताया कि क्यों छोडा.
और आज कई बरसों बाद उसका SMS आया, नव वर्ष की बधाई का.साथ में ये स्वीकारोक्ति भी कि दोस्ती तोड़ कर पछताया है वो. और छोडने का कारण भी आध्यात्म था, या छद्म आध्यात्म का आवरण था.
आज मेरी बेलेंस शीट में उसका अकाउंट अभी भी खुला है, यह उसे भी खूब पता है. मगर उसे समझने में इतने साल लग गये.अहं के टकराव की व्यर्थता , या तुष्टिकरण के अभाव से उपजे वितुष्ट की वह बेवजह भावनाएं, मित्रता के अदृश्य बंधनों को क्यूं खोल देती है, अभी तक समझ नहीं पाया.
आज याद आ गई वह कविता जो
जोग लिखी संजय पटेल की पर संजय भाई मित्रता दिवस पर लिख गये हैं -
दोस्त ऐसा
जिसे कहो कुछ नहीं
समझ जाए
लिखो कुछ नहीं
पढ़ ले
आवाज़ दो
उसके पहले सुन ले
मुझे गुण-दोष सहित
स्वीकार करे
ग़र चोट लगे उसे
दर्द हो मुझे
कमाल मैं करूँ
गर्व हो उसे
अवसाद से उबार दे
स्नेह दे , सत्कार दे
आलोचना का अधिकार दे
रिश्तों को विस्तार दे
दु:ख में पीछे खड़ा नज़र आए
सुख का सारथी बन जाए
सिर्फ़ एक दिन फ़्रेंड न रहे
दिन-रात प्रति पल
धड़कता रहे सीने में
हैसियत और प्रतिष्ठा से सोचे हटकर
वही मित्र मुझे लगे प्रियकर. मैं ऐसा मित्र बनना चाहता था, जतन भी कर यही पा भी लिया था और तसदीक भी कर ली थी अपने अंतर्मन से.मगर क्या खूब होता कि वह मित्र भी यही सोचता. छद्म आध्यात्म में उसने भी यही कहा कि यूं करना चाहिये , वो करना चाहिये .बाबाओं , और बापूओं की तरह उपदेशों में व्यस्त रहा, Holier than thou का मुखौटा पहनें .
मैं आतुर हूं उस मित्र से मिलनें जो अब इतने सावन गुज़रे फ़िर मिलेगा , या शायद नहीं भी मिले क्योंकि ये SMS भी उसनें मेरी बहन के फोन पर से रूट किया , उसे ये फोन नं. ना देने की गुज़ारीश कर. शायद मुझ से मिलने का साहस नहीं जुटा पा रहा होगा, या फिर कोई अहंकार की गांठ अभी भी कस के बांध रखी होगी .और अब मिलेगा तो क्या होगा? क्या मुझमें भी वही स्वच्छ सा , निर्मल सा, मित्र अभी बचा है? या वक्त के थपेडे ने, या इंद्रियों के अनियंत्रित घोडों पर सवारी करते करते, मैला हो गया है? अब कौन सा वाशिंग पावडर लाया जाये?
बहुत साल हुए,मैं , ये मित्र, और बहन तीनों किशोरावस्था में आध्यात्म की प्रेममयी दुनिया में एक साथ विचरते थे, स्त्री या पुरुष की संकल्पना से परे. आज मैं और मेरी बहन इस संसाररूपी भवसागर में अपनी गृहस्थी की नांव डाले सुख की अपनी अपनी अवधारणा पर कर्मयोग के रास्ते पर संतुष्ट चल रहे है.और मेरा वह मित्र, अपनी मर्ज़ी से अविवाहित रह कर भी नकारात्मकता के भंवर में पता नहीं अभी भी गोते खा रहा है.
सौ बातें उसनें कही थी आध्यात्म में आत्मा की शुद्धी के लिये, मगर एक सौ बातों की एक बात मैंने कही - Don't keep expectation.
आइंस्टाईन का ऊर्जा या एनर्जी का यह सिद्धान्त तो पढा ही होगा आपने.
E = m C Square
E = Energy
m = Mass
c = Velocity of Lightतो जनाब, मास को याने जडत्व को शून्य कर दो , तो प्रकाश की गति के वर्ग को शून्य से गुणा करने पर आयेगा Infinity, याने अनंत...

अहम , Ego, भौतिक जड़त्व की चाह को शून्यत्व की ओर ले जाना ही लक्ष्य है, कर्म करते हुए, भक्ति करते हुए. अनंत की ओर , चमत्कार की ओर यही सत्य ले जायेगा .
चांद और सितारों की तमन्ना नहीं,
रातों की स्याही या उजालों के इण्द्रधनुष की परवाह नही,
जीवन और मृत्यु का अंतर का बोध नहीं,
क्या यही मुक्ति है?,
शायद..
मुझे तो मुक्ति की भी दरकार नहीं...
लिखना या आपको बताना कितना भला लगता है, नही?
चलिये छोडिये , संवेदनाओं के परे भी तो दुनिया होगी.ज़ख्मों की फ़िर से मरहम पट्टी भी तो करनी है.भरम बनाये रखना है.
मीरा नें तो कहा ही है,
जो मैं ऐसा जानती, प्रेम किये दुख होय,
नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम ना करिये कोय..