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Friday, March 6, 2009

मुशर्रफ़,क्रिकेट, और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

चलो, वहां पाकिस्तान में भी ३/३ हो गया. हमारे ज़ख्म २६/११ के अभी ताज़े हैं, और लाहौर के ज़ख्मों से कुछ को सुकून मिला होगा तो कोई ये सोच रहा होगा, कि क्या ये कभी थमेगा? कोई कह रहा है श्रीलंका की क्रिकेट टीम को - और जाओ, कहा था तो माने नहीं, अब भुगतो.


वैसे ,श्री लंका की टीम की क्या गलती. आपने देखा नहीं , पैसे के लिये आदमी क्या क्या नहीं करता.कितने हैं जो देशसेवा(?) करने को उद्युत रहते है.(चुनाव पास है). ये जो सेना में हैं उन्हे जान की क्या परवाह नहीं? चलो , देशभक्ति भी तो कोई चीज़ है, मगर उन भाडे के सैनिकों का क्या, जिनका काम ही है युद्ध करना, पैसे लेकर. कसाब को आपने सुना नही कबूल करते हुए कि ये सब इसलिये मारा कि देड लाख रुपये मिल रहे थे?क्या पुलिस, या जोखिम वाली नौकरी आदमी थ्रिल के लिये कर रहा है? The whole thing is that सबसे बडा रुपैय्या !!

वैसे ये बात तो शर्मनाक है, कि जिस सिक्युरिटी की बातें पाकिस्तान को देनी थी वह नाकाम रहा.मगर ,हम कतई मुतमयीन ना हों इस बात पर कि क्या बेवकूफ़ है वे, और हमारी सिक्युरिटी बडी पुख्ता है.

भारत का भी हाल यही है जनाब. किसी को कोई ज़ेड सिक्युरिटी नही.( २० नेताओं को छोडकर,जो खत्म भी हों तो देश को कोइ फ़रक नहीं पडेगा)

अभी अभी नवंबर में इंग्लॆंड की टीम आयी थी इन्दौर , एक अंतरराष्ट्रीय मॆच खेलने. एक दिन पहले दोपहर को प्रेक्टीस कर के भारतीय टीम स्टेडियम से होटल जा रही थी तो मेरे सामने एक मोड पर उनकी बस को अचानक ब्रेक मारकर रुकते देखा, तो पाया कि एक साईकल उसके नीचे करीब करीब आ ही गयी थी, और संयोग से साईकलवाला बच गया था ,और खडा खडा कांप रहा था. दो हवलदारों नें हमारे सब के सामने आव देखा ना ताव , जो टूट पडे उसपर गाली और लातों की बौछार करते हुए. वो तो अच्छा हुआ कि ईशांत शर्मा नें ये देख कर बस से उतरकर उसको बचाया, और साईकल उठा कर उसे दी. (नया है, वर्ना युवराज की तरह नाक चढा कर बैठा रहता.)

बात यहां ये है, कि सब मिला कर ज़ेड सिक्युरिटी का क्या हुआ? ये वही दिन थे जब आतंकवादी सचिन और अन्य खिलाडीयों को अगुवा करने की मंशा में थे.पायलट कार तो कहीं दिखी ही नही.या तो आगे निकल गयी होगी या अंग्रेज़ टीम को सम्हाल रही होगी.

तभी कल जब जनाब मुशर्रफ़ को India Today के Annual Conclave में हमारे सभी संभ्रांत बुद्धीजीवीयों के बीच में सभी सीधे, उलटे और तीखे सवालों का जवाब देते हुए देखा सुना (टीवी पर), तो हर चीज़ पाकिस्तान के नज़रिये से समझने का मौका मिला.

मुशर्रफ़ नें माना कि अब यहां ये कतई ज़रूरी नहीं है हम पुरानी बातों को पकड कर बैठ जायें और रस्सी को सांप समझ कर पीटते रहे. इस प्रायद्वीप में अमन की बहाली के लिये दोनों देशों को मिलकर कदम उठान पडेंगे. उन्होने ये आशा जगाई कि जैसा कि उन्होने बडी शिद्दत और ईमानदारी के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच के कश्मीर मसले को और दूसरे मसाईलों को सुलझा की पूरी कोशिश की उसकी आज ज़रूरत है. दाऊद की बात को कन्नी काट कर उन्होने ये बात बडे साफ़ लहजों में कही कि पाकिस्तान तो victim है पश्चिम के सरमायेदारों की सियासत का जिसकी बेवारिस औलाद है अलकायदा और तालिबान और उनके यहां सभी, याने पाक की सरकार , फ़ौज और ISI उससे निपटने में लगी है, और हम सब यहां भारत में उनके विरुद्ध विषवमन कर रहें है.

वैसे, उनकी इस दलील को किसी नें माना नहीं पर आखरी में हमारे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मलिक की बात सोलह आने अचूक और मर्म तक पहुंची हुई थी और जिसने मियां मुशर्रफ़ को भी बेजवाब कर दिया. वह ये, कि भारत भी यही चाहेगा कि पाकिस्तान एक लोकतंत्र की सरकार के Politically Stable Governance से चले, आतंकवाद और अलगाववाद को उखाडनें में उनको अगर परेशानी आ रही है, तो हमें कहें , हम उनको वहां आ कर नेस्तनाबूत कर देंगे.

क्या खूब बात है. अगर hypocracy में नहीं है हमारी और पाकिस्तान की सरकार , तो क्या ही मज़ेदार समां होगा.

महिलाओं की स्थिती पर मुशर्रफ़ नें ये माना कि वहां हालात सही नहीं है, मगर क्या भारत में सही है?


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज ही है. मेरे ब्लोग पर मैने कल से लिख रखा है, कि हर मां , बहन और पुत्री को सलाम.इसमें जीवन संगिनी रह गई.

फ़िर मेरे समझ में लग गया कि नारी इस बारे में क्या सोच रही है. आज दिन भर से अलग अलग जगह से एक बात जो सभी नारीयां शायद चाहती है(य़ा जो नारीयां इतने प्रगतीशील माहौल से आयी है, जो ऐसा बयान देने की स्थिती में है)

आज नारी यह चाहती है, कि उसे सिर्फ़ नारी समझ कर ही मान्यता मिले, एक मां,पत्नी, बहन या बेटी के रूप में नहीं.

बात में दम है. वह एक महिला है सर्व प्रथम , बाद में ये बाकी सब रोल या किरदार. मगर फ़िर इन किरदारों से क्या दुश्मनी. भारत में जिस तरह के संस्कारों और परंपराओं का इतिहास है, और जो संस्कृति आज यहां है, पाश्चात्य देशों के संदर्भ में , तो नारी के यही रूपों ने तो आज की सामाजिक व्यवस्था मजबूत की है, सिर्फ़ महिला के रूप में नहीं. ये रूप है तभी तो नारी सत्यम, शिवम, सुन्दरम है.

चलो इस बात को विस्तार से अगले कडी में बहस करे> आप भी क्या कहना चाहेंगे? जरा खुल के कहें.
संयोग से पिछले कुछ दिनों में मेरे व्यवसायिक कार्य में एक ऐसा अनुभव मुझे आ रहा है, जो मेरी इस बात से बाबस्ता है. अगली कडी तक , जो plot या कथानक रच रहा है, उसका समापन भी हो जायेगा.

Friday, December 26, 2008

Comedy of Terrors-

आतंकवाद के ३० दिन...



२६/११ को पूरे ३० दिन हो गये है. ज़ेहन में अभी भी वो यादें बाबस्ता है, वह त्रासदी, वह कसक ,वह पीडा़, वह झटपटाहट, वह निराशावाद सभी बरकरार है, किसी भी हिंदी फ़िल्म के मसाले से भरपूर स्क्रीन प्ले की तरह.

मगर यह एहसास जब अपनी निरंतरता को प्राप्त कर जाता है, तो कहीं जाकर एक स्थाई भाव अख्तियार कर लेता है, जो किसी भी सूरत में आप के मानस से किसी भी रबड से मिटाया नही जा सकता.ये चित्र देखा. अभी कल ही एक चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई थी उन दिनों के स्मृतिचित्रों की.

मगर मेरे पास कुछ टोटके हैं , जिन्हे मै कभी कभी इस्तेमाल कर स्ट्रेस या भावनाओं के अतिरेक से प्रेशर कूकर की सीटी की भांति रिलीज़ कर लेता हूं, जो मान्यताओं से भी कभी कभी विपरीत होता है.इसे मैं Comedy of Terrors कह सकता हूं.

हां , मैं कॊमेडी या हास्य की बात कर रहा हूं. मुन्नाभाई की फ़िल्म में दॊ. अस्थाना को याद करें, जब खीज या गु़स्सा चरम सीमा से बढ़ जाता है तो वे हंसने लगते थे. मेरा अलग है थोडा, कि मैं उस पी्डा या वेदना में भी हास्य ढूंढ लेता हूं ताकि दिल की चुभन के अहसासात को थोडा तो कम किया जा सके.

वैसे मैं कोई बहुत गलत भी नहीं हूं. अमेरिका में पिछले दिनों जिन फ़िल्मों नें रिकॊर्ड तोड व्यवसाय किया है, उनमें कॊमेडी या व्यंग से भरपूर फ़िल्में या कार्टून फ़िल्मों का बाहुल्य रहा है. बाकी को देखें तो फ़ेंटासी की फ़िल्में भी उन्हे राहत दे रहीं है, इस जगव्यापी रिशेशन या आतंकवाद के भयनुमा स्ट्रेस से.

कोई इसी नकारात्मकता से देख कर पलायनवाद की परिभाषा में डाल सकते है.मगर क्या गालिब नहीं पूछ रहे हैं कि दिले नादां तुझे हुआ क्या है? , आखिर इस दर्द की दवा क्या है?

अब देखिये इस Comedy of Terrors को. शेक्सपीयर ने लिखा था Comedy of Errors. और यहां इस त्रासदी में भी हमें व्यंग या हास्य कैसे निकलता है ये देखें.

पहले तो नेताओं को ही याद कर लिजिये. गुस्से से ज़्यादा अब हंसी आती है जब हम याद करते है कि महाराष्ट्र के गृह मंत्री कहते है, कि ऐसे छोटे मोटे हादसे तो होते ही रहते है. मगर उन्हे क्या पता था कि ना केवल वे और उनके boss, मगर राष्ट्रीय मंच पर भी ग्रूह मंत्री ( जिनकी अपनी खुद की लॊंड्री की दुकान है वे, याद आये?)भी अपना जॊब खो बैठे.

केरल के मुख्य मंत्री का फोटो भी कुत्ते के गले में देख कर हंसी आयी. मेरे पडोसी कुत्ते नें भी एक दिन मौन रखा था जब मुझ पर गुर्राया नहीं.

मुझे याद है, उन दिनों मुम्बई में चेंबुर मोनोरेल के प्रॊजेक्ट के उदघाटन के पोस्टर पूरे शहर में लगे थे और बाद में उन्ही के साथ सभी पार्टियों के भी शहीदों को श्रद्धांजली देने के पोस्टर लग गये थे. उसमें कॊंग्रेस्स के पोस्तर पर देशमुख जी का वही हंसता हुआ चित्र लग गया था जो उदघाटन के पोस्टर पे था( मैं उसका फ़ोटो नहीं खींच पाया, क्योंकि किसी ने उसे उतारने की कवायद शुरु कर दी थी.

क्या होता अगर ताज़ होटल में आतंकवादीयों और एन एस जी के कमांडो के बीच की मुठभेड़ के दौरान लाईट चली जाती ? ( यहां भारत में संभव है). कोई आतंकवादी कमांडो से पूछता की भाई साहब माचिस देना तो ज़रा..., या फ़िर कहता हमारी टाईम्स है, या कच्ची है.( बचपन में हारते समय अपन नें बहुत बार टाईम्स ले लिया था या पदने से बचने से कच्ची कर लिया करते थे)


पाकिस्तान तो रोज़ रोज़ कॊमेडी कर रहा है. पूरा देश और अंतरराष्ट्रीय जगत देख रहा है, मान रहा है, सबूतों पे सबूत दिये जा रहें हैं. मगर हमारे पडोसी तो इन्कार पे इन्कार किये जा रहे हैं. अब हम हाथ जोड कर कह रहें है, कि भाई साहब हम आप पर हमला नहीं कर रहें है, मगर इनकी तो फ़ूंक ही खिसकी जा रही है, बेकार में युद्ध का माहौल खडा कर रहे है. अब अगर खुदा न खास्ता युद्ध हुआ तो पाकिस्तान नहीं बचेगा. मगर क्या हमारे नेतृत्व में इतना दम है?














अब ज़रा बेहन जी का टेरर देखिये. जी हां मायावती की. ( जी नहीं लगाऊंगा, क्षमा करें). अब एक इंजिनीयर की ये औकात हो गई कि मायावती के जन्मदिन पर ५० लाख का तोहफ़ा भी नही दे सकता. उसे क्या जीने का हक है, अगर आका का ये अपमान करे तो. मगर आप हैं कि बिना शरम कह रहीं हैं कि ये सब विपक्ष की चाल है.


एक कार्टून भी इसी पर छपा है जो आपकी नज़र है.(साभार दैनिक भास्कर)



मगर सबसे ऊपर, रेंकिंग नं. १ है यह बात कि हमारे अंतर्राष्ट्रिय चौधरी, भाईयों के भाई, आतंकवादीयों के सिरमौर जनाब बुश साहब को भी कोई जुता मार गया. क्या खूब बात है.


हमारे यहां लोगों को कब अकल आयेगी.
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