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Wednesday, January 28, 2009

स्वाधीन भारत का संविधान...

२६ जनवरी आई और चली गयी.२७ जनवरी को अखबारों को छुट्टी थी इसलिये आज २८ जनवरी को पूरे अखबार साठवें गणतंत्र दिवस की बासी खबरें लेकर हाज़िर हुए. किस नेता नें क्या कहा, किस स्कूल में बच्चों नें क्या किया, परेड में क्या हुआ आदि आदि.

आज से कई सालों पहले सन १९५० में जब स्वाधीन भारत का यह संविधान बना तब हम भारतीयों नें अच्छे नागरिक के कर्तव्यों को समझा और उसपर अमल करने की कसम खाई. आज इतने सालों बाद, किसी को भी ये याद नहीं है, मगर अपने मूल अधिकारों से भी आगे बढ कर अपने अपने निजी , राजनैतिक या जातिगत स्वार्थों के लिये लढ़ना, हडताल करना , मारपीट और दंगे करना, आदि याद रहा.



मेरी आप सब से इल्तेजा है, कि अपने अपने गरेबां में झांक कर क्या देखना गंवारा करेंगे, कि हम इस संविधान की मूल तत्वों से कितने प्रामाणिक है? मेरा मानना है, कि जो भी व्यक्ति इस ब्लोग जगत में है, वह प्रामाणिक तो ज़रूर है, इसीलिये ये गुस्ताखी कर रहा हूं.वह इसलिये कि जब भी कोई लेखक, या कवि या संगीत का तान सेन या कान सेन है,उसका ज़मीर, अखलाक़ , या morality का अपना एक उच्च स्तर होना लाज़मी है, या यूं कहें -prerequisite है.

एक बढिया quote है जो यहां प्रासंगीक है-

The measure of Man's Real Character is what he would Do,if he knew he would never be found out........

Sunday, January 25, 2009

जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है..


ये है मुंबई मेरी जान...

पिछले दो तीन दिनों से मुंबई में था, और काम की आपाधापी में चाह कर भी लिख नही पाया.

मुंबई में एक खबर बडी जोरदार ढंग से उछल रही है. Slumdog Millionaaire को ओस्कर के लिये नामांकित किया गया और हमारे भारतवासी बल्ले बल्ले हो गये. मानाकि फ़िल्म बनाने वाले फ़िरंगी हैं, बाकि तो सभी आपला माणूस हैं , ( याने खालिस हिन्दुस्तानी).

बात मे दम तो है. रहमान , गुलज़ार और फ़िल्म का विषय, एक स्लम के छोकरे का करोडपती बनना बावजूद इसके कि यहां सिर्फ़ गरीबी ही नही, भूकमरी के साथ गुनाहों का दलदल, धार्मिक दंगे, Child prostitution, और सबसे अधिक परेशान करने वाली बात याने कि भारत की छवि का घिघौना चित्रण, यथार्थवादी चित्रण, जिसमें टूरिस्ट के साथ छलावा और धोखा शामिल है.

सोचा फ़िल्म देख ही आये, तो देख ली.

सबसे पहले तो वह चित्रण जिसमें फ़िल्म सभी फ़ेमों में डार्क कलर्स में और मूल रंगों में भडकिली और कंट्रास्ट लिये दृष्य. अमूमन, ज़िन्दगी के सभी रंग, ग्रे शेड लिये, कहीं पेस्टल रंगों में, कहीं soothing तो कहीं चटकिले होते है. आजकल डिजिटल शूट की वजह से Post production में रंगों को थीम की तरह उभारने का चलन बढ गया है. यही वजह है, कि इतनी अच्छी फ़िल्म देखने के बाद भी मन में कडवाहट और मायूसी भर गयी. इस विवाद में ना जाकर कि क्या ये सही है, हम अपने आप से पूछें कि क्या ये सत्य भयावह नहीं , और हमारे कर्णधारों ने, राजनीति और सामाजिक नेताओं ने इस देश को दुहा है, निचोडा है, अपने स्वार्थ के लिये.और हम आम नागरिक, दूसरों की तरफ़ मूंह कर जेब में हाथ डालकर राह देख रहे हैं कि कोई और आकर जादु की छडी से स्थिती बदल देगा.


मगर रात को टीव्ही पर गुरुदत्त की प्यासा का गीत देखा- जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है..तो एक बात पर मन सोच में पड गया.

१९५७ की फ़िल्म में, Black & White में भी सिर्फ़ ग्रे शेड में बदनाम बस्ती का वह घुटन भरा , मन पर बोझ बढाता, माहौल का यथार्थ वादी चित्रण. कहां था ओस्कर तब? नहीं चाहिये ओस्कर का ठप्पा.जागतिक स्तर के इस फ़िल्म के बाद आज ५० साल से ज़्यादा हो गये, भारत की स्थिती कहीं बदली है? कहां हैं वे सभी ? २६ जनवरी के एक दिन पहले हम अपने आपसे पूछें - जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो आज भी कहां है?
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