Monday, March 23, 2009

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ,महिलायें और विशिष्ट संयोग !!!

अर्धनारीश्वर नटराज..

मेरी पिछली पोस्ट पर मैने समयाभाव के कारण दो विषयों पर एक साथ पोस्ट की थी, जिसके कारण , विश्व महिला दिवस पर मैने कुछ पूछा था उस पर प्रतिक्रिया कम आयी.

मगर क्या करूं, इन दिनों लगभग हर हफ़्ते तीन दिन बाहर हूं. अभी अभी नागपुर जा कर आया, जहां साले के बेटे की जनेऊ थी और साथ ही प्रोजेक्ट का काम भी. फ़िर मुम्बई और पुणें.

मैने एक बात आपको अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में बताई नही, वह ये कि इन दिनों मैं एक अंतरराष्ट्रीय महिला के साथ काम कर रहा हूं. युरोप के फ़ेशन परिधान के एक बडे चेन ग्रुप नें इंदौर के पास पिथमपुर में एक गारमेंट कारखाना डाला है, जहां हर दिन ६००० वस्त्र बनेंगे छोटे, बडे, विशेष कर महिलाओं के लिये ,सिर्फ़ युरोप मार्केट में एक्सपोर्ट के लिये.

पिथमपुर हिन्दुस्तान का डेट्रोइट कहा जाता है, क्योंकि यहां ओटोमोबाईल इंडस्ट्री के बडे बडे नामचीन ब्रांडस के कारखाने है.कायनेटिक होंडा स्कूटर, आइशर मोटर्स,हिन्दुस्तान मोटर्स, ब्रिजस्टोन,एल एंड टी केस (भारी मशिनेरी),बजाज टेम्पो,आदि.साथ ही में कपास का बेल्ट होने के कारण धागे से लेकर गारमेंट बनाने के कारखाने है.उसी की कडी में ये फ़ेक्टरी जोइंट वेंचर में डाली गयी है जिसकी मुख्य कार्यपालक अधिकारी (C E O ) है मिस राया, जो इटालीयन है. ( संयोग से हमारे देश की सरकार की CEO भी इटालियन ही है!!)

हालांकि इस कंपनी के प्रेसिडेंट भी है श्री गुप्ता , मगर उनकी हालत श्री मनमोहन जी जैसी ही है. पूरे प्रॊडक्शन की , तकनीकी मशिनरी और प्लांट के लिये मॆडम ही जिम्मेदार है. मुझे इस प्लांट में स्ट्रक्चर्स ,स्पेस फ़्रेम केनोपी, मटेरीअल हॆंडलिंग ऒटोमेशन ,और अन्य कामों के डिज़ाईन और इंस्टालेशन का काम मिला है, एक कंसल्टंट की भूमिका में, तो मिस राया से ही वास्ता पड रहा है.

दुर्भाग्य से इससे पहले के सिविल कार्य और अलग अलग प्लांट्स के एक्ज़ीक्युशन में हमारे देश के लोगों नें समय पर काम नही कर के दिया, जिससे मॆडम के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में किये गये कमिटमेंट्स झूठे पड गये. इसलिये स्वाभाविक तौर पर शांत यह महिला पिछले दिनों बहुत ही गुस्सैल , उग्र और अधीर हो गयी है. ऊपर से उसे अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं आती. तो ठेकेदार भी मुंह तकते हैं.इसलिये मुझसे भी वह पहले ऐसा ही कुछ पेश आयीं.

चूंकि मेरा काम अंतरराष्ट्रीय कंपनीयों से काफ़ी पड रहा है, मुझे काम के प्रति Accountibilty और समय की प्रतिबद्धता का काफ़ी शऊर है.मगर , इस तरह से किसी पूर्वाग्रह के रहते मैं काम नहीं कर सकता. इसलिये मैंने उन्हे मना कर दिया. मेरे साथियों ने मुझसे यही कहा कि आप एक स्त्री के नीचे काम नहीं कर सकते.शायद आपका ईगो आडे आता है.

यह बात तो अजीब ही है. काम में उच्च दर्ज़े की professionalism में विश्वास होने के कारण और साथ में एक कलाकर्मी का दिल होने की वजह से सभी तरह के ईगो के पाश से दूर हूं(शायद यही कमज़ोरी है).

मगर जब बाद में उस महिला नें मेरा काम के प्रति समर्पण और उनके युरोप में चल रहे अत्याधुनिक ऒटोमेशन सिस्टम का डिज़ाईन कर के दिया (वह भी समय पर) तो उसनें भी माफ़ी मांगी.

पिछले दिनों पता चला कि इटली और मॊरिशस से चार फ़ॆशन डिझाइनर्स आने वाले थे तो वहां के सभी भारतीय अफ़सर और कर्मचारी और हैरान होने लगे, कि एक से ही परेशान है, और चार को कैसे झेलेंगे?साथ ही में पुरुष के परंपरागत वर्चस्व के संस्कारों का पत्थर गर्दन पर किसी बैल की तरह ढोते हुए उन व्हाईट कॊलर बंदों को जब पता चला कि वे चार डिझाइनर्स भी महिला ही है, और पूरे प्लांट्स की देखरेख भी उन्हीके जिम्मे रहेगी, तो उनकी डाह और कुंठायें मन की बावडीयों से उठ कर सतह पर आ गयी.और अब पता चल रहा है, कि कटिंग, स्टिचिंग,एक्सेसरी फ़िटिंग, और आयरनींग का काम भी सभी महिलायें ही करेंगी!!!(शायद प्लांट के मेंटेनेंस या रख रखाव के लिये तो पुरुष ही होंगे). तो महिलायें खुश हो जायें कि यह सभी व्यवस्थायें संभव हो रही है, और डंके की चोट पर सफ़लता के कदम चूमेंगी.

मगर मेरी बात अभी खतम नही हुई है.

मुझे एक गारमेंट हॆंगर का कन्वेयिंग सिस्टम डिज़ाईन करना था. मिस राया नें एक ऐसा कंसेप्ट दिया जो उनके मॊरिशस के प्लांट में अभी चल रहा है. मगर मेरी परेशानी ये थी कि वह सिस्टम पुराना है, और आज हिंदुस्तान में और संसार में इससे बेहतर और Convenient सिस्टम आ गये है. लगभग इसी तरह से इससे ज़्यादा Complicated सिस्टम मैने अभी दोहा (कतर) के एयरपोर्ट के कार्गो के लिये किया है. मगर मिस राया नें नही समझा, और समझने का समय भी नही है. ऐसे में बडी कोफ़्त होती है, एक creative व्यक्ति के लिये.विशेषकर इस बात का एहसास कि चूंकि मैं भारतीय हूं , हम कहीं इन युरोपीयन रेस से कमतर हैं, इनकी निगाह में.

अभी परसों , उन चार महिलाओं से भी वास्ता पडा. अब एक और दिक्कत पेश आयी इनके साथ. मिस राया तो थोडी बहुत अंग्रेज़ी जानती थी , अमर इनको तो सिर्फ़ इटालीयन ही आती है.मगर भगवान की कृपा रही कि उन्होने मात्र इशारों से बताई हुई सिस्टम मुझे समझ में आ रही थी और उन्हे भी बडी राहत पहुंची , क्योंकि वे विश्वास नही कर पा रहे थे.वह शायद इसलिये संभव हुआ कि मैने जिन प्रॆक्टिकल , और लॊगिकल बातों का ध्यान रखा उसमें मूल तत्व था ये कि इसे महिलाओं द्वारा ही संचालित करना था, और ऒपरेट भी करना था. इंटेरियर डिज़ाईन करते हुए, जब मैं किचन का डिज़ाईन करता था, तो यही बात ध्यान देने की वजह से गृहिणी के मन की बात समझ जाता था.(कौन कहता है आर्किटेक्ट को एक अच्छा मनोवैग्यानिक नही होना चाहिये)

अब सबसे मज़दार बात. तीन दिन पहले मैं पुणे में था, एक ऐसे कारखाने में जहां से मै अपनी डिज़ाईन के अनुसार सिस्टम बनवा सकता हूं और सप्लाई करवा सकता हूं.वहां जनरल मेनेजर (प्रोजेक्ट) से मेरी मुलाकात तय हुई थी जिसके लिये एक महिला से मेरी बात फ़ोन पर हुई थी.जब मैं वहां पहुंचा, वही महिला ने मेरा स्वागत किया, जिनका नाम था नैना (नैनो नही!!)

मैने पहुंचते ही उनसे कहा कि मुझे जल्दी से वापिस जाना है मुम्बई जहां शाम को फ़्लाईट पकडनी थी, तो उन्होने मुझे चौंका दिया. वह बोली, मैं स्वयं G M हूं और आपके साथ इस डिज़ाईन पर काम करूंगी.( उन्हे इस काम का १७ साल का अनुभव था ).यकीन मानिये, पहले तो मैं थोडा सोच में पड गया. सदियों से पडे संस्कार का एक मिनीट तो असर पड ही गया था शायद. मगर मेरी शंका उसकी काबिलियत से अधिक इस बात पर ज़्यादा थी कि शायद डिज़ाईन के comlications को समझा जायेगा या नही, क्योंकि ये अपेक्षाकृत एक नया की कंसेप्ट था, विश्व में और भारत में भी.(इसके बारे में एक अलग पोस्ट लिखूंगा, उनके लिये जिन्हे इस बात की उत्सुकता होगी कि ऐसा क्या है जो इस इक्कीसवीं सदी में भी नया है)

बस दो घंटे का ही समय था हमारे पास, और आनन फ़ानन में काम बडे ही सुगमता से और संतोषप्रद तरीके से विकसित होने लगा. देड घंटे में तो मैने उनकी फ़ेसिलिटीज़ भी देखी, और अंत में वे मुझे अपने M D से मिलाने ले गयीं. मैं फ़िर से चौंक पडा. वे भी एक महिला ही थी. मेरा मन इस अजीब और सुखद संयोग से खुश हो गया. मैं एक ऐसा सिस्टम डिज़ाईन कर रहा था जिसे एक महिला गारमेंट फ़ेक्टरी में लगना था, जिसे चलाने वाले और उपयोग करने वालीं भी महिलायें ही है, और अब ये भी संयोग रहेगा कि इसे manufacture करने वाली कंपनी भी महिलाओं द्वारा ही संचालित हो रही है!!

मैनें झट से उन महिलाओं से कहा कि आप बस दो दिन में इंदौर आ जायें और अपना ऒफ़र मिस राया को दे दें जो, एक हफ़्ते यहां रहती है, और अगले हफ़्ते इटली की मौजूदा फ़ॆक्टरी में. मगर उन विदुषी महिलाओं ने माफ़ी मांगी. नैना जी बोलीं, एक परेशानी है. मेरे बेटे की अभी दसवीं की महत्वपूर्ण परिक्षा चल रही थी, इस लिये, वे चाहेंगी कि इसके बाद ही वे इण्दौर आ सकेंगी. MD भी चूंकि स्वयं नारी ही थी, तो इस बात को उसनें भी पूरी सपोर्ट के साथ मानी भी.

मैं सोचने लगा, आज नारी कहां कहां पहुंच कर कार्य कर रही है. मगर सामाजिक व्यवस्थायें और मान्यतायें भी यही बात रेखांकित कर रही हैं कि स्त्री का सर्व प्रथम कर्तव्य है एक मां का, जो नैना नें निभाया. कोई आधुनिक विचारों वाली महिला शाय्द इसे पुरातनवादी , या बंधुआ मजदूरी के समक्ष रखेगी. मगर शायद यह कायनात, ये संस्कृति, ये सिविलाइज़ेशन, सभ्यता , आज इसीलिये टिकी है, कि एक मां ने अपने सबसे प्रथम कर्तव्य को पहचाना है, कि उसे एक अगली पीढी का निर्माण भी तो करना है. क्या ये महान कार्य एक पुरुष अंजाम दे सकता है?(आप क्या कहते है?)

मैने उस मां को मन ही मन सल्युट किया, और समय नही होने के बावजूद उस मां के जज़बे की कद्र कर खुशी खुशी लौट आया.(अब चाहे मां रुठे या बाबा, मैने तो हां कर दी)

अब आप ये कहेंगे कि इस कडी में अब सिर्फ़ एक ही पुरुष है, और वह है मैं.

मगर जरा अपनी सीट पर ठीक से बैठ जायें और गौर से पढें मेरी बात..

मीरा जी नें क्या खूब कहा था--

इस जगत में सर्व शक्तिमान ईश्वर ही एक मात्र पुरुष तत्व है, बाकी हम सभी स्त्री तत्व ही तो है....!!

क्या कहते हैं आप?

Friday, March 6, 2009

मुशर्रफ़,क्रिकेट, और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

चलो, वहां पाकिस्तान में भी ३/३ हो गया. हमारे ज़ख्म २६/११ के अभी ताज़े हैं, और लाहौर के ज़ख्मों से कुछ को सुकून मिला होगा तो कोई ये सोच रहा होगा, कि क्या ये कभी थमेगा? कोई कह रहा है श्रीलंका की क्रिकेट टीम को - और जाओ, कहा था तो माने नहीं, अब भुगतो.


वैसे ,श्री लंका की टीम की क्या गलती. आपने देखा नहीं , पैसे के लिये आदमी क्या क्या नहीं करता.कितने हैं जो देशसेवा(?) करने को उद्युत रहते है.(चुनाव पास है). ये जो सेना में हैं उन्हे जान की क्या परवाह नहीं? चलो , देशभक्ति भी तो कोई चीज़ है, मगर उन भाडे के सैनिकों का क्या, जिनका काम ही है युद्ध करना, पैसे लेकर. कसाब को आपने सुना नही कबूल करते हुए कि ये सब इसलिये मारा कि देड लाख रुपये मिल रहे थे?क्या पुलिस, या जोखिम वाली नौकरी आदमी थ्रिल के लिये कर रहा है? The whole thing is that सबसे बडा रुपैय्या !!

वैसे ये बात तो शर्मनाक है, कि जिस सिक्युरिटी की बातें पाकिस्तान को देनी थी वह नाकाम रहा.मगर ,हम कतई मुतमयीन ना हों इस बात पर कि क्या बेवकूफ़ है वे, और हमारी सिक्युरिटी बडी पुख्ता है.

भारत का भी हाल यही है जनाब. किसी को कोई ज़ेड सिक्युरिटी नही.( २० नेताओं को छोडकर,जो खत्म भी हों तो देश को कोइ फ़रक नहीं पडेगा)

अभी अभी नवंबर में इंग्लॆंड की टीम आयी थी इन्दौर , एक अंतरराष्ट्रीय मॆच खेलने. एक दिन पहले दोपहर को प्रेक्टीस कर के भारतीय टीम स्टेडियम से होटल जा रही थी तो मेरे सामने एक मोड पर उनकी बस को अचानक ब्रेक मारकर रुकते देखा, तो पाया कि एक साईकल उसके नीचे करीब करीब आ ही गयी थी, और संयोग से साईकलवाला बच गया था ,और खडा खडा कांप रहा था. दो हवलदारों नें हमारे सब के सामने आव देखा ना ताव , जो टूट पडे उसपर गाली और लातों की बौछार करते हुए. वो तो अच्छा हुआ कि ईशांत शर्मा नें ये देख कर बस से उतरकर उसको बचाया, और साईकल उठा कर उसे दी. (नया है, वर्ना युवराज की तरह नाक चढा कर बैठा रहता.)

बात यहां ये है, कि सब मिला कर ज़ेड सिक्युरिटी का क्या हुआ? ये वही दिन थे जब आतंकवादी सचिन और अन्य खिलाडीयों को अगुवा करने की मंशा में थे.पायलट कार तो कहीं दिखी ही नही.या तो आगे निकल गयी होगी या अंग्रेज़ टीम को सम्हाल रही होगी.

तभी कल जब जनाब मुशर्रफ़ को India Today के Annual Conclave में हमारे सभी संभ्रांत बुद्धीजीवीयों के बीच में सभी सीधे, उलटे और तीखे सवालों का जवाब देते हुए देखा सुना (टीवी पर), तो हर चीज़ पाकिस्तान के नज़रिये से समझने का मौका मिला.

मुशर्रफ़ नें माना कि अब यहां ये कतई ज़रूरी नहीं है हम पुरानी बातों को पकड कर बैठ जायें और रस्सी को सांप समझ कर पीटते रहे. इस प्रायद्वीप में अमन की बहाली के लिये दोनों देशों को मिलकर कदम उठान पडेंगे. उन्होने ये आशा जगाई कि जैसा कि उन्होने बडी शिद्दत और ईमानदारी के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच के कश्मीर मसले को और दूसरे मसाईलों को सुलझा की पूरी कोशिश की उसकी आज ज़रूरत है. दाऊद की बात को कन्नी काट कर उन्होने ये बात बडे साफ़ लहजों में कही कि पाकिस्तान तो victim है पश्चिम के सरमायेदारों की सियासत का जिसकी बेवारिस औलाद है अलकायदा और तालिबान और उनके यहां सभी, याने पाक की सरकार , फ़ौज और ISI उससे निपटने में लगी है, और हम सब यहां भारत में उनके विरुद्ध विषवमन कर रहें है.

वैसे, उनकी इस दलील को किसी नें माना नहीं पर आखरी में हमारे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मलिक की बात सोलह आने अचूक और मर्म तक पहुंची हुई थी और जिसने मियां मुशर्रफ़ को भी बेजवाब कर दिया. वह ये, कि भारत भी यही चाहेगा कि पाकिस्तान एक लोकतंत्र की सरकार के Politically Stable Governance से चले, आतंकवाद और अलगाववाद को उखाडनें में उनको अगर परेशानी आ रही है, तो हमें कहें , हम उनको वहां आ कर नेस्तनाबूत कर देंगे.

क्या खूब बात है. अगर hypocracy में नहीं है हमारी और पाकिस्तान की सरकार , तो क्या ही मज़ेदार समां होगा.

महिलाओं की स्थिती पर मुशर्रफ़ नें ये माना कि वहां हालात सही नहीं है, मगर क्या भारत में सही है?


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज ही है. मेरे ब्लोग पर मैने कल से लिख रखा है, कि हर मां , बहन और पुत्री को सलाम.इसमें जीवन संगिनी रह गई.

फ़िर मेरे समझ में लग गया कि नारी इस बारे में क्या सोच रही है. आज दिन भर से अलग अलग जगह से एक बात जो सभी नारीयां शायद चाहती है(य़ा जो नारीयां इतने प्रगतीशील माहौल से आयी है, जो ऐसा बयान देने की स्थिती में है)

आज नारी यह चाहती है, कि उसे सिर्फ़ नारी समझ कर ही मान्यता मिले, एक मां,पत्नी, बहन या बेटी के रूप में नहीं.

बात में दम है. वह एक महिला है सर्व प्रथम , बाद में ये बाकी सब रोल या किरदार. मगर फ़िर इन किरदारों से क्या दुश्मनी. भारत में जिस तरह के संस्कारों और परंपराओं का इतिहास है, और जो संस्कृति आज यहां है, पाश्चात्य देशों के संदर्भ में , तो नारी के यही रूपों ने तो आज की सामाजिक व्यवस्था मजबूत की है, सिर्फ़ महिला के रूप में नहीं. ये रूप है तभी तो नारी सत्यम, शिवम, सुन्दरम है.

चलो इस बात को विस्तार से अगले कडी में बहस करे> आप भी क्या कहना चाहेंगे? जरा खुल के कहें.
संयोग से पिछले कुछ दिनों में मेरे व्यवसायिक कार्य में एक ऐसा अनुभव मुझे आ रहा है, जो मेरी इस बात से बाबस्ता है. अगली कडी तक , जो plot या कथानक रच रहा है, उसका समापन भी हो जायेगा.

Sunday, March 1, 2009

काले बंदर का बाल, मसक्कली, और गली का चौकिदार...

अब एक महिना पूरा चला गया नई पोस्ट के लिये. पता नहीं , मन में कई छोटे बडे विचार आकर ऊंगलीयों के कोने तक टंग जाते हैं, और की बोर्ड पर फ़िसलने को आतुर रहते है.एक कहानी की शक्ल की रेत की मूर्ति हर दिन मन में बनती है, और दूसरे दिन समय के समंदर की लहरों में घुल जाती है.

घर में शादी थी, बडे कज़िन के छोटे बेटे की शादी . सभी रिश्तेदार , दोस्त ,अपने, नये , पुराने ....फिर से मिले लीज़ रिन्यु करने जैसे, और ऊपर से नये प्रोजेक्ट की तल्खी..

वैसे कज़िन बोलते या लिखते ऊंगलियां कांपती हैं, क्योंकि बचपन से संयुक्त परिवार के आनंद को जीया है .तीनों भाईयों के परिवार के हम सब 10 भाई बहन है, तो जब कोई पूछ बैठता था तो कह देते कि १० भाई बहन है हम सब, तो चकित रह जाता था.

इन्ही दिनों हमारे कालोनी में हमारी गली या लेन की सीमेंट की सडक बनना शुरु हुई. सोचा दो दो कारें है, दो स्कूटर है, रखेंगे कहां? तो बिटिया एक स्कूटर तो अगली गली में अपने मित्र की मां के पास चली गयी कि मौसी के यहां रख देंगे.मगर वहां तो पहले से ही चार स्कूटरें खडी दिखी. अच्छा हुआ कि मौसी नें निराश नहीं किया,बस कारों की आफ़त थी. टेप वगैरे निकाल कर पिछली लेन में रख देंगे ये सोच कर जब रख दी, और सुबह जब आफ़िस के प्युन के साथ लेने गये तो चौकिदार नें अडा दिया- बाबुजी, गाडी यहां नहीं रख सकते. वह उस लेनवालों के चंदे का जाया था इसलिये कुछ जिरह करने की बजाय, उससे प्रेम से ,मुस्कान का लिफ़ाफ़ा थमाते हुए कहा कि भाई हमारे यहां प्राब्लेम है इसलिये रखा है. मेरे प्युन को लगा मेनेज करना पडेगा, जिस के लिये कटकट कर रहा है, तो उसनें कहा, भै्य्या देख लेंगे..

तो सोच के विपरीत वह बोला, साहब, रात को जब आप रख कर चले गये तो लगा कहीं मिलने आये होंगे, चले जायेंगे. मगर जब नहीं आये तो मैं रात भर किसी आशंका से परेशान रहा, और गाडी के पास ही चक्कर काटता रहा. यहां इस गली में हर चीज़ मेरी जिम्मेदारी पर है.इसलिये आप इस गाडी को रख सकते हैं मगर मेरी गुमती की पास के खाली प्लॊट पर ताकि मैं नज़र रख सकूं.

हम सभी तभी परिक्षा के मंजर से गुजरते है, जब इस तरह के छोटे मगर महत्वपूर्ण अनुभवों से गुज़रते है. जिसे मेनेज करने चले थे उसने ही सरल और आत्मीय व्यवहार से हमें मेनेज कर दिया.

मुझे एक शेर याद आ गया जो कहीं पढा था -(कुछ इसी तरह)

मेरी मां न जाने कितनी ही रातें सो नहीं पायी,
मैने कभी ऐसे ही कह दिया था कि डर लग रहा है.


तब से दोनों गाडीयां हर रात को वहां लगती थी. सुबह का चौकिदार हमेशा घूर घूर कर देखता रहा, सोचा उसे तो कुछ देना ही पडेगा, मगर उसकी नज़र से यूं लगता था कि हम कोई गुनाह कर रहें है, इसलिये मैने पत्नी नेहा से कहा था कि रात वाले को ज़रूर दे देंगे, इन्सानियत का तकाज़ा है. हम हर महिने में एक बार तो मल्टीप्लेक्स में जब फ़िल्म देखनें जाते है, तो सहज ही ६-७०० रुपये लग जाते है.तो सोचा कितना ठीक रहेगा? १००-२००-५००? समझ नही आया,सोचा जब आयेगी तो देखेंगे.

आज अभी हम एक फ़िल्म देखनें गये थे, आखरी शो.देहली -६. किसी नें कहा बोर है, ६-७ सौ डूब जायेंगे. मगर कल टूर पर निकल रहा हूं तो सोचा परिवार के साथ देख ही लेते हैं.किसी कारणवश थोडा लेट हो गये थे तो मल्टीप्लेक्स एड्लेब की बजाय पास की श्रमिक बस्ती से लगी टाकीज़ में चले गये. १५० रु. की जगह ६० रु. का टिकट देख कर संतोष हुआ.नेहा वैसे भी नाराज़ थी , बेटा भी कि कहां ले आये हो. मैने कहा- देखो, एक तो आर्थिक मंदी है, दूसरा फ़िल्म की अच्छी रिपोर्ट नहीं है,तो रिस्क कम रहेगी. तीसरे, तुम तो रात को हर फ़िल्म में झपकी ज़रूर लेती हो, तो क्या फ़रक पडेगा तुम्हे.

हर चीज़ के दो पहलू थे. टाकीज़ में पुराने दिनोंकी यादें अस्त व्यस्त हर कोनें में छिटकी पडी थी मेरे लिये. स्टाल की जाली वाली लाईन में फ़िल्म के पहले शो के लिये सुबह से लाईन लगाना याद आया. बाद में मच्छरदानी के किसी खुले कोने में से घुसने वाले मच्छरों की भांति हाल मे घुसने के बाद बिना नम्बर की सीटॊं पर पंखे के नीचे बैठने की वो कवायद भी याद आयी. ( १० पैसे में कोकाकोला पिया था जाली में से हाथ बाहर निकाल कर).मगर ,नेहा और बेटे अमोघ के लिये कुछ असहज सा अनुभव.

यहां तो बालकनी खाली पडी थी, फ़िर भी किसी पंखे के नीचे बैठ गया. पहले गेट कीपर जहां बिठा रहा था जिस पंखे के नीचे, तो मना कर दिया, क्योंकि पता था वह पंखा चलते हुए शोर करता था. आज भी इतने सालों में मैं वही, पंखा वही, और शोर वही.(या कुछ बढ गया)अब तो सभी पंखे शोर कर रहे थे.

फ़िल्म शुरु हुई, सामने की सीटों के पिछवाडे में पडी पान की पींक की महक लेते हुए,मसक्कली गाने पर नीचे से आती हुई सीटीयां और फ़ब्तियां कसने का पुराना नोस्टालजिया वाला माहौल , खटमलों का अंदेशा लिये फ़िल्म देखी.इंटरवल में समोसे खुले है, इसलिये नहीं खाये, क्रीमरोल मिल गया पन्नी में लिपटा तो बेटे अमोघ को दिलाया,खारे दाने लिये और खुद मौसम का पहला कोल्ड ड्रिंक पिया. ३५ रु में वह सब लिया जो २०० रु. में लाईन मे लग कर एडलेब में लेते थे(दाने और क्रीमरोल कहां मिलेंगे वहां?). ५०० रुपये बच गये जनाब.

फ़िल्म तो अच्छी लगी. पुरानी दिल्ली का एम्बियेंस , वातावरण निर्मिती अच्छी की है. ज़रा हेंडलिंग अलग है, केमेरे मूव्हमेंट और गंगा जमुनी तेहज़ीब, एक सहज सा अहसास. मैं भी एयर कंडीशन मल्टीप्लेक्स की जगह ज़मीन से जुडा, अपने ओहदे, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऊंची नाक को पार्किंग किये गये कार में छोड आया था.पत्नी नें भी बडे दिनों बाद पूरी फ़िल्म देखी.(क्या करे)

बाद में काले बंदर के हमले में पुरानी हिंदी फ़िल्मों की रेसेपी घोल कर ओम प्रकाश मेहरा नें हमें पिलाया.फ़िल्म की रामलीला में सीता हरण पहले होता है, बाद में शबरी के बेर, इस पर बेटे की आपत्ती को खारीज कर अपने अपने मन के अंदर छिपे काले बंदर के अस्तित्व को नकारते हुए हम सभी मानसिक जन गण मन करते घर लौटे.

चूंकि रोड बन चुका था हमने सीधे घर में गाडी पार्क की. रात के एक बजे थे, पत्नी नें कहा चौकिदार का क्या किया? मैने सोचा कल शाम को तो बाहर चला जाऊंगा, और सुबह वाले चौकिदार को तो एक पैसा नहीं देना है, क्योंकि उसका घूरना मन को खंरोच मार गया था.वह रात वाला भी सोचेगा कि साहब की गाडी अब नही लगेगी, और साहब गच्चा दे गये,इनाम नही दिया.काला बंदर मन के कोने में दुबके बैठा होगा यूं एक पल लगा. लेकिन नहीं, रावण के साथ फ़िल्म में ही हम सभी उसे जला कर आये थे.लेकिन शायद उसका बाल रह गया होगा.मन दुविधा में था.

तो मन नें निश्चय किया कि अभी जायेंगे और और चौकिदार को पैसे (इनाम) दे आयेंगे. नेहा नें कहा, ज़रा ठीक ही देना. अब ठीक से क्या मतलब, मैने पूछा- कम या ज़्यादा? तो उसनें कहा कि थोडा अधिक ही देना. रात को जब भी वो अपनी गाडी लगाती थी तो उसको भी बडे आदर से वह चौकिदार अदब से खडा रहता था, बजाय सुबह के चौकिदार के, जो उसे भी यूं घूरता था जैसे, गाडी चोरी कर के ले जा रहे है.व्यवहार की खरोंच उसे भी नागवार गुज़री थी.

मैने सोचा आज ५०० रुपये बच गये है, अपने लिये कोई खास कीमत नहीं होगी, मगर उस चौकिदार के एक हफ़्ते की तनख्वाह का इन्तेज़ाम होगा. तो नोट निकाला, थोडा चल कर चौकिदार की गुमटी में पहुंचकर उसे आवाज़ दी. वह सडक पर ही दूर से आता नज़र आया. देर हो रही थी, मैने, उसे वहीं ५०० रुपये का नोट देते हुए कहा कि लो इनाम लो , गाडी देखने के लिये. वह पास आया, अंधेरे में से उजाले में और बोला धन्यवाद,. मैं चौंक पडा. ये रातवाला चौकिदार नहीं था, बल्कि सुबह वाला था. तम्बाखू से सने दांत दिखाते हुए १५ दिनों में पहली बार सलाम किया.

मैं सकपका गया. उससे कडक कर पूछा रातवाला चौकिदार कहां गया?

उसने बडे संवेदनारहित भाव से कहा- साहब वो तो कल रात ही मर गया. इसीलिये आज से मै रात को............

मुझे बाद में कुछ सुनाई नही दिया. घर लौटते हुए रात की खामोशी में मन के अंदर के काले बंदर के बाल के चुभने की वेदना
से कसमसाया मै,(सुबह वाले चौकिदार को ५०० रुपये व्यर्थ देने की पीडा लिये), लेपटोप के कीबोर्ड के माध्यम से उस रात के अनाम गरीब संस्कारित चौकिदार को मन की मुखाग्नि देने के प्रक्रिया में लगा हुआ हूं.

Monday, February 2, 2009

पद्मश्री की लिस्ट - ताऊ और उडन तश्तरी


जबसे सरकार ने पद्मश्री की लिस्ट लाई है बाज़ार में ,मेरा जीना दुश्वार हो गया है.

क्षमा करें , मैने बाज़ार लिखा तो किसी को आपत्ती नही होनी चाहिये. अब तो ये बाज़ार ही है, और ये पद्म अलंकरण भी एक कोमोडीटी ही हो गई है, तिजारत के लिये.याने बार्टर सिस्टम मेरे मित्रों. इस हाथ दे , उस हाथ ले.

मगर ये मत कहिये कि चूंकि मुझे नहीं मिला है तो मैं चिढ़ कर ऐसा कह रहा हूं.बात सिद्धांत की है.

वैसे ये बात अलग है कि मैं चिढा़ हुआ तो हूं ही.ये तो कोई बात नहीं हुई कि ९३ लोगों को रेवडी़ बांट दी और मैं रह गया.क्या कमी रह गई थी उनमें और मुझमें?

चलो देखते हैं.

कुछ समाजसेवी है इनमें. हालांकि, सत्यम के राजू का नाम तो भारत रत्न के लिये आया ही था मगर मेरी कोम्पीटीशन तो पद्मश्री के लिये है.

तो भाई साहब मैं भी तो लायन्स क्लब के झंडे तले कई बार अपने पलासिया चौक पर २ अक्टूबर को चंदा इकठ्ठा करने खडा हुआ हूं.चार साल पहले दृष्टीहीन संस्था में ब्रेल की किताबें और पांच बार विकलांगों को ट्राईसिकल बांट चुका हूं .
( पूछ लिजिये राम शरण से जिसे पिछले पांच साल से बांट रहा हूं).

दूसरी बात ये कि फ़िल्मों से जुडा हुआ होने की भी शर्त पूरी करता हूं. पिछले कई सालों से फ़िल्मों का उपभोक्ता रहा हूं जनाब. ये हेलन ,ऐश्वर्या राय और अक्षय कुमार जो माल परोस रहे हैं , उसे मैं ही तो खरीद रहा हूं.तो ऐसा क्या कर दिया कि मैं कहीं कम पड गया? बेचने वालों को इनाम जिनने पैसा बनाया, और खरीदने वाले को ठेंगा जिसका पैसा व्यर्थ गया?

और हां- कुमार सानु, और उदित नारायण को मिला है तो ठीक, मगर कोई बतायेगा कि सुमन कल्याणपुर को भी कोई पद्म पुरस्कार मिला है?

चलो, खिलाडीयों की ओर भी चल के देख लेते है. शायद आपको मालूम नही है कि मैं भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाडी हूं गुल्ली दंडे में. हमारे शहर के करीब के कस्बें कंपेल में आयोजित अखिल विश्व गुल्ली दंडा प्रतियोगिता में मैं दूसरा रहा हूं .
( अब उसमें कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाडी नहीं पहुंचा तो मैं क्या करूं?)

हां , ये बात तो कबूल है, कि मेरा किसी भी राजनैतिक पार्टी से सरोकार नही रहा है.मगर ये पक्का कि नैतिक मूल्यों की नैतिकता में मैं इन सबसे अव्वल हूं. नहीं चलेगा ये क्वालिफ़िकेशन?

राज की बात दरअसल ये है, कि मुझे पद्मश्री देने के लिये कोई प्रायोजक नहीं है, नहीं तो ऐसे वैसों को दिया है, मुझको भी तू लिफ़्ट करा देता, हे ईश्वर.

श्रीमती जी को जब पता चला तो वह हंस पडी़. मुझे सांत्वना देने के लिये उसनें कहा- कोई बात नहीं, कई लोग छूट गये है, जैसे कि विजेन्दर और सुशील कुमार आदि, तो क्यों बुरा मानते हो.

बात में दम है, बंदो मे भले ही ना हो.मात्र ग्यारह देशों से मात्र खेलने वाली आज की क्रिकेट टीम में पांच खिलाडी़ पद्म पुरस्कार से नवाजे गये है, मगर विश्व स्तर पर इतने सारे देशों के खिलाडीयों को मात कर ऒलेंपिक मेड़ल प्राप्त करने वाले इन खिलाडीयों को सरकार भूल गयी?

मुंबई के सी एस टी स्टेशन पर शौर्य पराक्रम दिखाने वाले पोलिस कॊंस्टेबल शशांक शिन्दे को तो अशोक चक्र तक नहीं मिला.कसाब नें नहीं बताया होता तो हमें पता ही नहीं चलता कि वीरता से उसका सामना करने वाले अशोक शिन्दे की रक्तरंजीत लाश रात भर स्टेशन पर पडी़ रही तो इसके पीछे शूरता की क्या बेमिसाल कहानी थी. ये शरम की ही तो बात है , कि शिंदे की विधवा और बेटी को इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना पडा़ तो हम जागे.वैसे २६/११ के मुंबई हमले में शहीद हुए सभी अधिकारीयों और सिपाहियों को अशोक चक्र की जगह वीर चक्र मिलना चाहिये था क्योंकि क्या पाकिस्तान ने भारत पर किया वह अघोषित युद्ध नहीं था?बात वहीं आ कर ठहरती है, कि प्रायोजक नही मिले उन्हे.

हां , ये ठीक है. मैं अकेला ही तो नहीं हूं जिसे पद्मश्री नहीं मिली है.आप भी परेशान नहीं हों अगर आपको भी नहीं मिली हो तो. अगले बंदर बांट में देख लेंगे.तब तक प्रायोजक ढूंढ़ते है.

ब्रेकिन्ग न्यूज़ !!!

अभी अभी पता चला है कि सरकार कि उस लिस्ट में हमारे अपने ताऊ के नाम की शिफ़ारीश की गई थी, मगर ताऊ के चरित्र-माफ़ किजीये, कलम फ़िसल गई - व्यक्तित्व के बारे में संशय की स्थिती अभी तक बनी हुई होने की वजह से अंत में उन्हे पद्मश्री से हाथ धोना पडा़. ( वैसे भी हमारे ब्लोगर समाज के है भी कितने वोट?)

कल परसों तक न्यूज़ चेनल की जांच पडताल से कई अन्य बातें भी सामने आंयीं है जिसका खुलासा भी अभी किया गया है. पता चला है, कि ताऊ को ढूंढने पहुंची सरकारी टीम इन्दौर में ताऊ के ठिकाने का अभी तक पता नहीं लगा पा रही है.खोजी कुत्ते पानवाले की दुकान से वापिस लौट गये है. पानवाले से पूछताछ जारी है, और खबर मिलते ही इस चेनल पर सबसे पहले ये एक्स्ल्युसिव खबर दी जायेगी.

खुदा का शुक्र है कि उन्हे मेरे बारे में पता नहीं है, कि मैं भी इन्दोरी ब्लोगर हूं,नहीं तो मेरे पीछे पड़ जाते. मगर क्या बताऊं , सच्ची कहता हूं कि मेरे साथ साथ पानवाला भी अंधेरे में है !!

इसी बीच सरकार नें अमेरीका में ओबामा से ये गुजारीश की थी कि वे ताऊ का पता लगाने में उनकी मदद करें. खबर ये है, कि ओसामा बिन लादेन को ढूंढने गई टीम को भेजने के लिये फ़ाईल तो चलाई गई थी, मगर सुना है वह टीम अभी जबलपुर में है ! यहां पिछले दिनों उडन तश्तरी के दिखाई देने की खबर थी, जहां परग्रह से आये हमारे कुछ एलीयन मेहमान बडकुल की जलेबी की दुकान पर देखे गये थे.

क्या वे जलेबी के सेम्पल ले जाकर परग्रह पर दुकान खोलने की योजना बना रहे थे?

या वे हमारे ही पूर्वज हैं जिन्हे शताब्दी पहले परग्रही यहां से उठा ले गये थे?

या ये अमेरीका के अंडरकवर खूफ़िया टीम है जो ओसामा के लिये मध्य प्रदेश आयी है?

या फ़िर ताऊ को खोजने?

ये भंडा़फ़ोड हमारे अगले कार्यक्रम में देखें, कृपया कहीं नहीं जायें, मिलते है ब्रेक के बाद....

Saturday, January 31, 2009

तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूं .....?

जीवन में कई लम्हे आते है, छोटे छोटे से, मुख्तसर से, मगर दिल पर बडा़ प्रभाव छोड़ जाते है.

इतने दिनों के बाद इंदौर पहुंचा . पुणे में बिटिया नुपूर के साथ तीन दिन की छुट्टीयां बिताई. सोचा था कि कहीं पिकनिक पर जायें. मगर मेरी तमन्ना थी कि पुणे से बेहद नज़दीक ही है सिंहगढ़ का वह ऐतिहासिक किला देखा जाये ,जिसे शिवाजी महाराज नें अपनी कर्मभूमी बनाया था. इतिहास से सिर्फ़ बोध लेने का ही उद्येश्य नही है, वरना सबक के साथ नई पीढी़ को भी हमारे गौरवशाली अतीत और शौर्यगाथा से अवगत कराना ज़रूरी है, ताकि हमारी नई पौध का एक राष्ट्रीय चरित्र निर्मित हो सके, जिसमें हमारे हकों के अलावा कर्तव्यों का भी मानस पर गहरा अंकन हों, और हमारे दैनंदिन कार्यों में वह स्वचलित सिस्टम की तरह परिलक्षित हो.

हम दोनों निकल तो गये, साथ में छोटी बहन प्रतिभा का पुत्र दुष्यंत, बडे़ भाई साहब विजय भैया का पुत्र सिद्धार्थ और उसकी नई वधू वंदना, और मेरे मित्र अविनाश का पूर्ण परिवार .मगर संयोग से सिंहगढ़ के लिये ऊपर जाने वाली सड़क में जाम लगने के कारण हम नीचे ही अटक गये( २५ जनवरी की छुट्टी में सभी तो कहीं कहीं निकले थे)

अब सोचा क्या करे?

तो देखा पास ही एक छोटी सी झील दिखी. दरसल वह एक बांध था, और शायद महान प्रतापी और शूर बाजीराव पेशवा नें मस्तानी के लिये बनवाया था.(Not Sure) हमनें सोचा चलो यहीं चलते है, और हम उस झील की किनारे से बनी पगदंडी से काफ़ी आगे निकल गये, और निसर्ग के उस हसीन नज़ारे का आनंद उठाने लगे.



शहर के भीड भरे , कोलाहल भरे माहौल का मखौल उडाता वह मंज़र ,शांत शांत बयार के पृष्ठभूमी में चिडियाओं की चहचहाट (मराठी में कहते है-किलबिल)आंखो के ज़रिये मन के किसी कोने में छुपा लिया.

लौटते समय पास ही के गांव से गुज़रने की सोची, क्योंकि पेडों के झुरमुट में से एक छोटे मंदिर का शीर्ष मुकुट दिख रहा था.(कळस)वह एक विठ्ठल मंदिर था और बहुत छोटे से मंदिर में विठ्ठलजी की सुंदर सी मूर्ती विराजमान थी. दोपहर का समय था, वहां सुस्ताने बैठ गये, लगा कुछ भजन हो जाये तो जैसे ही एक भजन शुरु किया . गांव वालों ने कहीं से ढोलक , छोटा तानपूरा और मंजिरे लाकर दे दिये, और बस हम सभी भक्तिभाव की गंगा में उतर कर स्नान करने लगे. दुष्यंत नें ढोलक सम्हाली(पहली बार) और बाकी हमने भजन गाकर भगवान के दरबार में अपनी हाज़िरी दी.



इन्दौर आया तो पत्नी डॊ. नेहा नें कहा कि आपके नहीं होने से ये छुट्टीयां नीरस रहीं, तो मैंने कहा कि मैं तो हमेशा ही टूर पर रहता हूं . मेरे उपस्थिती की , अभाव की तो आदत ही पड़ गयी होगी.( दूसरी बिटिया मानसी जिसकी इंजिनीयरिंग की सेमिस्टर परिक्षा होने की वजह से हम सभी नहीं जा पाये थे.)

बात आई गई नही हुई. कल रात सोचा कि कोई फ़िल्म ही देख आयें. स्लम डॊग भी देख ही ली थी, तो पत्नी बोली, मुझे रब नें बना दी जोडी फ़िर से देखनी है. तो क्या था एक बार हम उस फ़िल्म को देखनें चले गये ,जिसे पहले भी देख चुके थे.

फ़िल्म के आखरी भाग नें मुझे झकजोर दिया, जिसमें तानियाजी को पति में रब दिखाई दिया. नेहा बोली ये संभव है. मेरा मन संभावना तलाश करने की जुगत में मानसिक वल्गनायें करने लगा. हम दोनों पढे़लिखे ,तर्क के पतीली में प्रेम की वह बघार नहीं दे पाये शायद.

मगर अपने लंबे वैवाहिक जीवन में आई परेशानीयों और अभावों के बावजूद सकारात्मक स्नेह और प्रेम बंधन के भीगे भीगे फ़ेविकोल के जोड़ का जो अहसास हमें हुआ, वह काफ़ी था आगे के कुछ और साल हाथ में हाथ डाले रिश्तों के झूले में पवन की बहार तले झूलते ,जीवन के यथार्थ के थपेडे सहते हुए हंसी खुशी हसीन पल गुज़ारने के लिये.

आज सुबह सुबह जब मैं नेहा को भोपाल के लिये इंटरसिटी एक्सप्रेस में स्टेशन छोड आया तो नेहा नें मुझे एक ही कार्य सौंपा- मेरे ९ वर्षीय बेटे अमोघ को तैय्यार कर स्कूल में पहुंचाने का काम. राजीव गांधी तकनीकी विश्वविद्यालय के बोर्ड ऒफ़ स्टडीज़ की मीटींग के लिये मेरी प्रोफ़ेसर पत्नी को सुबह जाकर रात को वापिस आना था.

जैसे तैसे अमोघ को दूध नाश्ता करवा कर , बिटिया मानसी द्वारा मेनेज करवा कर अभी अभी ये पोस्ट लिखने बैठा तो आंखों के सामने सभी गुज़रे साल घूम गये.


पत्नी के एक दिन नहीं रहने का अहसास पहली बार हुआ( रात को देखी फ़िल्म का असर था शायद). हर व्यक्ति वास्तव में विवाह के पहले अपनीं मां द्वारा और बाद में अपनी पत्नी द्वारा मेनेज होता चला आया है. अपन तो घुमक्कड दरवेश. फ़कीरी मन को लिये दुनिया में पुरुषार्थ दिखाने निकल पडे़ थे और पत्नी अपनी कामकाजी जिम्मेदारीयों के बावजूद ,मेरी, मेरे बच्चों की और मेरे ८६ वर्षीय पिताजी की देखभाल करते करते कब इतनी ऊंचाईयों पर पहूंच गई इसका बोध अभी अभी जाकर हुआ.



मेरे मन में वह विठ्ठल की मूर्ती की धूंधली सी छवि फ़िर से स्पष्ट होती चली गई, और मैं कह उठा-


तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूं ...... ?

Wednesday, January 28, 2009

स्वाधीन भारत का संविधान...

२६ जनवरी आई और चली गयी.२७ जनवरी को अखबारों को छुट्टी थी इसलिये आज २८ जनवरी को पूरे अखबार साठवें गणतंत्र दिवस की बासी खबरें लेकर हाज़िर हुए. किस नेता नें क्या कहा, किस स्कूल में बच्चों नें क्या किया, परेड में क्या हुआ आदि आदि.

आज से कई सालों पहले सन १९५० में जब स्वाधीन भारत का यह संविधान बना तब हम भारतीयों नें अच्छे नागरिक के कर्तव्यों को समझा और उसपर अमल करने की कसम खाई. आज इतने सालों बाद, किसी को भी ये याद नहीं है, मगर अपने मूल अधिकारों से भी आगे बढ कर अपने अपने निजी , राजनैतिक या जातिगत स्वार्थों के लिये लढ़ना, हडताल करना , मारपीट और दंगे करना, आदि याद रहा.



मेरी आप सब से इल्तेजा है, कि अपने अपने गरेबां में झांक कर क्या देखना गंवारा करेंगे, कि हम इस संविधान की मूल तत्वों से कितने प्रामाणिक है? मेरा मानना है, कि जो भी व्यक्ति इस ब्लोग जगत में है, वह प्रामाणिक तो ज़रूर है, इसीलिये ये गुस्ताखी कर रहा हूं.वह इसलिये कि जब भी कोई लेखक, या कवि या संगीत का तान सेन या कान सेन है,उसका ज़मीर, अखलाक़ , या morality का अपना एक उच्च स्तर होना लाज़मी है, या यूं कहें -prerequisite है.

एक बढिया quote है जो यहां प्रासंगीक है-

The measure of Man's Real Character is what he would Do,if he knew he would never be found out........

Sunday, January 25, 2009

जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है..


ये है मुंबई मेरी जान...

पिछले दो तीन दिनों से मुंबई में था, और काम की आपाधापी में चाह कर भी लिख नही पाया.

मुंबई में एक खबर बडी जोरदार ढंग से उछल रही है. Slumdog Millionaaire को ओस्कर के लिये नामांकित किया गया और हमारे भारतवासी बल्ले बल्ले हो गये. मानाकि फ़िल्म बनाने वाले फ़िरंगी हैं, बाकि तो सभी आपला माणूस हैं , ( याने खालिस हिन्दुस्तानी).

बात मे दम तो है. रहमान , गुलज़ार और फ़िल्म का विषय, एक स्लम के छोकरे का करोडपती बनना बावजूद इसके कि यहां सिर्फ़ गरीबी ही नही, भूकमरी के साथ गुनाहों का दलदल, धार्मिक दंगे, Child prostitution, और सबसे अधिक परेशान करने वाली बात याने कि भारत की छवि का घिघौना चित्रण, यथार्थवादी चित्रण, जिसमें टूरिस्ट के साथ छलावा और धोखा शामिल है.

सोचा फ़िल्म देख ही आये, तो देख ली.

सबसे पहले तो वह चित्रण जिसमें फ़िल्म सभी फ़ेमों में डार्क कलर्स में और मूल रंगों में भडकिली और कंट्रास्ट लिये दृष्य. अमूमन, ज़िन्दगी के सभी रंग, ग्रे शेड लिये, कहीं पेस्टल रंगों में, कहीं soothing तो कहीं चटकिले होते है. आजकल डिजिटल शूट की वजह से Post production में रंगों को थीम की तरह उभारने का चलन बढ गया है. यही वजह है, कि इतनी अच्छी फ़िल्म देखने के बाद भी मन में कडवाहट और मायूसी भर गयी. इस विवाद में ना जाकर कि क्या ये सही है, हम अपने आप से पूछें कि क्या ये सत्य भयावह नहीं , और हमारे कर्णधारों ने, राजनीति और सामाजिक नेताओं ने इस देश को दुहा है, निचोडा है, अपने स्वार्थ के लिये.और हम आम नागरिक, दूसरों की तरफ़ मूंह कर जेब में हाथ डालकर राह देख रहे हैं कि कोई और आकर जादु की छडी से स्थिती बदल देगा.


मगर रात को टीव्ही पर गुरुदत्त की प्यासा का गीत देखा- जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां है..तो एक बात पर मन सोच में पड गया.

१९५७ की फ़िल्म में, Black & White में भी सिर्फ़ ग्रे शेड में बदनाम बस्ती का वह घुटन भरा , मन पर बोझ बढाता, माहौल का यथार्थ वादी चित्रण. कहां था ओस्कर तब? नहीं चाहिये ओस्कर का ठप्पा.जागतिक स्तर के इस फ़िल्म के बाद आज ५० साल से ज़्यादा हो गये, भारत की स्थिती कहीं बदली है? कहां हैं वे सभी ? २६ जनवरी के एक दिन पहले हम अपने आपसे पूछें - जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो आज भी कहां है?
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