Monday, August 10, 2009

कर्मशील , स्वयंसिद्धा बहन- रजनी...



रक्षा बंधन का पुनीत दिवस आकर चला गया.

राखी पर पोस्ट तैय्यार करने बैठा तो सोचा चित्र नेट से ले लूं. गूगल बाबा में सर्च में राखी डाला तो ८० प्रतिशत परिणाम आये राखी सावंत के और उसके स्वयंवर के बारे में !!! अब राखी सावंत जैसा व्यक्तित्व , और राखी के धागे के पवित्र ,प्लेटोनिक स्नेह बंधन.... वाह , क्या कंट्रास्ट है जनाब!!! खैर.

वैसे परंपरा के अनुसार इस दिन भाई अपनी बहनों की रक्षा करने का वचन लेते थे.

आज नारी स्वयं सक्षम है, स्वयंसिद्धा है. मगर फ़िर भी ये प्रेम , स्नेह का त्योहार हम सभी के मन की गहराई में रच बस गया है, किसी भी फ़्रेंडशिप डे की ज़रूरत महसूस ना करते हुए भी .

कल मैं काम के सिलसिले में इंदौर से करीब १२० किमी पर बसे प्रकृति की गोद में बसे एक छोटे से कस्बे खातेगांव गया था. रास्ते में मालवा के पठार के उतरन की हसीन वादियां छोटे पैमाने पर हमारा स्वागत कर रही थी.मेरे बडे भाई के बचपन के मित्र वहां एक फ़ेक्टरी खोलने की प्लानिंग करने के लिये मुझे साईट दिखाने ले गये थे.

उन्होनें वहां ज़मीन के मूल पुश्तैनी मालिक से भी मिलवाने का वादा किया था , जिनसे कुछ ज़मीन खरीदकर उसपर प्रोजेक्ट तय्यार करना था.

काम करने के पश्चात जब हम मालिक से मिले तो मैं आश्चर्य चकित रह गया जब मैं मिला एक २०-२१ साल की युवती से, जिसका नाम था रजनी. गांव के परिवेश में पली बढी होने के बाद अब वह एक आधुनिका थी , और बेहद सुलझी और मेच्युर बातें कर रही थी. जींस, और मोबाईल के साथ साथ बिज़नेस का सलीका भी बखूबी नज़र आ रहा था.

मैने जब उसके हाथ पर बहुत सारी राखीयां बंधी हुई पायी तो उससे पूछ ही बैठा कि ये क्या, तुम्हारे हाथों पर राखी? क्या मालवा या निमाड क्षेत्र का कोई रिवाज है?

तो उसने जो बताया , तो उस कर्मशील , स्वयंसिद्धा बहन के प्रति मेरे मन में आदर भर आया.

उसके पिता इस दुनिया में बहुत पहले छोड गये थे, और उसकी ६ और बहनें थी, जिनके लालन पालन का ज़िम्मा उसकी मां के बदले रजनी पर आया. और अब कुछ सालों से वह इंदौर आ गयी है, अकेले रहती है, और एक निजी ओफ़िस में प्रबंधन का काम कर अपने परिवार का खर्चा वहन करती है.आगे चल कर अपनी ज़मीन पर वह अपना खुद का कोई उद्यम शुरु करने का भी साहस भरा निर्णय ले चुकी है.

याने,समय नें उसे कम उम्र में ही अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करा दिया, और अब वह बखूबी एक भाई की तरह अपने बाकी सभी बहनों की रक्षा कर रही है!!(Literally)

और इसी भावना को मन में रख कर रजनी की सारी बहनें उसे रक्षाबंधन के त्योहार पर राखी बांधती है!!!

आज रजनी जैसी और भी कई बहनें होंगी, और भी कई भाई , जिनके जीवन में रजनी जैसी बहन एक अहम भूमिका निभा रही होगी!!

इस रजनी को और उन सभी अनाम रजनीयों को सलाम!!!

Wednesday, August 5, 2009

रक्षा बंधन - ब्लोग परिवार की अलग और विशिष्ट संस्कृति


(मेरी बहन प्रतिभा नें भेजी हुई राखी!!)


रक्षा बंधन के इस पावन और पुनीत पर्व पर ब्लोग परिवार की सभी बहनों को शुभकामनायें, बधाई, और इस भाई की ओर से प्रणाम!!

ब्लोग दुनिया से जुडने के एक साल के बाद जब भी मैं आज पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि इस नई विधा नें अंतर्जाल के माध्यम से कितने सारे नये परिवार मुझे दिये. वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना इतना अच्छा और सार्थक उदाहरण इससे बेहतर क्या होगा?

मेरी सबसे पहली पोस्ट नश्र हुई थी ( दिलीप के दिल से )-२३ जुलाई २००८ को और सबसे पहले टिप्पणी दी थी मेरे मानस अनुज श्री संजय पटेल नें और दूसरी सुश्री अल्पना वर्मा नें.संजय भाई तो मुझे इस ब्लोग जगत में लाने के प्रेरणा स्रोत ही रहें है, और इस ब्लोग वास्तु के नाम - दिलीप के दिल से और अमोघ के मानस शब्द की संकल्पना के रचयिता भी वहीं है .सुश्री अल्पना जी नें पहले ही कमेंट से जो उपयोगी और सार्थक टिप्स दी वो आज तक जारी है, यानी हफ़्ते दर हफ़्ते इस वास्तु पर जो भी क्रमवार विकास हो रहा है,- तकनीकी और सुरमई - इसमें उनके सुझावों और सहयोग से यह सभी संभव हो रहा है.

दोनों के साथ साथ , मेरे कई और मित्रों ने भी मार्गदर्शन दिया जैसे हिन्दयुग्म के सजीव सारथी, जिन्होने मुझे अपने गाये गानों को ब्लोग पर डालने की सलाह दी.मैने अब तक मात्र अल्पनाजी को ऐसा करते हुए देखा था .आप ही नें कहा कि जब हम सभी अपनी रचनायें पोस्ट करते हैं तो वो भी आपका सृजन ही तो है. उसके बाद, मुझे हमारे सभी के प्रियजन ताऊ का भी मारग्दर्शन मिला, अपने ब्लोग के स्वरूप को और बेहतर और रंगीन करने के लिये. साथ ही एक मित्रवत आग्रह भी कि आपसे जितना भी संभव हो,अपने पसंदीदा साईट्स पर जाकर टिप्पणी करें उससे हमारे ही साथियों का उत्साहवर्धन होगा , साहित्य की सेवा होगी, और प्रेम और संवेदनाओं के साये तले एक परिवार की अवधारणा बनेगी.

और भी मेरे मित्र हैं जिन्होनें हमेशा मेरे दोनों ब्लोग पर आकर अपनी जीवंत टिप्पणीयों से मुझे नवाज़ा है; लावण्या दीदी, समीर लाल, अनुराग शर्मा , डा. अनुराग, अर्श,हरकीरत जी, रंजु जी, और अन्य कई.

तो बीते हुए उन दिनों हम सभी भाईयों और बहनों नें अपने अपने सुख और दुख में एक दूसरे को शामिल किया, और एक नया आयाम रचा प्रेम और स्नेह के उस बंधन का , जिसे हम रक्षा बंधन के नाम से ना पुकारें तो किससे पुकारे?

हम सभी अलग अलग क्षेत्र से जुडकर, अलग अलग विचार धारा से अभिप्रेत, अलग अलग देश, धर्म, जाति, और उम्र के बंधन से निकलकर, ब्लोग दुनिया के इस नये देश के नागरिक हो गये हैं, और अंतर्जाल के महीन वर्च्युअल धागे के बंधन से जुड कर एक परिवार का हिस्सा बन गयें है.

हम नागरिक कुछ तो अलग है, दीगर जमात से.

हम कलाकार है, लेखक हैं , कवि हैं, चित्रकार हैं, फोटोग्राफ़र हैं, और अब हमारा एक अलग वजूद हो गया है, जो देश विदेश के दूसरे बुद्धिजीवीयों से थोडा अलग यूं है, कि हम सभी भावनात्मक रूप से करीब हैं. याने की हम तर्क के धरातल से उठ कर संवेदनाओं और एहसासत के रूहानी स्तर पर जाकर दिमाग की जगह दिल से जुडे हैं.

इसीलिये हमारे बीच अब एक अलग और विशिष्ट संस्कृति का प्रादुर्भाव हो गया है.

क्या आप सहमत हैं?

( अभी अभी मेरे पिताजी नें मुझे संस्कृति की उनकी व्याख्या दी- संस्कारों द्वारा परिष्कृत कृति ही संस्कृति है!!)

Thursday, July 9, 2009

वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है.

आज मैं भावाभिभूत हूं....


नतमस्तक हूं उस   परमेश्वर के पावन चरणों में....


मित्रों , अभी पिछली पोस्ट में मैने ज़िक्र किया था मेरे बेटे अमोघके जन्म दिन पर उसके साथ हुई नाइंसाफ़ी का-

कृपया यहां पढें

दुख इस बात का नही था दोस्तों कि उसे तब चेम्पियनशिप नही मिली थी. वह तो उसके कर्म, भाग्य और भगवान के आशिर्वादों का फ़ल था.


मगर सही होने का भी अगर खामियाज़ा भुगतना पडे तो मन को कष्ट होता है,हुआ भी.गोया ,अच्छे की बुराई पर हमेशा जीत होती है ये जुमला मात्र किस्से कहानियों में या फ़िर फ़िल्मों में ही शेष रह गया था .


मगर आप सभी साथियों नें जिस तरह से हौसला अफ़ज़ाई की थी, और इस बात से मन में अच्छे कार्य के प्रति विश्वास का जो भाव जगाये रखा उसकी परिणीति अभी हुई.


अभी पिछले रविवार को चेन्नई में अखिल भारतीय एबेकस मेण्टल अरिथ्मेटिक कोंपीटिशन २००९ सम्पन्न हुई. पूरे भारतवर्ष से करीब २२००० बच्चों ने भाग लिया- पहले से लेकर १० वें लेवल की परीक्षा में ८ मिनीट में ३०० सवाल करने थे जोड/घटा/गुणा/भाग आदि.


मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता होती है, जो मैं अपने ब्लोग परिवार में बांटना पसंद करूंगा कि -


<strong>अमोघ को अपने लेवल ९ में पूरे भारत वर्ष में अव्वल स्थान प्राप्त हुआ और उसे चेम्पियन घोषित किया गया !!!

 Amogh 2

 

और साथ ही में १ से १० लेवल के चेम्पियन्स में भी वह सबसे प्रथम स्थान पर रहा और उसे Champion of the Champions घोषित किया गया !!!!

 

Amogh 4

(कंप्युटर और मलेशिया के विज़िट की स्पोंसरशिप लेते हुए)

यह बात तो सर्व दृष्टि से साबित हो गयी है, कि अमोघ नें कभी भी सच का साथ नही छोडा़ ,और सही और गलत की पहचान भी उसके बाल मन में उपज गयी है.अब यही मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति उसे अगले विश्च प्रतियोगिता (क्वालालम्पूर , मलेशिया- नवम्बर २००९)में भी सही राह पर चल कर लक्ष्य प्राप्त करने में मदत करेगी.इन्शाल्लाह!!!

मैं इस बात पर ज़रूर शर्मिंदा हूं कि मैंने उस परमपिता ईश्वर पर भी आक्षेप लगाया था कि शायद अब वह भी टी आर पी बढाने के लिये अपने सच्चे भक्तों की जगह ऐसे अवसरवादियों की सुनने लगा है,जिन्हे किसी भी सूरत में कामयाबी हासिल करनी है, BY HOOK or BY CROOK . और तो और मैने और नेहा नें यह भी सोच लिया था कि इस बार अमोघ को चेन्नई में Competition मे नही ले जायें.मगर उसकी शिक्षिका मॆडम लीना सचदेव नें शब्दशः मिन्नते करते हुए उसे भेजने के लिये राज़ी किया.

मुझे वाकई लगने लगा था कि आध्यात्म का जो मानस मेरे मन में और आत्मा में रचा बसा है, उसनें मेरा क्या भला किया वह महत्वपूर्ण नही है, क्योंकि मैं हमेशा से मानता आया हूं कि हमें हमेशा ही अपना कर्म करते रहना है, और फ़ल की आशा नही करना चाहिये.बल्कि क्या यह सही है, कि मैं अपने पुत्र को भी उसी संस्कारों और परंपराओं का चोला पहनाऊं जो उसे इस तामसिक हलाहल भरे विश्व की तपन,पीडा , और नैराश्य से बचाव भी ना करा सके, और उसे Expose कर दे. 

मगर इस दुविधा और नकारत्मक नैराश्य से उबारा उसी नें. और आशा, विश्वास, और सकरात्मक उर्जा का संचार कराया है  उसी नें..

हे भगवान- मुझे क्षमा करें ....

आज मैं संतुष्ट हूं कि अमोघ के पीछे अच्छेपन का सिला देने वाला जागृत है. यह इसलिये नही कि उसे प्रथम स्थान मिला है. यह तो उसमें विश्वास के पुर्नर्जीवन का सबब ही तो है!और आप सभी अच्छे अख़लाक़ के मालिक ब्लोग परिवार के मित्रों के मन से निकली दुआओं का असर भी,जो उसे अगली परीक्षाओं में भी यही संबल देता रहें..


धन्यवाद..


 Amogh 11

मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है,
वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है.

Thursday, July 2, 2009

नील मुकेश या नील नितीन...

पिछले दिनों काम के सिलसिले में छुट्टियां भी एंजोय करने का मूड हो गया था, इसलिये फ़िर गायब हो गया.

मौसम की पहली बारीश छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रसिद्ध दुर्गम किले रायगढ़ पर !!! क्या बात है. उसपर अलग से लिख रहा हूं.

कल न्युयोर्क फ़िल्म देखी. एक अलग विश्व, अलग समस्या और अलग तरीके से हेंडल किया गया वह महत्व पूर्ण विषय -

आतंकवाद!!!

शायद कबीरखान नें मुसलमानों के नज़रीये से भी पहली बार इस फ़िल्म में यह बात बताने की कोशिश की है, कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता. बात में दम है. दोनों ओर के दृष्टिकोण बडी बारीकी से और खुलासेवार पेश किये गये.अच्छा लगा.

फ़िल्म में रोशन का यह वाक्य बडा ही सारगर्भित है, जिसका सार यह है,कि एक मुसलमान होते हुए भी उसने काम के साथ कभी समझौता नही किया, और शायद अल्लाहताला नें ही उसे यह मौका दिया है, कि दुनिया में उस मुसस्सल ईमान की परख हो जाये, जिसके लिये हर मुसलमान इज़्ज़त की दृष्टि से देखा जाता है.

साथ ही में उसके जरिये यह बात भी बताई गयी कि चाहे कुछ भी हो जाये , आतंकवाद को किसी भी तर्क से जायज़ नही ठहराया जा सकता, जबकी बडी ही दुख की बात थी कि ९/११ के बाद ख्वामख्वाह मुसलमानों को तकलीफ़ों को झेलना पडा, और अमरीकी सरकार को अधिकतर इनोसेंट लोगों को छोडना पडा.




मुझे तो सबसे बढियां सीन वो लगा , जहां नील नितीन मुकेश नें अपने दादा स्वर्गीय मुकेश जी का वह गीत स्वयं गाया-

ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूट क्या, और भला सच है क्या!!

माशाल्लाह , बडा ही सुरीला गया है. खुदा उन्हे और ऐसे मौके दे, जहां वे गाना भी गाये.

आज मुझे पिछले साल की वह बात याद आ रही है, जो नील के पिता नितीन मुकेश जी नें एक व्यक्तिगत लंच में बताई थी, जब वे इंदौर आये थी लता मंगेशकर सन्मान समारोह में प्रस्तुति देनें.

उन्होने एक बडी ही रोचक बात बताई, कि जब फ़िल्मों के लिये नील को नाम चुनने को कहा गया तो उसे दो ओप्शन दिये गये थे--

नील मुकेश ...

या

नील नितीन...

यह बात बताते हुए नितीन मुकेश जी का सीना गर्व से फ़ूल गया था कि नील नें कहा:

मैं जो भी हूं आज अपने पिता की वजह से हूं , और साथ ही में मेरे दादाजी की भी विरासत का वारीस हू, और उनके आशिर्वाद हैं ही.

इसलिये मैं उन दोनों को मान देते हुए अपना नाम रखूंगा;

नील नितीन मुकेश..

Sunday, June 7, 2009

नो चीटींग .... रोंग साईड ओव्हरटेक...

आज ७ जून है.

आज खुशी की बात ये है, कि मेरे बेटे अमोघ का नवां जन्म दिन हैं और अभी शाम हमने एक पारिवारिक माहौल में मनाया है.

अभी अभी एक बडा अचीवमेंट भी उसके नाम रहा है. युसीमास मेंटल अरिथमेटिक्स एबेकस प्रतियोगिता में लगातार तीसरी बार मध्य प्रदेश में पांचवे लेवल में वह चेम्पियन याने प्रथम घोषित किया गया है.


मात्र मेंटल केल्क्युलेशन से वह मात्र एक-दो सेकंद में बडे बडे अंको के जोडने, घटाने, गुणा और भाग के उत्तर दे पाता है, जो आश्चर्यजनक है.दर असल एबेकस नाम के एक इंस्ट्रुमेंट की मदत से ये सभी गणनायें बडी ही आसान हो जाती है, और फ़िर बाद में अभ्यास से छात्र अपने दिमाग में ही वह गणना कर लेता है, उस उपकरण की मेंटल छबि बना कर. वैसे पिछले दो साल वह चेन्नई मे संपन्न हुए अखिल भारतीय प्रतियोगिता में भी प्रथम रनर अप रहा है, और दो साल पहले कुवालालम्पूर में हुई अखिल विश्व प्रतियोगिता में उसके आयु वर्ग में इंटरनेशनल चेम्पियन का रनर अप, और इंटरनेशनल लेवल पर पांचवा रहा .

आज ही हमनें उसका चेन्नई में ५ जुलाई को होने वाले अखिल भारतीय कोंपीटीशन के लिये फ़ार्म भरा है.उसका ये अंतिम वर्ष है क्योंकि उसने इस साल ग्रेजुएशन कर डाला है इस शिक्षा पद्धती में अपने नवें साल में ही.याने के ये साल उसका अंतिम साल है, इस शिक्षा पद्धति की पढाई में.

यहां एक बात का विशेष उल्लेख करने के लिये ये पोस्ट है. अपने बेटे की सफ़लता में खुश होना और गौरवान्वित होना हर पिता का स्वप्न होता है. मगर उसके साथ जुडी हुई कुछ घटनाओं से हमें हमारे ऊसूलों या वेल्यु को भी परखने का मौका मिलता है, और हम कभी कभी निर्णय लेने के उस मोड पर खडे हो जाते है, जहां पर एक बडी ही पतली रेखा रहती है,जिससे पासे पलट जाते हैं, और ग़म और खुशी का उपहार हमें मिलता है.

दो साल पहले जब चेन्नई में चेम्पियन शिप में रनर अप आने से पूरे भारत वर्ष में चेंपियन बनने की आभिलाषा अधूरी रह गयी थी.आश्चर्य की बात ये भी थी कि चेम्पियन बना था उसका ही मित्र तेजस, जो उसकी ही कक्षा में पढता है.हमने भी यही सोचा कि उसकी मेहनत कम पड गयी होगी या भाग्य नें आज साथ नही दिया तो वर्ल्ड लेवल पर भी प्रयत्न करने में हर्ज़ नही है.

कोंपीटीशन हॊल में जाने से पहले अमोघ मेरे पास आया और उसनें मुझसे एक बडी ही आश्चर्यजनक बात बताई. उस प्रतियोगिता में एबेकस इंस्ट्रुमेंट की मदत से आठ मिनीट में २०० सवाल हल करने थे, जबकि अमोघ का और हमारे भारतीय बच्चों का मेंटल लेवल इतना अधिक कुशाग्र था कि वे मन में ही सवाल हल करने को निपुण हो गये थे.

इसीलिये जब हमारे बच्चों को पता था कि उन्हे उपकरण से करने में थोडा समय लगेगा, बनिस्बत कि दिमाग से करने, तो तेजस नें अमोघ को बताया कि उसके पापा नें उससे कहा है, कि वे वहां पहले दो मिनीट तो मेंटली हल करें, और ऊपर से ये दिखायें कि वे उपकरण से हल कर रहें है.तो वे बाकी बच्चों से थोडा आगे निकल जायेंगे.तो वह क्या करे?

मैं और मेरी पत्नी डा. नेहा अचंभित हो कर सोच में पड गये कि अब हमें क्या निर्णय लेना है. क्या हम अपने बेटे को चीटींग करने को प्रवृ्त्त करें और गलत तरीके से चेम्पियनशीप हथियाई जाये.या जो भी हो , सत्य और अनुशासन की राह पर चल कर जो भी रिज़ल्ट हो उसे स्वीकार करें. इसी उधेडबुन में हम थे कि समय के अभाव के कारण अमोघ हाल में चला गया, हमसे उत्तर लिये बगैर.

अब हम यही सोच रहे थे कि एक ७ वर्षीय बच्चे से हम क्या उम्मीद करें जो यहां वह उचित और सही निर्णय ले.उतने में हाल में एक घोषणा हुई कि कोई भी बच्चा दिमागी तौर पर गणित के सवाल हल नही करेगा, सिर्फ़ उपकरण से ही करेगा., और कोई अगर पकडा जायेगा तो हमेशा के लिये उसे बाहर कर दिया जायेगा.

हम इसी बीच निर्णय ले चुके थे कि जैसे भी हो, उसे सच की राह पर ही चलना चाहिये, मगर इस बात से हम बडा ही चिंतित हो गये, कि पता नही अमोघ नें क्या निर्णय लिया.

जब वह परीक्षा देकर बाहर आया तो सबसे पहले उससे हमनें यही पूछा कि उसने क्या किया?

उस सात वर्षीय बच्चे नें ये कह कर हमारी आंखों में आंसू ला दिये और हमारे सर गर्व से ऊपर उठा दिये कि-

पापा- मैनें सोचा कि ये बात गलत है, और मैं कुछ भी हो जाये चीटींग नहीं करूंगा. हो सकता है, कि आज मैं हार जाऊं मगर मैं गलत काम नहीं करूंगा.

हुआ भी वही. तेजस वर्ल्ड चेंपियन बन गया और अमोघ रनर अप.

चेम्पियन्शिप नही मिलने की उदासी स्वाभाविक ही थी जिसने उस बच्चे को दुखी कर दिया. जैसे कि मैने एक फ़िल्म चितचोर में देखा था, दुख इस बात का नही कि हार गये या पीछे रह गये. मगर रोंग साईड से ओवरटेक कर के गाडी आगे चली गयी थी. उन हताशा भरे क्षणो के बीच में उसनें मुझसे कहा - सॊरी पापा.

मैने और नेहा नें अमोघ से कहा- नही बेटे, तुम ही चेम्पियन हो. You are Real Champion.

भारत लौटने पर मैने अपने कंप्युटर में अमोघ ने तेजस को लिखा एक पत्र पढा, (उसका पहिला पत्र!!) जिसमें उसको बधाई देते हुए अमोघ नें लिखा था- अगले साल तो पूरा मेंटल ही है, तो फ़िर मिलेंगे.

आज उस घटना को दो साल बीत गये हैं. पिछले साल मैं उसे फ़िर नही ले गया.मगर इसी बीच अमोघ दो सालों में दो लेवल की जगह चार लेवेल पास कर के ग्रेज्युएट हो गया है, और तेजस दो ही लेवल कर पाया है.(यहां ये संभव था)इस साल वह भी चेम्पियन बना , मगर छोटी कक्षा में.

मैं भी कभी कभी सोचता हूं , कि क्या अमोघ नें सही निर्णय लिया था. आज कुछ भी हो, तेजस वर्ल्ड चेम्पियन है, और दुनिया यही जानती है, मानती है. आज तक अपने जीवन में मैने भी इसी सत्य की राह पर अपने निर्णय लिये हैं, मगर मैं एक सफ़ल बिज़नेसमन नहीं हूं. ( मूल्यों से कंप्रोमाईज़ नही करने वाला व्यवसाई!!! हा हा हा!!!-हास्यास्पद है ना?)


a. आप ही बताईये, कि क्या सही है , क्या गलत?

b. क्या उसे फ़िर इस साल कुवालालंपूर भेजना चाहिये?

c. क्या अमोघ भी अपने पिता के समान सच की राह पर चलते हुए असफ़लताओं का बोझा ढोयेगा, या फ़िर उसे Survival of Fittest के इस जंगल राज के नियम को मानते हुए, सीधी या टेढी उंगली कर के घी निकालना चाहिये?

d. क्या सच्चे का बोलबाला और झूटे का मुंह काला ये कहावत आज भी चरितार्थ हो रही है?...

बताईये आप सभी प्रबुद्ध जन क्या राय रखते है?

Sunday, May 31, 2009

बेवकूफ़ कौन?

आज तंबाखू निषेध दिवस है...

आज एक बार फ़िर अखबार रंग गये हैं , ये बात दो करोड बीस लाख वीं बार बताने को, कि तंबाखू स्वास्थ्य के लिये हानि कारक है, और केंसर का सबब. फ़िर हममें से कई सिरियसली सोचेंगे- यार वाकई में ये सही है. सिगरेट या गुटके से कोई लाभ नही है .किसी ना किसी ना किसी को तो पहल करनी ही चाहिये.

और ये सोचने के तीन सेकंद बाद एक सिगरेट सुलगाकर एक लंबा कश लेकर धुआं छोडते हुए कहेंगे-

हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया.

क्या अजीब दुखद संयोग है. आज अभी अभी मैं एक दाहसंस्कार से हो कर आया हूं और आते ही लिखने बैठ गया. मेरे पिताजी के मित्र श्री अजीतसिंग जी नही रहे.८८ वर्ष की आयु में आज ही सुबह उनका स्वर्गवास हुआ और उनके निधन का कारण था केंसर...

हम कई सालों पहले जहां रहते थे (पिपली बाज़ार) वे हमारे पडोसी थे. तहसिलदार से कलेक्टर तक का सफ़र तय किया था उन्होनें और हम बचपन से देखते चले आये हैं कि वे पान बहार यूं खाते हैं जैसे कि हम सांस लेते हैं.(पहले वे तमाखू खाते थे और बाद में पान मसाला). उन्हे हम सभी मालेक हुकुम बुलाते थे, मगर चूंकि उनका तकिया कलाम था बेवकूफ़- तो मेरे पिताजी ने उनका उपनाम ही रख दिया था कि बेवकूफ़..वो पिताजी को मास्टर ...

मुझे वह दिन आज भी याद है, कि हमारे संयुक्त परिवार में मेरे बडे भाईयों (भाऊ,दादा)के साथ एक बार मैं भी मालेक हुकुम के दोनो बेटों के साथ पिक्चर देखने चला गया था. मैं छो्टा होने से हमारी व्यवस्था भेड की तरह होती थी. जहां बडे ले जाये,वहां चले जायें.

बाद में लौटने पर मालूम हुआ, कि मालेक हुकुम के बेटों ने, एम भैया और एन भैया(महेंद्र और नरेंद्र) नें अपने पिताजी को बिना पूछे घर की रद्दी बेच दी थी(पांच आने सेर के भाव में )और पैसे लेकर सिनेमा देखने चले गये थे श्रीकृष्ण टाकीज़ में.रद्दीवाले की चुगली नें भांडा फ़ोड दिया था.

बस क्या था, आते ही आनन फ़ानन में मालिक हुकुम नें एम और एन भैया को आडे हाथों लेते हुए लकडी की स्केल से चार पांच बार सुताई कर दी, और एक दो बार हमारे बडे भाईयों की भी(मैं बच गया क्योंकि बहुत ही छोटा होने से अपराधियों के श्रेणी में नही आया था तब तक!- मगर कान उमेठनें की सज़ा ज़रूर पायी)

ताबडतोब हमारे ताऊ जी को बुलाया गया , और वे भी वहीं शुरु हो गये.(मुर्गा बनने की सज़ा की वजह से बाद में हिंसक गतिविधियां बंद हुई!!!)

क्या आपने एक बात नोट की ? कोई अपने पडोसी के बेटे को आज मार सकता है? पडोसी तो पडोसी, क्या सगे ताऊ या चाचा ये ज़ुर्रत कर सकतें है?

इस सभी एपिसोड के अंत में मालेक हुकुम नें हम सभी को पास में लेते हुए पुचकारते हुए कहा- बच्चों , पैसे चाहिये थे तो हमसे मांग लेते - गलत आदत क्यों डालते हो?

आज हम रिस्ट्रोस्पेक्ट में देखते हैं तो मन ये सोचता है, कि हम नें बाद में ऐसी कोई भी आदत नही डाली,और खुद मालेक साहब हुकुम ?

इसलिये कल शाम को जब मेरे पिताजी उन्हे मिलने गये थे तो वे यही बोले- मैं तुझे बेवकूफ़ कहता था - कि तू मास्टर का मास्टर ही रहा ( वैसे पिताजी वाईस चांसलर बन कर रिटायर हुए थे). मगर आज अगर ये तमाखूं नही होती तो और भी जीते.

आज सुबह उनको जब ये खबर दी तो वे यही बोले-- बेवकूफ़ नही रहा.....

आज जब उनके पार्थिव देह को उठाया तो एम भैया की लडकी नें अंदर से उनकी छडी और ऐनक लाकर दी , उनके साथ ले जाने के लिये.. और साथ में अग्नि के हवाले करने के लिये.

मगर अचानक बडी भाभी पूजा भाभी अंदर गयीं और एक पान बहार का डब्बा भी उठाकर ले आयी,और अर्थी पर रख दिया. एम भैया चौंक पडे. उन्होने डिब्बे को देखा और फ़िर भाभी को. मेरे से भी आंखे पल भर के लिये मिली ,और झुक गयी.

फ़िर मुंह में से पान मसाले की पीक थूकते हुए (शायद आखरी बार?) एम भैया अर्थी को कांधा देने के लिये बढे़.........

वह डब्बा मालेक हुकुम का नही था.वह था एम भैय्या का .......

Monday, May 4, 2009

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक के प्रमाण - २

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक (रविवार , ४ डिसेंबर ,७३२३ ई.सन पूर्व ) के प्रमाणों के लिये पिछली पोस्ट पर मैंने ज़िक्र किया था ३ प्रमुख प्रमाणों का, जिसमें पहला था –पुरातात्विक प्रमाण, दूसरा था साहित्यिक प्रमाण, और तीसरा था ज्योतिषीय एवम खगोलीय प्रमाण.

कृपया यहां पढें...

मैं बडा़ ही शर्मसार हूं, वादाशिकन भी, कि आपकी उत्कंठा के विपरीत इतने दिनों नेट से अनुपस्थित रहा और आगे इस महत्वपूर्ण एवम रोचक विषय पर आगे कुछ नही लिख सका. कारोबारी सिलसिले में इन दिनों बाहर ही हूं अधिकतर, जिससे, इतने गंभीर मसले पर हल्का फ़ुल्का लिख पाना मुनासिब नही समझता. मुझे यकीं है कि आप मुझे मुआफ़ करेंगे.कोशिश करूंगा कि इस बार देर नही होगी…….
१. पुरातात्विक प्रमाण:

हमने पिछली कडी में पढा कि दुर्भाग्य से हमें राम के जीवन काल पर कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिल पाये. मगर जैसा कि हमारे ब्लोगर        श्री पी एन सुब्रमन्यन नें सही लिखा है, कि दर असल आज जिस जगह हम अयोध्या मान कर चल रहें है, वहां मूल अयोध्या है ही नही. वह कही और ही आस पास होनी चाहिये.

बाकि अन्य राम को आस्था का विषय तो मानते हीं है, मगर कुछ  उनके ऐतिहासिक वजूद को मानने में पूर्ण तयः निश्चित नहीं हैं. अब हम देखें कि अन्य क्या तर्क दिये जा सकते हैं , जिससे हम इस बात की संपूर्ण पुष्टि कर लें.

ramaइसलिये इस लेख के प्रारंभ में मैं ये स्पष्ट  कर दूं , कि मेरा ये निश्चित मत है कि श्री राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे जिन्होने इस भारत वर्ष की पावन धरती पर सांस ली थी. अतः, उनके ईश्वरत्व और आस्था के परे जाकर अभी तो हम उन्हे एक पुरुषोत्तम महामानव की दृष्टि से ही देखेंगे. मेरी राय से इत्तेफ़ाक नही रखने वालों से विनम्र निवेदन है, कि जैसा कि शास्त्रार्थ का नियम है, अपने मत और तर्क बुद्धिमत्ता, विवेक, और ग्यान के धरातल पर जांच कर ही रखें तो इस विषय को सार्थक और नयी दिशा मिलेगी. दूसरी बात ये भी है, कि यहां जो भी लिखा जा रहा है, मूल कंटेंट में काफ़ी विस्तार से विवेचना उपलब्ध है, मगर मूल भावना को ही यहां रेखांकित किया जा रहा है.
२. साहित्यिक प्रमाण :

भारत में किसी  ऐतिहासिक महापुरुष या साहित्य कृति का सही काल निर्णय करना बडी ही कठिण समस्या है. वह इसलिये कि बडे़ बडे़ ग्रंथ, ऋचायें, महागाथायें, और पोथियां हमारे स्वयंसिद्ध ऋषियों नें लिख कर अगली पीढी को सौंपी है, उसमें उन्होने कभी भी ये गर्वोक्ति नही की हैं कि फ़लां काव्य मैने लिखा है. परमेश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्य  मानकर किये गये कार्य की भावना के कारण हमें वेदों , उपनिषदों तक के लेखकों के नाम नहीं मिलते. इसलिये ही हमें ये देखना पडता हैं, कि प्रस्तुत विषय पर किस ग्रंथ में कहां क्या क्या संदर्भ है, जिससे बेहद हद तक अनुमान की बजाय निष्चित किया जा सकता है. 
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इस बात में संदेह नहीं कि  वाल्मिकी रामायण वह ग्रंथ है, जो कि  महाकवि ऋषि वाल्मिकी नें लिखा है जो स्वयं  श्री राम के तत्कालीन थे, और उनके जीवन काल में ही यह सभी घटनाक्रम घटा था. अतः , इस महा गाथा को एक प्रामाणिक या Authentic  सूत्र माना जा सकता हैं. अतः , जहां जहां भी इस ग्रंथ का, या वाल्मिकी ऋषि का संदर्भ आयेगा और उसी तरह श्री राम का या उनसे जुडी घटनाओं का या पात्रों का ज़िक्र कहीं आयेगा तो निष्चित ही रामायण की घटनाओं की तारीख  नक्की होती चली जायेगी.


previewश्री राम एक काल्पनिक पात्र नही है, जैसे कि सुपरमेन, मिकी माऊस, रॊबिन हूड जो किसी Fiction या कपोल कल्पित उपन्यास का मात्र एक नायक हो, वरन एक ऐतिहासिक पुरुष है जैसे कि येशु ख्रिस्त, हज़रत मोहम्मद पैगंबर , महात्मा बुद्ध एवम महावीर स्वामी .इसका सबसे महत्वपूर्ण और ठोस तर्क यह है,इतने हज़ारों साल से सैंकडो ग्रंथों में, महाकाव्यों मे, साहित्यिक और ऐतिहासिक रचनाओं में श्री राम का उल्लेख और संदर्भ आता है, जिसके समकक्ष किसी और काल्पनिक पात्र का नाम हमें नही दिखता. 
                           
अब हम संदर्भों को तलाशतें हैं इस्वी सन के आरंभ के आसपास से, और फ़िर पीछी अतीत में जायेंगे-
 
ईस्वी सन से पूर्व ५५० वर्ष :


१. सबसे पहले महाकवि कालिदास की रचना रघुवंश में हम श्री राम के कुलपुरुष एवम दादा अयोध्या नरेश रघु के जीवन पर वृत्तांत पाते हैं. कालिदास का जीवन काल ईसा पूर्व पहला या दूसरा शतक ठहराया जाता है(इसके बारे में मेरे पूज्य पिता डॊ. प्र. ना. कवठेकर नें अभी एक पुरातात्विक प्रमाण अपनी पुस्तक – कालिदास , व्यक्ति और अभिव्यक्ति मॆं प्रकाषित किया है).

२. उसीके आसपास भास द्वारा लिखित दो संस्कृत नाटक हम पाते हैं, जो  रामायण की घटनाओं पर ही लिखे गये है.विद्वानों नें भास का काल ईस्वी सन पूर्व ५०० वर्ष के आसपास निष्चित किया है. भास के किसी भी साहित्य कृति में बुद्ध का ज़िक्र नही है, इसलिये ये स्वप्रमाणित है, कि श्री राम और रामायण बुद्ध और महावीर से पुराने हैं. (जैन धार्मिक ग्रंथों में भी तीर्थंकरों एक संदर्भ मॆं कहीं श्री राम का उल्लेख पाया गया है. हालांकि धार्मिक ग्रंथों को पूर्णतयः प्रामाणिक नही माना जा सकता, मगर ये तो तय है, कि उल्लेल्ख तो है ही.)

३.भास से समकक्ष है राजा शूद्रक जिसनें अपनें संस्कृत नाटक म्रूच्छ कटिकम में हनुमान का उल्लेख किया है. वैसे ही कवि कल्हण के राज तरंगिनी इस महाकाव्य में काश्मीर के राजा दामोदर के संदर्भ में रामायण का उल्लेख है.इस राजा का काल खंड भी लगभग यही है. कात्यायन के ग्रण्थ कर्म प्रदीप और कात्यायन स्मृति में ,कामंदकीय नीतिसार , शुक्र नीति  आदि में भी राम और सीतात्याग का  उल्लेख है.
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४. अनेक बौद्ध, जैन, ग्रीक साहित्य में कोशल देश की राजधानी ’ श्रावस्ती’ का वर्णन है, जिसे स्वयम श्री राम नें लव को स्थपित कर दी थी. 

५. पाणिनी और पतंजली के महाभाष्य में रामायण का उल्लेख है जिसका काल लगभग ईसा से लगभग  ८०० -  ११०० साल का है.

ईस्वी पूर्व १५०० वर्ष  के पहले :

१. जैमिनि ऋषि के  अश्वमेध ग्रंथ में और  गर्गसंहिता  , विष्णु पुराण ,पद्मपुराण , ब्रम्ह पुराण आदि में भी श्री राम का उल्लेख है.

२. रामायण में सिंहल द्वीप का कहीं वर्णन नही है, जब कि बुद्ध के जन्म के समय एक राजा हुआ था, विजय नाम का, जिसनें अपने पिता सिंहल के नाम से लंका का पुनर्नामकरण किया था. सिलोन या श्री लंका में महाराजाबलि नामक बौद्ध ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है के बुद्ध  जन्म के पूर्व इस द्वीप का नाम लंका था और बुद्ध निर्वाण के १८४५ वर्ष पहले रावण युद्ध हुआ था. इस गणित से रामायण का समय आता है -  ईसा पूर्व २३८८ वर्ष .

३. सिंधु संस्कृति के (ई.पू.२३५० लगभग) काल में शहरों के चारो ओर सुरक्षा तटबंदी  और  खंदक हुआ करती थी . रामायण  में भी अयोध्या और लंका की सुरक्षा का ऐसाही  वर्णन है.

४. इससे भी  पुराना ग्रंथ है तैत्तिरीय ब्राम्हण, जिसमें वाल्मिकी का उल्लेख है. लोकमान्य तिलक और केतकर नें इसका कालखंड माना है  ईसा पूर्व ४६५० वर्ष.

५. महाभारत उपरोक्त सभी ग्रंथोंसे  पुराना है, और इसका कालखंड अनेक विद्वानों नें अलग अलग माना है. वैदिक विग्यान संशोधन मंडल नें इसका काल माना है, ईसा से ५५६१ साल पूर्व. इसमें भी रामायण के कई पात्रों का ज़िक्र है, और कथाओं में रामायण की घटनाओं का उल्लेख हर जगह पाया जाता है.मगर रामायण में कहीं भी महाभारत के किसी भी घटनाक्रम का उल्लेख नही है.

महाभारत के समय रामायण बडा ही लोकप्रिय था क्योंकि अधिकतर पात्रॊं के जुबानी रामायण की घटनायें और पात्रोंका  उल्लेख है. (इसकी बृहद चर्चा यहां नहीं करेंगे, मगर किसीको अगर रुचि हो तो कृपया बतायॆं.)

कभी अलग पोस्ट मॆं महाभारत के काल समय की विवेचना अलग से करूंगा .
(श्री कृष्ण जन्म दिनांक- ?  !!!)

६. रामायण मॆं चारों वेदों का वर्णन है. मगर ऋग्वेद में  एक जगह इक्वाषु वंषी  राम का जिक्र है.संभवतः ये हमारे  ही राम हो सकते है. तिलक जी नें ऋग्वेद का काल ई.पू. ६००० वर्ष लगभग बताया है.

७. देवता – रामायण में ऋग्वेदकालीन देवता है, और महाभारत से  अलग हैं. रामायणमें इंद्र का अधिक उल्लेख है,मगर  महाभारत में नही के बराबर.महाभारत में गणपति है, मगर रामायणमें नहीं.(कार्तिकेय की पूजा का जिक्र है). महाभारत में स्त्रीयां होम  हवन नहीं करती थी मगर रामायण में ये प्रथा थी .

वेदों में और रामायण में स्त्रीयों का युद्ध पर जाने का जिक्र है, मगर महाभारतमें नही.सती की प्रथा रामायण में नही थी.

८. वंशावलीयां- हरिवंश , श्रीमद भागवत , महा भारत और रामायण में भी कुछ वंशावलीयां उपलब्ध है. उसके संदर्भों से  भी लगभग  रामायण का काल ई.पू. ७००० वर्ष आता है.

इसीलिये अब हम  मोटे तौर पर ये कह सकते हैं कि रामायण का समय ईसा पूर्व करीब सात हज़ार साल के आसपास हो सकता है.
४ डिसेंबर ई.पू. ७३२३…..

जन्म दिनांक का अब इतना अचूक गणित  मात्र ज्योतिष शास्त्र और खगोल विग्यान कि सहायता से ही  संभव है. हम भागशाली हैं कि हमारे ऋषियों को इस विषय पर पूर्ण अधिकार था, अतः उन्होने अपने  कथानक में हर संभव प्रयास किया है कि उन घटनाओं के समय आकाश में नक्षत्रों की स्थिति , आदि का स्पष्ट वर्णन नमूद किया गया है.

मित्रों, ये बात फ़िर से कबूल करने में कोई शर्म नही कि आपका ये खाकसार चाह कर भी समय पर पोस्ट नहीं लिख सका. तो कोशिश रहेगी कि अगले शनिवार/रविवार तक इसकी समापन किश्त भी प्रस्तुत की जायेगी.

यहां मैं हमारे हर दिल अज़ीज़ ताऊ का बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा कि मानस के अमोघ शब्द के इस नये रंग रूप लिये कलेवर के लिये मुझे यथा संभव मार्गदर्शन दिया है.

(पिछली एक पोस्ट में लगाये गये नटराज के चित्र श्री पंकज के सौजन्य से साभार प्राप्त किये गये.)

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