Thursday, July 2, 2009

नील मुकेश या नील नितीन...

पिछले दिनों काम के सिलसिले में छुट्टियां भी एंजोय करने का मूड हो गया था, इसलिये फ़िर गायब हो गया.

मौसम की पहली बारीश छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रसिद्ध दुर्गम किले रायगढ़ पर !!! क्या बात है. उसपर अलग से लिख रहा हूं.

कल न्युयोर्क फ़िल्म देखी. एक अलग विश्व, अलग समस्या और अलग तरीके से हेंडल किया गया वह महत्व पूर्ण विषय -

आतंकवाद!!!

शायद कबीरखान नें मुसलमानों के नज़रीये से भी पहली बार इस फ़िल्म में यह बात बताने की कोशिश की है, कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता. बात में दम है. दोनों ओर के दृष्टिकोण बडी बारीकी से और खुलासेवार पेश किये गये.अच्छा लगा.

फ़िल्म में रोशन का यह वाक्य बडा ही सारगर्भित है, जिसका सार यह है,कि एक मुसलमान होते हुए भी उसने काम के साथ कभी समझौता नही किया, और शायद अल्लाहताला नें ही उसे यह मौका दिया है, कि दुनिया में उस मुसस्सल ईमान की परख हो जाये, जिसके लिये हर मुसलमान इज़्ज़त की दृष्टि से देखा जाता है.

साथ ही में उसके जरिये यह बात भी बताई गयी कि चाहे कुछ भी हो जाये , आतंकवाद को किसी भी तर्क से जायज़ नही ठहराया जा सकता, जबकी बडी ही दुख की बात थी कि ९/११ के बाद ख्वामख्वाह मुसलमानों को तकलीफ़ों को झेलना पडा, और अमरीकी सरकार को अधिकतर इनोसेंट लोगों को छोडना पडा.




मुझे तो सबसे बढियां सीन वो लगा , जहां नील नितीन मुकेश नें अपने दादा स्वर्गीय मुकेश जी का वह गीत स्वयं गाया-

ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूट क्या, और भला सच है क्या!!

माशाल्लाह , बडा ही सुरीला गया है. खुदा उन्हे और ऐसे मौके दे, जहां वे गाना भी गाये.

आज मुझे पिछले साल की वह बात याद आ रही है, जो नील के पिता नितीन मुकेश जी नें एक व्यक्तिगत लंच में बताई थी, जब वे इंदौर आये थी लता मंगेशकर सन्मान समारोह में प्रस्तुति देनें.

उन्होने एक बडी ही रोचक बात बताई, कि जब फ़िल्मों के लिये नील को नाम चुनने को कहा गया तो उसे दो ओप्शन दिये गये थे--

नील मुकेश ...

या

नील नितीन...

यह बात बताते हुए नितीन मुकेश जी का सीना गर्व से फ़ूल गया था कि नील नें कहा:

मैं जो भी हूं आज अपने पिता की वजह से हूं , और साथ ही में मेरे दादाजी की भी विरासत का वारीस हू, और उनके आशिर्वाद हैं ही.

इसलिये मैं उन दोनों को मान देते हुए अपना नाम रखूंगा;

नील नितीन मुकेश..

Sunday, June 7, 2009

नो चीटींग .... रोंग साईड ओव्हरटेक...

आज ७ जून है.

आज खुशी की बात ये है, कि मेरे बेटे अमोघ का नवां जन्म दिन हैं और अभी शाम हमने एक पारिवारिक माहौल में मनाया है.

अभी अभी एक बडा अचीवमेंट भी उसके नाम रहा है. युसीमास मेंटल अरिथमेटिक्स एबेकस प्रतियोगिता में लगातार तीसरी बार मध्य प्रदेश में पांचवे लेवल में वह चेम्पियन याने प्रथम घोषित किया गया है.


मात्र मेंटल केल्क्युलेशन से वह मात्र एक-दो सेकंद में बडे बडे अंको के जोडने, घटाने, गुणा और भाग के उत्तर दे पाता है, जो आश्चर्यजनक है.दर असल एबेकस नाम के एक इंस्ट्रुमेंट की मदत से ये सभी गणनायें बडी ही आसान हो जाती है, और फ़िर बाद में अभ्यास से छात्र अपने दिमाग में ही वह गणना कर लेता है, उस उपकरण की मेंटल छबि बना कर. वैसे पिछले दो साल वह चेन्नई मे संपन्न हुए अखिल भारतीय प्रतियोगिता में भी प्रथम रनर अप रहा है, और दो साल पहले कुवालालम्पूर में हुई अखिल विश्व प्रतियोगिता में उसके आयु वर्ग में इंटरनेशनल चेम्पियन का रनर अप, और इंटरनेशनल लेवल पर पांचवा रहा .

आज ही हमनें उसका चेन्नई में ५ जुलाई को होने वाले अखिल भारतीय कोंपीटीशन के लिये फ़ार्म भरा है.उसका ये अंतिम वर्ष है क्योंकि उसने इस साल ग्रेजुएशन कर डाला है इस शिक्षा पद्धती में अपने नवें साल में ही.याने के ये साल उसका अंतिम साल है, इस शिक्षा पद्धति की पढाई में.

यहां एक बात का विशेष उल्लेख करने के लिये ये पोस्ट है. अपने बेटे की सफ़लता में खुश होना और गौरवान्वित होना हर पिता का स्वप्न होता है. मगर उसके साथ जुडी हुई कुछ घटनाओं से हमें हमारे ऊसूलों या वेल्यु को भी परखने का मौका मिलता है, और हम कभी कभी निर्णय लेने के उस मोड पर खडे हो जाते है, जहां पर एक बडी ही पतली रेखा रहती है,जिससे पासे पलट जाते हैं, और ग़म और खुशी का उपहार हमें मिलता है.

दो साल पहले जब चेन्नई में चेम्पियन शिप में रनर अप आने से पूरे भारत वर्ष में चेंपियन बनने की आभिलाषा अधूरी रह गयी थी.आश्चर्य की बात ये भी थी कि चेम्पियन बना था उसका ही मित्र तेजस, जो उसकी ही कक्षा में पढता है.हमने भी यही सोचा कि उसकी मेहनत कम पड गयी होगी या भाग्य नें आज साथ नही दिया तो वर्ल्ड लेवल पर भी प्रयत्न करने में हर्ज़ नही है.

कोंपीटीशन हॊल में जाने से पहले अमोघ मेरे पास आया और उसनें मुझसे एक बडी ही आश्चर्यजनक बात बताई. उस प्रतियोगिता में एबेकस इंस्ट्रुमेंट की मदत से आठ मिनीट में २०० सवाल हल करने थे, जबकि अमोघ का और हमारे भारतीय बच्चों का मेंटल लेवल इतना अधिक कुशाग्र था कि वे मन में ही सवाल हल करने को निपुण हो गये थे.

इसीलिये जब हमारे बच्चों को पता था कि उन्हे उपकरण से करने में थोडा समय लगेगा, बनिस्बत कि दिमाग से करने, तो तेजस नें अमोघ को बताया कि उसके पापा नें उससे कहा है, कि वे वहां पहले दो मिनीट तो मेंटली हल करें, और ऊपर से ये दिखायें कि वे उपकरण से हल कर रहें है.तो वे बाकी बच्चों से थोडा आगे निकल जायेंगे.तो वह क्या करे?

मैं और मेरी पत्नी डा. नेहा अचंभित हो कर सोच में पड गये कि अब हमें क्या निर्णय लेना है. क्या हम अपने बेटे को चीटींग करने को प्रवृ्त्त करें और गलत तरीके से चेम्पियनशीप हथियाई जाये.या जो भी हो , सत्य और अनुशासन की राह पर चल कर जो भी रिज़ल्ट हो उसे स्वीकार करें. इसी उधेडबुन में हम थे कि समय के अभाव के कारण अमोघ हाल में चला गया, हमसे उत्तर लिये बगैर.

अब हम यही सोच रहे थे कि एक ७ वर्षीय बच्चे से हम क्या उम्मीद करें जो यहां वह उचित और सही निर्णय ले.उतने में हाल में एक घोषणा हुई कि कोई भी बच्चा दिमागी तौर पर गणित के सवाल हल नही करेगा, सिर्फ़ उपकरण से ही करेगा., और कोई अगर पकडा जायेगा तो हमेशा के लिये उसे बाहर कर दिया जायेगा.

हम इसी बीच निर्णय ले चुके थे कि जैसे भी हो, उसे सच की राह पर ही चलना चाहिये, मगर इस बात से हम बडा ही चिंतित हो गये, कि पता नही अमोघ नें क्या निर्णय लिया.

जब वह परीक्षा देकर बाहर आया तो सबसे पहले उससे हमनें यही पूछा कि उसने क्या किया?

उस सात वर्षीय बच्चे नें ये कह कर हमारी आंखों में आंसू ला दिये और हमारे सर गर्व से ऊपर उठा दिये कि-

पापा- मैनें सोचा कि ये बात गलत है, और मैं कुछ भी हो जाये चीटींग नहीं करूंगा. हो सकता है, कि आज मैं हार जाऊं मगर मैं गलत काम नहीं करूंगा.

हुआ भी वही. तेजस वर्ल्ड चेंपियन बन गया और अमोघ रनर अप.

चेम्पियन्शिप नही मिलने की उदासी स्वाभाविक ही थी जिसने उस बच्चे को दुखी कर दिया. जैसे कि मैने एक फ़िल्म चितचोर में देखा था, दुख इस बात का नही कि हार गये या पीछे रह गये. मगर रोंग साईड से ओवरटेक कर के गाडी आगे चली गयी थी. उन हताशा भरे क्षणो के बीच में उसनें मुझसे कहा - सॊरी पापा.

मैने और नेहा नें अमोघ से कहा- नही बेटे, तुम ही चेम्पियन हो. You are Real Champion.

भारत लौटने पर मैने अपने कंप्युटर में अमोघ ने तेजस को लिखा एक पत्र पढा, (उसका पहिला पत्र!!) जिसमें उसको बधाई देते हुए अमोघ नें लिखा था- अगले साल तो पूरा मेंटल ही है, तो फ़िर मिलेंगे.

आज उस घटना को दो साल बीत गये हैं. पिछले साल मैं उसे फ़िर नही ले गया.मगर इसी बीच अमोघ दो सालों में दो लेवल की जगह चार लेवेल पास कर के ग्रेज्युएट हो गया है, और तेजस दो ही लेवल कर पाया है.(यहां ये संभव था)इस साल वह भी चेम्पियन बना , मगर छोटी कक्षा में.

मैं भी कभी कभी सोचता हूं , कि क्या अमोघ नें सही निर्णय लिया था. आज कुछ भी हो, तेजस वर्ल्ड चेम्पियन है, और दुनिया यही जानती है, मानती है. आज तक अपने जीवन में मैने भी इसी सत्य की राह पर अपने निर्णय लिये हैं, मगर मैं एक सफ़ल बिज़नेसमन नहीं हूं. ( मूल्यों से कंप्रोमाईज़ नही करने वाला व्यवसाई!!! हा हा हा!!!-हास्यास्पद है ना?)


a. आप ही बताईये, कि क्या सही है , क्या गलत?

b. क्या उसे फ़िर इस साल कुवालालंपूर भेजना चाहिये?

c. क्या अमोघ भी अपने पिता के समान सच की राह पर चलते हुए असफ़लताओं का बोझा ढोयेगा, या फ़िर उसे Survival of Fittest के इस जंगल राज के नियम को मानते हुए, सीधी या टेढी उंगली कर के घी निकालना चाहिये?

d. क्या सच्चे का बोलबाला और झूटे का मुंह काला ये कहावत आज भी चरितार्थ हो रही है?...

बताईये आप सभी प्रबुद्ध जन क्या राय रखते है?

Sunday, May 31, 2009

बेवकूफ़ कौन?

आज तंबाखू निषेध दिवस है...

आज एक बार फ़िर अखबार रंग गये हैं , ये बात दो करोड बीस लाख वीं बार बताने को, कि तंबाखू स्वास्थ्य के लिये हानि कारक है, और केंसर का सबब. फ़िर हममें से कई सिरियसली सोचेंगे- यार वाकई में ये सही है. सिगरेट या गुटके से कोई लाभ नही है .किसी ना किसी ना किसी को तो पहल करनी ही चाहिये.

और ये सोचने के तीन सेकंद बाद एक सिगरेट सुलगाकर एक लंबा कश लेकर धुआं छोडते हुए कहेंगे-

हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया.

क्या अजीब दुखद संयोग है. आज अभी अभी मैं एक दाहसंस्कार से हो कर आया हूं और आते ही लिखने बैठ गया. मेरे पिताजी के मित्र श्री अजीतसिंग जी नही रहे.८८ वर्ष की आयु में आज ही सुबह उनका स्वर्गवास हुआ और उनके निधन का कारण था केंसर...

हम कई सालों पहले जहां रहते थे (पिपली बाज़ार) वे हमारे पडोसी थे. तहसिलदार से कलेक्टर तक का सफ़र तय किया था उन्होनें और हम बचपन से देखते चले आये हैं कि वे पान बहार यूं खाते हैं जैसे कि हम सांस लेते हैं.(पहले वे तमाखू खाते थे और बाद में पान मसाला). उन्हे हम सभी मालेक हुकुम बुलाते थे, मगर चूंकि उनका तकिया कलाम था बेवकूफ़- तो मेरे पिताजी ने उनका उपनाम ही रख दिया था कि बेवकूफ़..वो पिताजी को मास्टर ...

मुझे वह दिन आज भी याद है, कि हमारे संयुक्त परिवार में मेरे बडे भाईयों (भाऊ,दादा)के साथ एक बार मैं भी मालेक हुकुम के दोनो बेटों के साथ पिक्चर देखने चला गया था. मैं छो्टा होने से हमारी व्यवस्था भेड की तरह होती थी. जहां बडे ले जाये,वहां चले जायें.

बाद में लौटने पर मालूम हुआ, कि मालेक हुकुम के बेटों ने, एम भैया और एन भैया(महेंद्र और नरेंद्र) नें अपने पिताजी को बिना पूछे घर की रद्दी बेच दी थी(पांच आने सेर के भाव में )और पैसे लेकर सिनेमा देखने चले गये थे श्रीकृष्ण टाकीज़ में.रद्दीवाले की चुगली नें भांडा फ़ोड दिया था.

बस क्या था, आते ही आनन फ़ानन में मालिक हुकुम नें एम और एन भैया को आडे हाथों लेते हुए लकडी की स्केल से चार पांच बार सुताई कर दी, और एक दो बार हमारे बडे भाईयों की भी(मैं बच गया क्योंकि बहुत ही छोटा होने से अपराधियों के श्रेणी में नही आया था तब तक!- मगर कान उमेठनें की सज़ा ज़रूर पायी)

ताबडतोब हमारे ताऊ जी को बुलाया गया , और वे भी वहीं शुरु हो गये.(मुर्गा बनने की सज़ा की वजह से बाद में हिंसक गतिविधियां बंद हुई!!!)

क्या आपने एक बात नोट की ? कोई अपने पडोसी के बेटे को आज मार सकता है? पडोसी तो पडोसी, क्या सगे ताऊ या चाचा ये ज़ुर्रत कर सकतें है?

इस सभी एपिसोड के अंत में मालेक हुकुम नें हम सभी को पास में लेते हुए पुचकारते हुए कहा- बच्चों , पैसे चाहिये थे तो हमसे मांग लेते - गलत आदत क्यों डालते हो?

आज हम रिस्ट्रोस्पेक्ट में देखते हैं तो मन ये सोचता है, कि हम नें बाद में ऐसी कोई भी आदत नही डाली,और खुद मालेक साहब हुकुम ?

इसलिये कल शाम को जब मेरे पिताजी उन्हे मिलने गये थे तो वे यही बोले- मैं तुझे बेवकूफ़ कहता था - कि तू मास्टर का मास्टर ही रहा ( वैसे पिताजी वाईस चांसलर बन कर रिटायर हुए थे). मगर आज अगर ये तमाखूं नही होती तो और भी जीते.

आज सुबह उनको जब ये खबर दी तो वे यही बोले-- बेवकूफ़ नही रहा.....

आज जब उनके पार्थिव देह को उठाया तो एम भैया की लडकी नें अंदर से उनकी छडी और ऐनक लाकर दी , उनके साथ ले जाने के लिये.. और साथ में अग्नि के हवाले करने के लिये.

मगर अचानक बडी भाभी पूजा भाभी अंदर गयीं और एक पान बहार का डब्बा भी उठाकर ले आयी,और अर्थी पर रख दिया. एम भैया चौंक पडे. उन्होने डिब्बे को देखा और फ़िर भाभी को. मेरे से भी आंखे पल भर के लिये मिली ,और झुक गयी.

फ़िर मुंह में से पान मसाले की पीक थूकते हुए (शायद आखरी बार?) एम भैया अर्थी को कांधा देने के लिये बढे़.........

वह डब्बा मालेक हुकुम का नही था.वह था एम भैय्या का .......

Monday, May 4, 2009

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक के प्रमाण - २

युगपुरुष श्री राम के जन्म दिनांक (रविवार , ४ डिसेंबर ,७३२३ ई.सन पूर्व ) के प्रमाणों के लिये पिछली पोस्ट पर मैंने ज़िक्र किया था ३ प्रमुख प्रमाणों का, जिसमें पहला था –पुरातात्विक प्रमाण, दूसरा था साहित्यिक प्रमाण, और तीसरा था ज्योतिषीय एवम खगोलीय प्रमाण.

कृपया यहां पढें...

मैं बडा़ ही शर्मसार हूं, वादाशिकन भी, कि आपकी उत्कंठा के विपरीत इतने दिनों नेट से अनुपस्थित रहा और आगे इस महत्वपूर्ण एवम रोचक विषय पर आगे कुछ नही लिख सका. कारोबारी सिलसिले में इन दिनों बाहर ही हूं अधिकतर, जिससे, इतने गंभीर मसले पर हल्का फ़ुल्का लिख पाना मुनासिब नही समझता. मुझे यकीं है कि आप मुझे मुआफ़ करेंगे.कोशिश करूंगा कि इस बार देर नही होगी…….
१. पुरातात्विक प्रमाण:

हमने पिछली कडी में पढा कि दुर्भाग्य से हमें राम के जीवन काल पर कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिल पाये. मगर जैसा कि हमारे ब्लोगर        श्री पी एन सुब्रमन्यन नें सही लिखा है, कि दर असल आज जिस जगह हम अयोध्या मान कर चल रहें है, वहां मूल अयोध्या है ही नही. वह कही और ही आस पास होनी चाहिये.

बाकि अन्य राम को आस्था का विषय तो मानते हीं है, मगर कुछ  उनके ऐतिहासिक वजूद को मानने में पूर्ण तयः निश्चित नहीं हैं. अब हम देखें कि अन्य क्या तर्क दिये जा सकते हैं , जिससे हम इस बात की संपूर्ण पुष्टि कर लें.

ramaइसलिये इस लेख के प्रारंभ में मैं ये स्पष्ट  कर दूं , कि मेरा ये निश्चित मत है कि श्री राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे जिन्होने इस भारत वर्ष की पावन धरती पर सांस ली थी. अतः, उनके ईश्वरत्व और आस्था के परे जाकर अभी तो हम उन्हे एक पुरुषोत्तम महामानव की दृष्टि से ही देखेंगे. मेरी राय से इत्तेफ़ाक नही रखने वालों से विनम्र निवेदन है, कि जैसा कि शास्त्रार्थ का नियम है, अपने मत और तर्क बुद्धिमत्ता, विवेक, और ग्यान के धरातल पर जांच कर ही रखें तो इस विषय को सार्थक और नयी दिशा मिलेगी. दूसरी बात ये भी है, कि यहां जो भी लिखा जा रहा है, मूल कंटेंट में काफ़ी विस्तार से विवेचना उपलब्ध है, मगर मूल भावना को ही यहां रेखांकित किया जा रहा है.
२. साहित्यिक प्रमाण :

भारत में किसी  ऐतिहासिक महापुरुष या साहित्य कृति का सही काल निर्णय करना बडी ही कठिण समस्या है. वह इसलिये कि बडे़ बडे़ ग्रंथ, ऋचायें, महागाथायें, और पोथियां हमारे स्वयंसिद्ध ऋषियों नें लिख कर अगली पीढी को सौंपी है, उसमें उन्होने कभी भी ये गर्वोक्ति नही की हैं कि फ़लां काव्य मैने लिखा है. परमेश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्य  मानकर किये गये कार्य की भावना के कारण हमें वेदों , उपनिषदों तक के लेखकों के नाम नहीं मिलते. इसलिये ही हमें ये देखना पडता हैं, कि प्रस्तुत विषय पर किस ग्रंथ में कहां क्या क्या संदर्भ है, जिससे बेहद हद तक अनुमान की बजाय निष्चित किया जा सकता है. 
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इस बात में संदेह नहीं कि  वाल्मिकी रामायण वह ग्रंथ है, जो कि  महाकवि ऋषि वाल्मिकी नें लिखा है जो स्वयं  श्री राम के तत्कालीन थे, और उनके जीवन काल में ही यह सभी घटनाक्रम घटा था. अतः , इस महा गाथा को एक प्रामाणिक या Authentic  सूत्र माना जा सकता हैं. अतः , जहां जहां भी इस ग्रंथ का, या वाल्मिकी ऋषि का संदर्भ आयेगा और उसी तरह श्री राम का या उनसे जुडी घटनाओं का या पात्रों का ज़िक्र कहीं आयेगा तो निष्चित ही रामायण की घटनाओं की तारीख  नक्की होती चली जायेगी.


previewश्री राम एक काल्पनिक पात्र नही है, जैसे कि सुपरमेन, मिकी माऊस, रॊबिन हूड जो किसी Fiction या कपोल कल्पित उपन्यास का मात्र एक नायक हो, वरन एक ऐतिहासिक पुरुष है जैसे कि येशु ख्रिस्त, हज़रत मोहम्मद पैगंबर , महात्मा बुद्ध एवम महावीर स्वामी .इसका सबसे महत्वपूर्ण और ठोस तर्क यह है,इतने हज़ारों साल से सैंकडो ग्रंथों में, महाकाव्यों मे, साहित्यिक और ऐतिहासिक रचनाओं में श्री राम का उल्लेख और संदर्भ आता है, जिसके समकक्ष किसी और काल्पनिक पात्र का नाम हमें नही दिखता. 
                           
अब हम संदर्भों को तलाशतें हैं इस्वी सन के आरंभ के आसपास से, और फ़िर पीछी अतीत में जायेंगे-
 
ईस्वी सन से पूर्व ५५० वर्ष :


१. सबसे पहले महाकवि कालिदास की रचना रघुवंश में हम श्री राम के कुलपुरुष एवम दादा अयोध्या नरेश रघु के जीवन पर वृत्तांत पाते हैं. कालिदास का जीवन काल ईसा पूर्व पहला या दूसरा शतक ठहराया जाता है(इसके बारे में मेरे पूज्य पिता डॊ. प्र. ना. कवठेकर नें अभी एक पुरातात्विक प्रमाण अपनी पुस्तक – कालिदास , व्यक्ति और अभिव्यक्ति मॆं प्रकाषित किया है).

२. उसीके आसपास भास द्वारा लिखित दो संस्कृत नाटक हम पाते हैं, जो  रामायण की घटनाओं पर ही लिखे गये है.विद्वानों नें भास का काल ईस्वी सन पूर्व ५०० वर्ष के आसपास निष्चित किया है. भास के किसी भी साहित्य कृति में बुद्ध का ज़िक्र नही है, इसलिये ये स्वप्रमाणित है, कि श्री राम और रामायण बुद्ध और महावीर से पुराने हैं. (जैन धार्मिक ग्रंथों में भी तीर्थंकरों एक संदर्भ मॆं कहीं श्री राम का उल्लेख पाया गया है. हालांकि धार्मिक ग्रंथों को पूर्णतयः प्रामाणिक नही माना जा सकता, मगर ये तो तय है, कि उल्लेल्ख तो है ही.)

३.भास से समकक्ष है राजा शूद्रक जिसनें अपनें संस्कृत नाटक म्रूच्छ कटिकम में हनुमान का उल्लेख किया है. वैसे ही कवि कल्हण के राज तरंगिनी इस महाकाव्य में काश्मीर के राजा दामोदर के संदर्भ में रामायण का उल्लेख है.इस राजा का काल खंड भी लगभग यही है. कात्यायन के ग्रण्थ कर्म प्रदीप और कात्यायन स्मृति में ,कामंदकीय नीतिसार , शुक्र नीति  आदि में भी राम और सीतात्याग का  उल्लेख है.
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४. अनेक बौद्ध, जैन, ग्रीक साहित्य में कोशल देश की राजधानी ’ श्रावस्ती’ का वर्णन है, जिसे स्वयम श्री राम नें लव को स्थपित कर दी थी. 

५. पाणिनी और पतंजली के महाभाष्य में रामायण का उल्लेख है जिसका काल लगभग ईसा से लगभग  ८०० -  ११०० साल का है.

ईस्वी पूर्व १५०० वर्ष  के पहले :

१. जैमिनि ऋषि के  अश्वमेध ग्रंथ में और  गर्गसंहिता  , विष्णु पुराण ,पद्मपुराण , ब्रम्ह पुराण आदि में भी श्री राम का उल्लेख है.

२. रामायण में सिंहल द्वीप का कहीं वर्णन नही है, जब कि बुद्ध के जन्म के समय एक राजा हुआ था, विजय नाम का, जिसनें अपने पिता सिंहल के नाम से लंका का पुनर्नामकरण किया था. सिलोन या श्री लंका में महाराजाबलि नामक बौद्ध ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है के बुद्ध  जन्म के पूर्व इस द्वीप का नाम लंका था और बुद्ध निर्वाण के १८४५ वर्ष पहले रावण युद्ध हुआ था. इस गणित से रामायण का समय आता है -  ईसा पूर्व २३८८ वर्ष .

३. सिंधु संस्कृति के (ई.पू.२३५० लगभग) काल में शहरों के चारो ओर सुरक्षा तटबंदी  और  खंदक हुआ करती थी . रामायण  में भी अयोध्या और लंका की सुरक्षा का ऐसाही  वर्णन है.

४. इससे भी  पुराना ग्रंथ है तैत्तिरीय ब्राम्हण, जिसमें वाल्मिकी का उल्लेख है. लोकमान्य तिलक और केतकर नें इसका कालखंड माना है  ईसा पूर्व ४६५० वर्ष.

५. महाभारत उपरोक्त सभी ग्रंथोंसे  पुराना है, और इसका कालखंड अनेक विद्वानों नें अलग अलग माना है. वैदिक विग्यान संशोधन मंडल नें इसका काल माना है, ईसा से ५५६१ साल पूर्व. इसमें भी रामायण के कई पात्रों का ज़िक्र है, और कथाओं में रामायण की घटनाओं का उल्लेख हर जगह पाया जाता है.मगर रामायण में कहीं भी महाभारत के किसी भी घटनाक्रम का उल्लेख नही है.

महाभारत के समय रामायण बडा ही लोकप्रिय था क्योंकि अधिकतर पात्रॊं के जुबानी रामायण की घटनायें और पात्रोंका  उल्लेख है. (इसकी बृहद चर्चा यहां नहीं करेंगे, मगर किसीको अगर रुचि हो तो कृपया बतायॆं.)

कभी अलग पोस्ट मॆं महाभारत के काल समय की विवेचना अलग से करूंगा .
(श्री कृष्ण जन्म दिनांक- ?  !!!)

६. रामायण मॆं चारों वेदों का वर्णन है. मगर ऋग्वेद में  एक जगह इक्वाषु वंषी  राम का जिक्र है.संभवतः ये हमारे  ही राम हो सकते है. तिलक जी नें ऋग्वेद का काल ई.पू. ६००० वर्ष लगभग बताया है.

७. देवता – रामायण में ऋग्वेदकालीन देवता है, और महाभारत से  अलग हैं. रामायणमें इंद्र का अधिक उल्लेख है,मगर  महाभारत में नही के बराबर.महाभारत में गणपति है, मगर रामायणमें नहीं.(कार्तिकेय की पूजा का जिक्र है). महाभारत में स्त्रीयां होम  हवन नहीं करती थी मगर रामायण में ये प्रथा थी .

वेदों में और रामायण में स्त्रीयों का युद्ध पर जाने का जिक्र है, मगर महाभारतमें नही.सती की प्रथा रामायण में नही थी.

८. वंशावलीयां- हरिवंश , श्रीमद भागवत , महा भारत और रामायण में भी कुछ वंशावलीयां उपलब्ध है. उसके संदर्भों से  भी लगभग  रामायण का काल ई.पू. ७००० वर्ष आता है.

इसीलिये अब हम  मोटे तौर पर ये कह सकते हैं कि रामायण का समय ईसा पूर्व करीब सात हज़ार साल के आसपास हो सकता है.
४ डिसेंबर ई.पू. ७३२३…..

जन्म दिनांक का अब इतना अचूक गणित  मात्र ज्योतिष शास्त्र और खगोल विग्यान कि सहायता से ही  संभव है. हम भागशाली हैं कि हमारे ऋषियों को इस विषय पर पूर्ण अधिकार था, अतः उन्होने अपने  कथानक में हर संभव प्रयास किया है कि उन घटनाओं के समय आकाश में नक्षत्रों की स्थिति , आदि का स्पष्ट वर्णन नमूद किया गया है.

मित्रों, ये बात फ़िर से कबूल करने में कोई शर्म नही कि आपका ये खाकसार चाह कर भी समय पर पोस्ट नहीं लिख सका. तो कोशिश रहेगी कि अगले शनिवार/रविवार तक इसकी समापन किश्त भी प्रस्तुत की जायेगी.

यहां मैं हमारे हर दिल अज़ीज़ ताऊ का बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा कि मानस के अमोघ शब्द के इस नये रंग रूप लिये कलेवर के लिये मुझे यथा संभव मार्गदर्शन दिया है.

(पिछली एक पोस्ट में लगाये गये नटराज के चित्र श्री पंकज के सौजन्य से साभार प्राप्त किये गये.)

Friday, April 10, 2009

भगवान श्री राम के जन्म दिनांक के प्रमाण..

 

पिछले अंक में राम नवमी के दिन मैने आपको श्री राम जन्म दिन की अचूक तारीख और उनसे संबंधित अन्य घटनाओं के भी दिन, वार और सन बताये थे.

कृपया यहां पढें

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राम जन्म                        -    रविवार - ४ डिसेम्बर  ७३२३  ई.स.पूर्व

राम विवाह                        -    शुक्रवार - ७ अप्रिल  ७३०७  ई.सन.पूर्व

राम -वनवास गमन          -    गुरुवार - २९ नवम्बर ७३०६ ई.सन.पूर्व

रावण वध                        -   रविवार  - १५ नवम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व

राम -अयोध्या प्रवेश          -   रविवार  - ६ डिसेम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व


हमारे कई ब्लोगर साथियों नें ये जानने की उत्कंठा व्यक्त की है, जैसे ताऊ नें ये पूछा है, कि क्या इसका कोई सोफ़्ट्वेयर है. राज भाटिया जी को सबूत भी चाहिये, और अन्य जैसे अर्श,अल्पनाजी,उडन तश्तरी,संगीताजी इस रोचक तथ्य को जानने को उत्सुक हैं.

हालांकि, इतिहास मेरा विषय कभी नही रहा है, मगर चूंकि पिताजी एक जानेमाने Indologist   और संस्कृत के विद्वान और प्राचीन संस्कृति के , साहित्य के शोधक रहे हैं, मुझे हमेशा ही इन बातों में रुचि रही है, और उनके पास आने वाले बृहद शोध प्रबंधों और मूर्धन्य विद्वानों के रिसर्च पेपर्स को खंगालने की आदत भी.

पूणे में एक ऐसे ही विद्वान है, जिनका नाम है, डॊ. पद्माकर विष्णु वर्तक.पेशे से सर्जन हैं और एक नर्सिंग होम भी चलाते है. मगर साथ ही में उन्होने प्राचीन ग्रंथों, वेदों , उपनिषदों और इतिहास पर पूरा संशोधनात्मक अध्ययन किया है.साथ में आपने अपने जैसे अन्य अभ्यासू और जिग्यासू विद्वानों के साथ वैदिक संशोधन मंडल का भी गठन किया है जिसमें इन ग्रंथों में छुपे हुए रहस्य, विग्यान संबंधी रोचक और तथ्यात्मक अध्ययन किया जा रहा है. पिताजी के साथ साथ मैं भी इस संस्था से कई सालों से जुडा हुआ हूं, और इसीलिये अपनी ओर से मैंने भी कुछ प्रयास किये है, अन्य विषयों पर भी.
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आपने अपने एक मराठी प्रबंध पुस्तक वास्तव रामायण में भगवान श्री राम के चरित्र, रावण और अन्य पात्रों और घटनाओं को इतिहास की दृष्टी से देखा है और विवेचना की है.

मेरे मित्रों, सबसे पहले हम यहां इस बात की विवेचना में पडने की आवश्यकता नहीं समझते कि क्या वास्तव में श्री राम एक ऐतिहासिक पुरुष थे या नहीं. यह बात हज़ारों वर्षों से परंपरा, साहित्य, लोकगाथायें, पुरातात्विक और एतिहासिक घटनाओं से स्वयंसिद्ध रही है. हमारी विवेचना के साथ साथ इस सत्यता की परख अपने आप भी  रेखांकित होती जायेगी.

जब हम किसी भी घटना, या काल या विवरण का वस्तुपरक अध्ययन या शोध करते है, तो हमें उसे मोटे तौर पर तीन विधाओं  के प्रमाणों की कसौटी पर परखना होता है:

1. पुरातात्विक प्रमाण
    (Archeological Evidence)
2. साहित्यिक प्रमाण 
   ( Literary Evidence)
3. ज्योतिषिय और खगोलीय प्रमाण
    ( Astrological &   Astronomical  Evidence)

1. पुरातात्विक प्रमाण :

    दुर्भाग्य से, हमें राम की जीवनी पर पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलते. वर्तमान अयोध्या के पास किये गये खुदाई के प्रयासों से हम लोग अधिकतम ईसा से १५०० से २००० वर्षों तक ही पहुंच पाये है. कार्बन डेटिंग के माध्यम से हमें उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं की आयु सीमा का मान हो पाता है.

मगर , हमारे देश में और देश के बाहर भी कई ऐसे स्थान मिलते है, जहां कि लोक कथाओं मे या लोकोक्ति में राम जी के जीवन संबंधी वर्णन मिलते हैं. मगर ये सभी तथ्यात्मक प्रमाण नहीं माने जा सकते.

2. साहित्यिक प्रमाण   :

सौभाग्य से हमारा इतिहास और संस्कृति की धरोहर रहे है हमारे प्राचीन ग्रंथ , जिनमे प्रमुख हैं – चारों वेद, उपनिषद, पुराण, वाल्मिकी रामायण, वेद व्यास रचित महाभारत, और अनेक ऋषि मुनियों द्वारा लिखे गये ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ग्रंथावलीयां आदि….

अब हम अपनी अगली कडी़ में इस प्रमाण पर विस्तृत चर्चा करेंगें. चूंकि हम बात को प्रमाणित करने का प्रामाणिक प्रयत्न कर रहें है, अतः थोडा गहराई में जाना आवश्यक हो जाता है. अगर आपमें से कोई जानकार इसमें कोई नई जानकारी देकर कोई नयी रोशनी डालना चाहे तो स्वागत ही है…….

मिलते हैं ब्रेक के बाद……
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डॊ. वर्तक आध्यात्मिक शक्ति के भी साधक हैं, जिसका उपयोग उन्होनें वैदिक विग्यान के कई अबूझ रहस्यों को सुलझाने के लिये किया है. जैसे गुरु और मंगल ग्रह सूक्ष्म देह से विचरण इत्यादि.इसके बारे में अगले किसी अंक में…

Saturday, April 4, 2009

राम नवमी - भगवान श्री राम के जन्म दिन की अचूक तारीख ,

आज राम नवमी है !!

भगवान श्री राम का जन्म दिन ---



चैत्र शुक्ल नवमी. आप सभी को याद होगा कि राम नवमी हम सभी हिंदु पंचांग से मनाते हैं , और अंग्रेज़ी केलेंडर के अनुसार मार्च से अप्रिल के महिने में ये शुभ पर्व मनाया जाता है.

पहले अक्सर हमारी वार्षिक परिक्षायें होती थी इसलिये दोपहर को राम जन्म के अवसर पर परिक्षा स्थल पर होते थे. हमारे पुराने पुश्तैनी ग्घर के एकदम पडोस में एक प्राचीन राम मंदिर था, तो हम बाद में दर्षन करने जाते थे और प्रसाद के तौर पर पंजरी मिलती थी जो भगवान को बडी प्यारी है.

अब मैं अगर आपको पूंछूं कि राम जन्म की असली और अचूक तारीख कौनसी है? शायद आप कहेंगे, कि ये कैसे संभव है.

मगर मैं आपको बताता हूं कि श्री राम की जीवनी से जुडी तारीख या दिन कौन सा है?


राम जन्म - रविवार - ४ डिसेम्बर ७३२३ ई.स.पूर्व

राम विवाह - शुक्रवार - ७ अप्रिल ७३०७ ई.सन.पूर्व

राम -वनवास गमन - गुरुवार - २९ नवम्बर ७३०६ ई.सन.पूर्व

रावण वध - रविवार - १५ नवम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व

राम -अयोध्या प्रवेश - रविवार - ६ डिसेम्बर ७२९२ ई.सन.पूर्व


स्वाभाविक ही है कि मुझे अब आपके कई प्रष्नों का उत्तर देना है, कि ये सब किसने , कैसे, और कहां बताया है.आप ये भी पूछेंगे कि राम जन्म डिसेंबर में कैसे.

आपसे क्षमा मांगते हुए मैं अर्ज़ करना चाहूंगा कि चूंकि मैं फिर से चेन्नई और वेल्लोर के प्रवास पर निकल रहा हूं , इतनी बडी पोस्ट इतने कम समय में लिखना संभव नही. मेरा वादा कि आते ही इस पहेली का समाधान करने का पूर्ण प्रयत्न करूंगा.

क्षमा, और मिलते हैं ब्रेक के बाद....

Wednesday, April 1, 2009

गुडी पाडवा और नव वर्ष की शुभकामनायें


पिछले दिनों जब फ़िर बाहर था, तो कुछ अभिलाषायें मन की मन में ही रह गयी. चाहता था कि आप सभी अपनों को , स्वजनों को नव वर्ष की बधाईयां दे दूं. दुख ये यूं हुआ , कि हमारे देश में कॆलेंडर के नव वर्ष पर जनवरी में जो उल्ल्हास , जोश , उमंग हम सभी में , विशेषकर युवाओं में रहता है, वह हिंदुओं के नव वर्ष, मराठीयों के गुडी पाडवा पर, सिंधीयों के चेटिचंद उत्सव पर हमारा उत्साह क्यों नहीं दिखता.

वैसे सारे महाराष्ट्र में गुडी पाडवा बडी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, इसलिये यहां हर जगह छुट्टी होती है, जबकि मेरे बेटे अमोघ, जो यहां के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल डेली कॊलेज में पढता है, नव वर्ष पर छुट्टी नही थी.

चलो , देर आयद दुरुस्त आयद, आप सभी को .साईड बार में अवश्य लगा दी थी मगर दिल है कि मान नही रहा था, इसलिये फ़िर से रूबरू दे दी!!!

ये चित्र हमारे घर में स्थापित गुडी का है, जिसमें कि जैसे आप सब को पता ही होगा , एक दंड होता है, जिसपर गुडी के प्रतीक के रूप में एक चांदी के लोटे को उल्टा करके साडी पहनाई जाती है. एक मंगलसूत्र भी होता है, सौभाग्य की निशानी,और नीम के कुछ पत्ते.


आपने देखा ही होगा कि ये जो गुडी है, एक पेडस्टल पर बाकायदा फ़िट की हुई है, अन्यथा , अधिकतर सभी घरों में बांस का दंडा ले कर उस पर साडी ’मिरे’ कर के याने कि करीने से घडी कर के बांधी जाती है.मगर जैसा कि हर जगह इन्स्टॆंट चीज़ो का ज़माना आ गया है, मुम्बई में पिछले कुछ सालों पहले एक उद्यमी युवा महिला नें कुछ नया करने की चाह में अलग अलग साईज़ में गुडीयों की निर्मिती की , जिसके कारण मुंबई जैसे शहर में जगह और समय के अभाव में ये परिकल्पना या कंसेप्ट लोगोंने हाथो हाथ उठाया और उस महिला का नाम काफ़ी मशहूर भी हुआ. संयोग से वह महिला, मेरे पत्नी डॊ, नेहा की सगी मौसेरी बहन ज्योति थी. और थी इसलिये कि दुर्भाग्य से पिछले साल युवावस्था में कॆन्सर से उसका निधन हो गया.

हमारे यहां आज श्रीखंड बनता है, मगर हमें सुबह सुबह परंपरा के अनुसार कडवे नीम की कोमल पत्तीयों की चटणी भी खानी पडती है, जिसे हम छुटपन में बडे मुंह बनाकर,रोते कलपते खाते थे( कभी कभी नज़र बचाकर थूकने का भी प्रयत्न करते थे, मगर एक बार पकडे जाने पर दादाजी की मार पडी थी)

आज हम बडे हो गये हैं(ऐसा हमें लगता है),नही खायेंगे तो कोई टोकने वाला नही है, पिताजी के अलावा. उन्होने पूरे जीवन में हम पर कभी हाथ नही उठाया, तो अपने पोतों को क्या मारेंगे. ये पीढी के सरकने का एक संकेत है.
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