Tuesday, December 9, 2008

मौन... एक श्रद्धांजली..

जी हां, मैं फ़िर आ गया हूं, अनुपस्थिती के लिये तहेदिल से माफ़ी मांगते हुए..

फ़िर लिखूंगा, मगर अभी बस यही... मौन....दो मिनट का मौन....


एक श्रद्धांजली..

Sunday, November 30, 2008

शहीदों के नामों को भुनाने का घिघौना खेल ,रियलिटी शो ...


आज मैं मुम्बई में हूं.
कल ही पुणें आना पडा़, नुपूर के चेक अप की अर्जेंसी थी, फ़िर मेरे इजिप्ट प्रोजेक्ट के लिये मीटींग थी मुंबई में.

खुशी की बात है, कि ऒपरशन ताज़ खतम हुआ, और अब सब ठीक है.

सब ठीक है???

माया नगरी मुंबई की फ़िज़ां में एक अजीब सा सन्नाटा है, साउथ मुम्बई में तो इक्के दुक्के ही लोग दिख रहे है. लोगों के मन में भय है, कि वहां तो सब ठीक हो गया है, मगर वे शैतान तो यहीं कहीं मानव समुद्र में मिल गये है,एक नये शिकारी अभियान के पहले की शांति तो नही? CST Station पर फिर से फ़ायरिंग होने की अफ़वाह भी सनसनी फ़ैला गयी.

दर्द की इन्तेहां हो गई है, मन में निराशा, मगर जो बच गये उनकी सलामती पर थोडी़ राहत ज़रूर.

मेरे प्रोजेक्ट पर , मेरी बिझनेस कम्युनिटी भी सकते में हैं. ऒफ़िसों में भी उपस्थिती हलकी थी, बडे़ अफ़सर आये थे, स्टाफ़ अभी भी भय में सिमटा हुआ है.

एक बात और, सभी जगह शहीदों के फ़ोटो और बॆनर लगे है, राज ठाकरे , शिवसेना, कॊंग्रेस , भाजपा, सभी के . शहीदों के नामों को भुनाने का घिघौना खेल ,रियलिटी शो ...

एक SMS मिला मुझे - राज ठाकरे कहां है? उन्हे बताओ कि दिल्ली से आये NSG के २०० कमांडों में कोई महाराष्ट्रीयन नही है.. (Mid Day में भी दोपहर को छपा है)

Point is well taken, as far as Raj Thakre is concerned.

मगर यह SMS कहीं नही है, जो मेरे आहत मन में उभरा - एक महाराष्ट्रीयन मन में-

सबसे प्रमुख शहीद टीम जिन्हे मुंबई की पुलिस में और जनता में बहुत ही आदर और निष्ठा से देखा जाता रहा है वे तीनों मराठी माणूस हैं..

हेमन्त करकरे,अशोक कामटे ,विजय सालसकर...

उन्हे सलाम..

प्रसिद्ध पुलिस अफ़सर और रोमानिया में भारत के पूर्व राजपूत ज्युलियस रेबेरो नें कहीं एक कॊलम में लिखा है, कि ये तीनों अफ़सर पुलिस के उन जांबाज़ अफ़सरों में से थे जो उच्च चरित्र और शौर्य के लिये जाने जाते थे, और रिश्वत मंड़ली से कोसो दूर थे.

बुधवार को करकरे उनके पास आये थे, इस बात से व्यथित हो कर के लालकृष्ण अडवानी नें उनके मालेगांव के हिन्दु आतंक के दृढ और इमानदार सफ़ाया पर प्रष्णचिन्ह लगा दिया था.

ये सुना है कि नरेन्द्र मोदी नें शहीदों के लिये १ करोड देने की पेशकश की है महाराष्ट्र की सरकार को और शहीद करकरे कि पत्नि नें उसे ठुकरा दिया है, (इसी वजह से शायद)

उस अफ़सर नें कर्तव्य पालन में कहीं कमी नही दिखाई, despite the bare fact the his moral was low with such stupid remarks .

ए वतन , हमको तेरी कसम, तेरी राहों में जां तक लुटा जायेंगे..


अब नेताओं का रियलिटी शो..

अमिताभ के लखन अमरसिंग भिया नें करकरे के शहीद नाम पर भी टिप्पणी करते हुए उन्हे खलप्रवृत्ती का इन्सान बताया. साष्टांग प्रणाम, शिखंडी़..

कल शाम जैसे ही कमांडो नें ऒपेरेशन खत्म किया जनाब गोपिनाथ मुंडे नरीमन भवन पहुंच गये.वे वहां क्या कर रहे थे? भैयाजी , जरा थोडे़ पहले पहुंचते तो आतंकवादी आपके डर से आत्म समर्पण कर देते!!

मुझे याद है कई सालों पहले संसद भवन पर आतंकी हमले का मैं चश्मदीद गवाह हूं. बिहार के कई मुस्टंडे़ और बाहुबली सांसदों की डर से घिग्घी बंध गई थी , और वे भाग कर समीप के निर्माणाधीन पुस्तकालय भवन में जहां हमारा काम चल रहा था , कांपते हुए, घिघियाते हुए हम से मिन्नतें कर रहे थे कि सेकंड बेसमेंन्ट में किसी कमरें में उन्हे लॊक कर दें और चाबी फ़ेंक दें, ताकि कोई आतंकवादी उन्हे बंधक ना बना सके.उनमें से दो नें तो अपने पजामे तक गीले कर दिये थे. ऐसे जाबांज़ (?) कर्णधारों को नमन.

(अभी ६ दिसंबर को उस घटना की बरसी पर उस आतंक की दास्तां ,आंखों देखी लिखूंगा)

महाराष्ट्र के सरकार में गृह मंत्री आर आर पाटील से पूछा गया कि क्या ये इंटेलिजेंस टीम का निकम्मापन नही है, तो तिलमिलाकर बडे़ मियां कहते है-

बडे़ बडे़ शहरों में तो ऐसा छोटा हादसा हो ही जाता है.

आदाब, मेरे मुन्ने, क्या मासूमियत है, कि आरती उतारने का जी करता है.

खैर , अब कुछ Comedy of Terrors कल, अगले अंक में, देखते रहिये, पढते रहिये ..ब्रेकिन्ग न्यूज़..

और हां, उन सभी NSG के कमांडो़ , सेना के और पुलिस के जवानों को सलाम जिन्होने अपनी जानें गंवांई, या जान को जोखि़म में डाला सिर्फ़ इस लिये कि -

अब कोइ गुलशन ना उजडे़, अब मुंबई आज़ाद है...

और छपते छपते..

मेरी बिटिया नुपूर के दिल्ली के MBA Course का सहपाठी, जिसकी शादी खड़कपुर में अभी ६ तारीख को होनी थी, खुद तारीख बन गया. CST Station पर होटल से खाना खाकर लौटते हुए वह भी आतंकवादीयों के गोलियों का शिकार हुआ.
ऐसे कई अपनों की पीड़ा का एहसास हुआ जिनके चित्रों पर अब माला चढ गयी है.

Friday, November 28, 2008

ब्रेकिंग न्यूज़..



मुंबई पर आतंकवादी हमला..

ब्रेकिंग न्यूज़..

सभी न्यूज़ चॆनल चीख चीख कर गला फ़ाड़ कर कह रहे हैं...

हैरां है हर भारतीय , दुख में है सारा भारत, मगर चॆनल वालों का तमाशा जारी है.

चॆनल वालों ने बहुत बडे़ ब्रेकिंग न्युज़ का खुलासा किया है, - ये एक आतंकवादी हमला है...(वाह,जैसे कोई अभी तक हम तो सोच रहे थे कि ये सब मस्ती हो रही है)

रुकिये जाईये नही--- ब्रेक के बाद हम फ़िर आते है- तब तक आप देखिये बंदर की चड्डी बनियान की ऐड्वर्टाईज़मेंट.और भी - चोकोलेट,कॊंग्रेस भाजपा को वोट दो,सेनिटरी नेपकिन, आदि.

ये हमला अमेरिका के ९/११ के हमले के समकक्ष भारत के लिये माना जा रहा है. मगर उन दिनों CNN ने कमर्शियल ब्रेक लिये बगैर घटना दिखाई थी वहां, और आप हम यहां दो दो हमले झेल रहे है-

एक फ़िदाईन आतंकवादियों का, और दूसरा इन चॆनल वालों का आतंकवाद.

खैर, ईश्वर और अल्लाह उन सभी की आत्माओं को शांती प्रदान करे जिन्होने इस पगलायी नयी पीढी के कुछ नौजवानों द्वारा अपने प्राण गवांयें, और वे शहीद जिन्होंनें अपने प्राणों की आहुती दी, ताकि हम अमन से रह सके.

Tuesday, November 18, 2008

नूपुर के दिल से

दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन...
गुलज़ार साहब क्या खूब फ़रमा गये है. इन दिनों व्यस्तता का ये आलम रहा कि ब्लोग से दूर रहना पडा़, तो हर पल हर घडी़ सामने वो रंगीन खाका गुलज़ार होता रहा, और हम तरसते रह गये आपसे बतियाने को, हाले दिल सुनाने को.

हमारी बिटिया नूपुर जो अभी पूना में है, उसे किसी वजह से अस्पताल में भरती होना पडा़ और जब उसे लेकर इन्दौर आये तो हम फिर से जमींदोस्त हो गये, याने शुद्ध हिन्दी में गिर पडे और बडी़ हिन्दी हो गयी हमारी. ( पता नही क्या सोच कर ये कहावत हमारे यहां बोलने का चलन हो गया है, या शायद भोपाल से इम्पोर्ट हुई है खां.एस्ये केस्ये केने लग गये मियां के बिलावजा पिनपिनाने लग गयी ज़बान)

चलो स्वास्थ्य लाभ कर रहा हूं. बडी मज़ेदार व्यवस्था हो गयी है. बिटिया जो चल फ़िर नहीं सकती, मेरी पोस्ट अभी लिख रही है.और मैं चल फिर सकता हूं मगर लिख नही सकता क्योंकि हाथ के पंजे के बल ज़ख्म खाया गया है,

लोग काटों से बच के चलते है,
और हमने फ़ूलों से ज़ख्म खाये है.


तो लिखवा रहा हूं.ब्लोग की दुनिया का नया प्रयोग शायद!!!(अमिताभ को छोड़ कर)

कोइ बात नही , रात बाकी , बात बाकी... अगली बार.....
courtsey Noopur.

सलाम मेरा, नूपुर के दिल से. पापा ठीक हो जाने तक वो वेदव्यास और मैं उनकी गणपति.( I also share same sense of humour as my papa does!!!)

मेरा दिल बडा़ ही खुश हो रहा है आज, क्योंकि मेरे भारत के चंद्र यान नें अपनी तस्वीरें भेजना शुरु किया है..

गर्व से कहो हम भारतीय हैं!!!!



चुनावी महौल् है, और् सांपनाथ् और नागनाथ अखाडे़ में हैं. दोनों की कमीज़् सफ़ेद नहीं और कीचड़ उछालने की प्रक्रिया चल रही है. ये कारटून् देखें जो हमारे यहां के दैनिक नई दुनिया से साभार् लिया है.

























एक और कारटून जो सत्य वस्तुस्थिती बयां करती है. (नई दुनिया से साभार)


दस्विदानिया...

Monday, November 10, 2008

सत्यजित रे- फ़िल्म सिक्किम


"सिक्किम"

यह नाम है उस फ़िल्म का जो महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित रे नें बनाई थी, मगर किसी कारणवश उसे थियेटर नसीब नहीं हुआ था.अमूमन अधिकतर लोग यह नहीं जानते कि उन्होने ऐसे नाम से कोई फ़िल्म बनाई भी थी.

आज यह नाम सामने आया है तो इस वजह से कि १० से १७ नवम्बर तक कोलकाता फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इस फ़िल्म को दिखाया जायेगा, और सत्यजित रे के कई चाहने वाले इस फ़िल्म का इन्तज़ार ही कर रहे थे.

बात ही कुछ ऐसी थी.

दरसल इस फ़िल्म का निर्माण किया था सिक्किम के राजा और रानी नें और सन १९७५ में इसे भारतीय सेंसर बोर्ड नें भी मान्यता दी थी. मगर दुर्भाग्यवश ,इस फ़िल्म की सभी प्रिंट्स नष्ट हो गयी थी.

लेकिन सौभाग्य से अभी अभी ब्रिटीश फ़िल्म एकादमी के पुरातत्व विभाग में संयोगवश एक प्रिंट मिल गई तो यह अनमो्ल खजाना हम तक पहुंच पाया.रे नाम का इतना जबरदस्त प्रभाव है, कि यु एस एकेडमी ओफ़ मोशन पिक्चर्स ने इस फ़िल्म को डिजिटल स्वरूप दिया है.


इस फ़िल्म के साथ रे की अन्य फ़िल्में - पारोश पाथर, तीन कन्या, जोय बाबा फ़ेलुनाथ टु , और अपराजितो को भी प्रदर्शित किया जायेगा.




सत्यजित रे अपने मृत्यु के कुछ दिन पहले, एकेडमी अवार्ड के साथ..

Tuesday, October 28, 2008

दिवाली पर शुभकामनायें

आप सब देशवासियों और मेरे ब्लॊग के अंतरंग मित्रों,


आप सभी को इस दिवाली पर सुख और समृद्धि के साथ हार्दिक शुभकामनायें...

सुख दिल के गहराई में , अंतर्मन में स्थाई रूप से वास करे...

समृद्धि मानस के विचारों की, बुद्धि और विवेक के वस्तुनिष्ठ एवं उपयुक्त उपयोग के समझ की....

सर्वेSत्र सुखिन: सन्तु ,
सर्वे सन्तु निरामय ,
सर्वे भद्राणे पश्यन्तु,
मा कश्चिद् दु:खमाप्नुयात् ...


और साथ ही भौतिक स्वरूप के सुख और समृद्धि की भी आप के और आपके परिवार में कभी कमी नहीं आये, ये जगत पिता ईश्वर से तहे दिल से प्रार्थना...




आप इसी तरह यहां इस ब्लोग पर आकर अपने विचारों से इसे और समृद्ध बनायें , और समाज में व्याप्त घृणा और असंतोष के इस संवेदनशील वातावरण में सच्चे और शांतिमय सुझावों और साझा मानसिकता की कड़ी बनाकर सभी सभ्य और असभ्य जनों को सुखी बनायें ,यही कामना..

सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते,
घनांधकारेश्विव दीपदर्शनम्...


(मृच्छकटिकम् - शूद्रक)

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है,
उसी प्रकार दुख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है.


आमीन..

Tuesday, October 21, 2008

Raj Thakare राज ठाकरे की गुंडागिर्दी-यूपी,बिहार की लठैत संस्कृति - आंखों देखी..

काफ़ी दिनों बाद आपसे मुखा़तिब हूं. इस बार ज़रा बाहर था, मुम्बई तक काम के सिलसिले में गया था. आपबीती आपके नज़र कर रहा हूँ .

सीन -१ ( मुम्बई )
















सुबह मुम्बई सेंट्रल पहुंच कर मैने जब टॆक्सी वाले को कहा की दादर जाना है, तो उसने दादर का पता पूंछा.मैने कहा - शिवसेना भवन के पास,(मेरा होटल वहीं है), तो वह चौंका और जाने के लिये मना करने लगा. आपनें तो सुना, पढा़ ही होगा, कि श्रीमान राज ठाकरे को कल रात ही गिरफ़्तार किया गया था. मुझे पता नहीं था. वह ही नही, कोई भी टॆक्सी वाला वहां जाने के लिये तैय्यार नहीं हुआ.पता यह भी चला कि रात में राज ठाकरे के गुण्डों ने उत्तर भारतीय चालकों की टॆक्सीयां के कांच भी फ़ोडे थे.कहीं कोई मारपीट भी हुई थी .

मैं परेशान सा सोचने लगा कि क्या किया जाये, तो एक हिम्मतवाला ड्राईवर होटल से थोडा पहले छोडने को राज़ी हुआ. किस्मत से होटल के पास कोई गतिविधि नही देख कर टॆक्सी को घुमा कर होटल छोडने को जब मेरी गाडी मुडी ही थी, कि अचानक गली में से कुछ युवकों का हुजूम निकला, और वे नारेबाज़ी करते हुए मेरी टॆक्सी की ओर बढे. मैं समझ गया की ये वही उपद्रवी हैं जिनके बारे में अब तक कहा गया है.बहस करना व्यर्थ था, फ़िर भी साहस जुटा कर मैं टेक्सी से बाहर आकर उनसे मराठी में बातें कर उनका ध्यान बांटने का यत्न कराने लगा. लेकिन उससे पहले ही हमारी गाडी के विंडस्क्रीन को तोड़ वे आगे बढ़ने लगे. कुछ कांच के तुकडे मुझे भी लगे. टेक्सी वाले के प्रति अपराध बोध से मन ही मन लढते हुए मैं अनायास ही उन लड़कों से प्रतिक्रिया स्वरुप पूछ बैठा- तुम सब ये क्यों कर रहे हो? उसमें से एक लडके ने मुड़ कर बड़ी ही तल्खी से कहा- राज साहब को पकड लिया है. इस सरकार को कब अक्ल आयेगी ? मेरे मुंह पे शब्द आए थे - राज ठाकरे को कब अक्ल आयेगी ?

मगर तब तक मुझे अक्ल आ गयी थी की चुप रहने में ही भलाई है, मेरी. उनका क्या? उनमें राज ठाकरे के दो तीन ही आदमी होंगे, बाकी सब तो भीड़ थी. बिना शख्सि़यत के, बिना चहरे के. व्यवस्था के प्रति , समाज के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति के अवसर को भुनाते हुए भेड़ों की भीड़. मैं सकते में पड़े हुए टेक्सी वाले को पीटने से बचा नहीं पाया, और आत्मरक्षा के लिए, आत्मसन्मान की बली चढाते हुए,सामान छोड़ होटल भागने की तैय्यारी में लग गया. सामान कुछ ज़्यादा नहीं था. पिटते हुए उस टेक्सी वाले ने चिल्ला कर कहा - भैयाजी , आपका सामान?

एक आम भारतीय की तरह , मैं स्वार्थ के लबादे को ओढ़ भागने का मन बना रहा था, और वो टेक्सी चालक मेरे ही सामान के लिए फिक्रमंद हुआ जा रहा था. मैंने शर्मिन्दा हो उस भीड़ से उस गरीब को छोड़ने की मराठी में याचना की, जो भाग्य से सफल हुई, क्योंकि तब उस भीड़ को एक बस दिख गयी थी. वो हुजूम पुरुषार्थ की एक और आजमाईश करने आगे निकल गया. मैं शर्मसार हो टेक्सी वाले को ५०० का नोट दे ,सामान ले होटल की दिशा में अग्रसर हुआ.

चित्र - १

जहाँ मेरा प्रोजेक्ट चल रहा है वहाँ भी कंपनी की बसों की तोड़फोड़ का चित्र !!









चित्र - २

शाम को होटल के पास ही लगे शिवसेना भवन के सामने का दृश्य - शिवाजी पार्क के समीप इस सड़क पर इस समय आम दिनों में भीड़ ही भीड़ रहती है. कार, बसें ऑफिस से लौटते हुए लोगों की भीड़. मगर आज , यहाँ अघोषित कर्फ्यू जैसा हे कुछ माहौल है.आम आदमी के मन में डर का यह सजीव चित्रण है.





















सीन -२ ( पुणें )

चूंकि उस दिन कुछ भी काम नहीं हो पाया , तो मैं अपने पुणें के प्रोजेक्ट के लिये निकल पडा़. पुणें में मेरे बहन के देवर रहते हैं, और उनके आग्रह पर मैं रात उनके यहाँ ही ठहर गया. वे जन्म से ही पुणें के रहवासी है, और वहाँ के साँस्कृतिक परिवेश के एक जागरुक प्रहरी भी.

देर रात जब राज ठाकरे की बात चल पडी , तो मैनें अपने साथ हुए हादसे की बात निकालकर मेरे मेज़बान से कहा कि इन जैसी घटनाओं से मराठी संस्कृति की एक अलग चाबी जन मानस में बन रही है, जो वस्तुस्थिति से बहुत ही भिन्न है. इससे, एक और आशंका के अंदेशे से इनकार नही किया जा सकेगा कि कुछ इन तरह का बैकलैश गैर मराठी प्रान्तों में भी पनप सकता है. मायावती का बयान इन भय को और मज़बूत करता है, और भारत के अनेकता में एकता के सांकृतिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करता है.

तो मेरे मेज़बान नें गंभीर हो कर मुझसे प्रतिप्रश्न किया- किस संस्कृति कि हम बातें कर रहे हैं जनाब? ज़रा ठहरिये , कह कर उन्होंने अपने सामने वाले फ़्लॅट से एक षोडसी युवती को बुलाया. मैं चौंक गया. पिछली बार जब मैं उससे मिला था तो वह एक चुलबुली सी, उन्मुक्त नदी सी लड़की थी, मगर आज उसके चेहरे पर भय की छाया के साथ साथ निराशाजनक उदासी का वास था. एकदम बुझी बुझी सी, ठहरी हुई आँखें एक अलग ही वेदना लिए हुए थी. आगे जो कड़वी सच्चाई सामने आयी तो मेरे तो होंश ही उड़ गए.

उनके बिल्डिंग में कुछ ही महीने पहले तीन फ़्लॅट में बिहार के कुछ विद्यार्थी आकर रहने लगे थे. वे वहाँ कोई अच्छा सा कोर्स कर रहे थे. आम तौर पर पुणें में , या महाराष्ट्र में अमूमन लड़कीयों के साथ युवकों का व्यवहार अच्छा ही रहता है. छेड़छाड़ आदि हरकतें कोलेज या स्कूल के स्तर पर भी कहीं कहीं दिख जाता है, मगर आम सड़क पर या गली मोहल्ले में एक परिवार सा मेलजोल होने से शाम या देर रात तक लड़कियां बिना रोक टोक या परेशानी से घिमाती हुई नज़र आ जायेंगी.

















मगर जब से ये बिहार युवक वहाँ आए, उन्होंने अपने ही परिसर में उद्दंड और ऊशृन्खल व्यवहार से लड़कीयों और महिलाओं का गुज़रना ही दूभर कर दिया. इन निरीह सी लड़की के तो जैसे पीछे ही पड़ गये थे वे लोग. करीब ६ महीने से वे उसे जो परेशान कर रहे थे, फब्तियां कस कर अश्लील से हावभाव कर उसे लज्जित कर रहे थे कि उस लड़की का तो मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया. और तो और , उनको समझाने या डाटनें वालों को भी गाली गलौज से सामना कर प्रताडित होना पडा. अब आलम यह है कि वहाँ खौफ के से माहौल में वहाँ के मूल रहवासी रह रहे हैं और अन्दर ही अन्दर यूपी या बिहार के लठैत संस्कृति के प्रति विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं.ये एक Isolated Case नहीं है, ऐसी घटनाएँ अब मुम्बई पुणें , और अन्यत्र कहीं भी मिल जायेंगी.

मैं तो ठगा सा ही रह गया......

ये किस भारत वर्ष की हम बात कर रहें है. पहले किसे दोष दिया जाए? यूपी,बिहार के लठैत संस्कृति के भारतीयकरण को, या इस असंतोष के वातावरण का राजनैतिक फायदा उठाने वाली राज ठाकरे की मानसिकता को? पहले अंडा या मुर्गी?

राज ठाकरे से ये कहने का एक मन करता है, कि भाई, तू तो यहाँ नया खिलाड़ी है. तेरी बराबरी कहीं लालू यादव, मुलायम सिंग यादव या मायावती की गुन्डागिर्दी से भला हो सकती है? अराजकता का इतने सालों का अनुभव इन सब का तगडा है, राज (ठाकरे) की अराजकता अभी शैशव काल में ही है.

दूसरा अंतरमन पूछता है कि अहिंसा के थ्योरी का प्रादुर्भाव बिहार से ही शुरू हुआ है ये कितनी विरोधाभासी बात है ? हमने खुद को कितने हिस्सों में बांट दिया है.धर्म, प्रांत ,जाति, अमीर गरीब, भाषा ... अखंड भारत कहां है?

आप क्या कहते है? कौन तगडा है? कौन सही और कौन ग़लत ? ये ही सिर्फ़ दो विकल्प बच गये हैं?

आम आदमी और राष्ट्रीयवाद के अमन के कबूतर के लिए कोई ठिकाना और है?

जायें तो जायें कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां...

एक और खबर छपते छपते...
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