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Friday, August 22, 2008

मानस के अमोघ शब्द

अपने एक नये ब्लोग के बारे में थोडी चर्चा..

कुछ सालों पहले जब इस दुनिया में आया था तो जिंदगी के सफ़र के दौरान पाया की अपन तो श्री ४२० के राज कपूर जैसे निकल पडे थे खुल्ली सडक पे अपना सीना ताने,यह मिशन लिये की किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वासते हो तेरे दिल में प्यार,क्योंकि जीना इसीका नाम है..

मगर पाया कि सब कुछ सीखा हमनें ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों, हम है अनाडी..बस चलते रहे सुनसान डगर और अनजान नगर में, यह कहते हुए कि आवारा हूं..

मगर क्या करें? दि़ये और तूफ़ान की कहानी की मानींद, दि़या तो अपनी धुन मे मगन ,आस्था के तिनके पर सवार ,मन के और समाज के अंधकार को मिटाने फ़ड्फ़डाता रहा..

मगर वह तो अपनी कहानी है.ज़माने नें कुछ ऐतबार किया , कुछ ना ऐतबार किया. हकीकत से रूबरू हो , बेआबरू हो, ग़ैरते मेहफ़िल से भी बेखबर ,कभी बाखबर चलते रहे. इंसानीयत से बडी शिद्दत से, नेक नीयत से ,भूले से मोहोब्बत कर बैठा यह दिल,नादां था बेचारा .. दिल ही तो है..

अब हम आपकी मेह्फ़िल में शिरकत कर रहें है, तो सोचा क्यों ना हम अपने फ़लसफ़े को भी आप के साथ शेयर करें, वह जो हमने इस जहां से पाया, तिनका तिनका जोड कर..

तो एक और ब्लोग बनाया है” मानस के अमोघ शब्द ’. मानस के याने मन के गहरे पैठ जा कर मेह्सूस की गयी बातें अमोघ याने अचूक शब्दों में ..

यहां पर कोशिश रहेगी कि कुछ ऐसा लिखा जा सके,जो संगीत के अलावा हो, जिस पर जीवन में सीखे मॆनेजमेंट के फ़ंडे, कुछ तकनीकी बातें, कुछ कलात्मक चित्र, कुछ सिंदबादी किस्से,और बहुत कुछ. दिलीप के दिल से पर संगीत की बातें तो चलती रहेंगी ही, जहां हर चीज़ ज़रा शऊर और तेह्ज़ीब के दायरे में रहेंगी. कभी कभी अपने दिल की आवाज़ भी सुनायेंगे .इसका मतलब यह नही की मानस के अमोघ शब्द पर कुछ ठिलवायी होगी. कहने का मतलब है, जो मन नें पाया वही लौटाने का जतन है ये, आ अब लौट चलें..

और हां, यहां लिखे हर वाक्य में एक बात जो लगभग हर जगह प्रतिध्वनित हो रही है है, वह है मुकेश की आवाज़ .जी हां, मुकेशचंद्र माथुर ... जिनकी पुण्यतिथी आज है. तो उन्हे भी याद करें , बडी शिद्दत से, बडे सूकूं से, बडी नज़ाकत से, जैसा की मुकेश जी के गानों का आलम होता था.

उन पर कोइ गीत लगाना क्या ज़रूरी है?

आप खुद ही गा लिजिये ना..हो जायेगी उनकी याद दिल से.

हर आम व्यक्ति को यह दिली सूकूं है की वह मुकेश के किसी ना किसी गीत को अपनी ज़िंदगी में कहीं ना कहीं अपने उपर भुगता हुआ, भोगा हुआ पाता है. दर्द भरे पलों की याद या खुले मन से बेबाक प्रेम अभिव्यक्ति करते हुए.जिसके होटों पे सचाई रहती है, दिल में सफ़ाई रहती है.जो कभी गर्दिश में रहा, तो कभी आसमान का तारा .

तभी मुकेश जी नें हमेशा कहा की - कोइ जब तुम्हारा हृदय तोड दे , तडपता हुआ जब कोइ छोड दे, तब तुम मेरे पास आना- मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा , आप जैसे दर्दीले गीत को सुनने वालों के लिये.

और जिसने यह सब नही मेहसूस किया है, उसकी चिन्ता मैं और आप व्यर्थ में क्यों करें? आप ने यहां तक मेरा साथ दिया है , इतने दूर यह पढने चले आये है,मेरे दिल से निकले कुछ अमोघ बोल सुनने, तभी , क्योंकी आप भी तो मेरे जैसे है> अपनी धुन में रहता हूं,मैं भी तेरे जैसा हूं...यह जो सब लिखा गया है, क्या सिर्फ़ मेरे बारे में है? नही दादा, यह सब आप के मानस कि तो अभिव्यक्ती है.

तो आयें , मिल कर गा उठे -

जीना यहां , मरना यहां इसके सिवा जाना कहां ?
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