Thursday, September 30, 2010

मंदिर या मस्ज़िद बनाम देश की तरक्की?....

आदाब अर्ज़ है.

आज छः महिने के बाद इस ब्लोग पर रू ब रू हो रहा हूं.

पिछले दिनों कैरो मे था और आज ही अपने वतन लौटा हूं. वतन लौटने की खुशी के साथ एक मसला और दरपेश आया तब से जब मुंबई में विमान उतरा.आज आज़ादी के बाद का सबसे अहम मुद्दे पर सारे देश में भय, संदेह और घबराहट का वातावरण था.बाबरी ढांचा और रामलल्ला की भूमी से संभंधित जितने भी मसाईलें थे, वे मिसाईल बन कर आम भारतीय के दिलो दिमाग में सुनामी बन के कहर बरपा रहा था.

एयरपोर्ट की सिक्युरिटी से लेकर, सडकों पर पुलिस की जगह जगह मौजूदगी का दृष्य़ मुंबई और इंदौर दोनो जगह था.साडे तीन बजे से सडकें सुनसान हो गयी.किसी अनजान घटना की आशंका नें पूरे मुल्क के सभी नागरिकों को अपने गिरफ़्त में ले लिया था.

जब कल कैरो से रात को निकला था तो मेरे साईट का मुख्य इंजिनीयर वायेल मुझ से पूछ बैठा कि ये क्या बेवकूफ़ी है? क्या आपके यहां हिंदू और मुसलमानों के सामने क्या अब यही इश्य़ु रह गया है?क्या धर्म बडा है या देश? उससे फ़िर एक बडी बेहस सी चल पडी और उसनें मुस्लिम आतंकवाद पर एक अच्छा खासा लेक्चर दे दिया जिसे मैं अलग से दो तीन दिन में आप से शेयर करूंगा.

चलो , अब जब Cat is Out of Bag, मैं सोचता हूं बीच का जो फ़ैसला हुआ है, वह किसी एकतरफ़ा फ़ैसले से तो बेहतर ही है. चलो कहीं बहस या सिलसिलेवार वार्ता की गुंजाईश तो रहेगी. अभी आप मेडिया के हर न्युज़ चेनल को देखने जायेंगे तो पायेंगे की हर जगह राजनीतिक और धार्मिक नेताओं में शाब्दिक फ़्री स्टाईल कुश्तीयां हो रहीं हैं, और एंकर उन्हे ऐसे लढा रहे हैं जैसे मुर्गों की लढाई हो.



मेरा १० वर्ष का बेटा अमोघ भी काफ़ी चिंतित था. फ़ैसले से पहले उसने कह दिया कि पापा, हमारे देश में पहले से ही इतने मंदिर हैं ,मस्ज़िद हैं, अगर एक नही बनेगा तो क्या हो जायेगा? मैं चौंक पडा,कि क्या यह सोच नयी पीढी के सभी बच्चों की होगी- क्या हिंदु क्या मुसलमान?

इसलिये मैं तो अब यही मानता हूं कि दोनॊं पक्ष सुप्रीम कोर्ट में जायें. वहां वकीलों की जूतमपैजार २० साल तक चलती रहे, ताकि हम अपने देश के निर्माण में अब और ज़्यादा समय इन बातों में व्यर्थ ना करें.और २० साल के बाद पूरी एक पीढी बदल चुकी होगी. शायद उसे इस मुद्दे में निसंदेह कोई दिलचस्पी नही होगी.धर्म नितांत निजी मामला रहेगा और इन्शा अल्लाह भारत इस पूरे जगत में एक बेहद ही ऊंचा स्थान प्राप्त कर चुका होगा....

आमीन....

मैं तो जनाब मेंहंदी हसन खां साहब की यह मौजूं गज़ल सुनने जा रहा हूं..(मेरे देश के लिये)

खुदा करे के मुहब्बत में ये मकाम आये,
किसी का नाम लूं लब पे तुम्हारा नाम आये.....

अभे चलते चलते एक और कार्टून (लहरी) आया है, मेरे अनुज मित्र संजय पटेल की ओर से>>>>

Monday, March 29, 2010

मौत लपेटी हुई कविता....हिस्सा हिलाल -एक साहसी कवियत्री.


महिलाओं की स्थिती पर हम सभी बातें कर रहे थे, और मेरी पिछली पोस्ट पर मैने कुछ लिखा भी था, कुछ एकेडेमिक ,कुछ व्यक्तिगत. साथ में ही एक और परिचित महिला की हम बातें करने जा रहे थे.

मगर अभी रविवार को मैने कहीं कुछ पढा और साथ ही नेट पर जाकर कुछ और जानकारी ली और एक साहसी महिला की कहानी सामने आई, जिसका नाम है हिस्सा हिलाल.

हिस्सा हिलाल अमीरात में रहने वाली एक कवियत्री है, जिसनें अभी अभी पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात में अबु धाबी में चल रहे एक रियलिटी शो " Poets of Millions " में भाग लिया और अपने कविता की साहसी, बोल्ड एवम निर्भय अभिव्यक्ति से ना केवल सेमी फ़ाईनल में जगह बनाई, बल्कि दुनिया की लाखों महिलाओं और पुरुषों को पूरा झंझोडा़ , और नेट्दुनिया में एक तहलका ही मचा दिया.

अमेरिकन आईडल की तर्ज़ पर होने वाले इस रेयलिटी शो में संगीत या गानें की जगह अरबी, बदायुनी जीवनशैली, इतिहास,और संस्कृती पर आधारित काव्य पठन होता है.जिस तरह अमेरिका में रॊक स्टार को जैसी लोकप्रियता मिलती है, वैसी ही अरब दुनिया में कवि या शायरों को मिलती है.

इस स्पर्धा में ये नियम है कि हर शायर को अपनी लिखी हुई शायरी ही पेश करनी होगी.प्रतिभागी का आवाज़, शायरी पेश करने का मुख्तलिफ़ अंदाज़, और अश’आर की अदबी गहराई इस पर मार्क्स मिलते हैं.

इसी प्रतियोगिता के सेमी फ़ाईनल्स में एक महिला को स्टेज पर बुलाया गया, जिसनें सर से पैर तक काला नकाब पेहन रखा था.उसके ढके हुए चेहरे पर नकाब की झिरी से दो शक्तिशाली आंखे ही दिख रही थी, और उसका स्पष्ट , निडर और गरजता आवाज़ जब कविता पाठ करने लगा तो वहां उपस्थित दर्शकों की सैकडों आंखें आश्चर्य और विस्मयता से फ़टी की फ़टी रह गयी.सिर से पैर तक काले कपडे में ढकी हुई इस महिला नें बुर्के की ओट से कठोर प्रतिबंध और फ़तवे लगाने वाली मुल्ला मौलवीयों के कपडे उतारना जो शुरु किये,उससे सारे यू ए ई और संसार में ये संदेश गया कि अरब देश की एक महिला मुस्लिम कवियत्री मौत से बिना डरे अपने शब्दों का हथियार लिये एक जेहाद का प्रण ले लिया है, या यूं कहें , विद्रोह का बिगुल बजा दिया है.

जैसे जैसे उसके पैने शब्द धर्म सत्ता के मद में अंधे ठेकेदारों ,तुगलकी फ़तवे ज़ारी करने वालों,आम आदमी का धर्म के नाम पर अत्याचार करने वालों के लिये कविता की नर्म नाज़ूक और मखमली पैरहन लिये माध्यम से दुनिया में पहुंचे तो अधिकतर महिलाओं का उसे साथ मिला,जैसे उनके मन की भावनाओं की ही वह अभिव्यक्ति थी.

ज़रा देखें -


फ़तवों की आंखों में दिखता है मुझे सैतान,

जो अनुमति को बदल देता है प्रतिबंध में,

एक हैवान, जो सत्य के चेहरे से बुर्का फ़ाडकर अंधेरे में छुप जाता है,

ज़हरीली ,धहकती आवाज़ लिये, क्रूर और अंधा,

कमरबंद से कपडे को पकडने जैसा उसने मृत्यु का परिधान पहन रहा था.....

ये मौत के पैरहन लिये आवाज़ याने आत्मघाती आतंकवादी.


मगर साथ ही कट्टर, धर्मांध व्यक्तियों को ये बात रास नहीं आयी. कई वेबसाईट्स पर हिस्सा को मार डालने की भी धमकीयां दी गयी.मगर हिस्सा नहीं डगमगाई. उसने कहा- मेरी कविता हमेशा ही रही है. धर्म और संस्कृति के नाम पर अनगिनत अरब महिलाओं की आवाज़ दबाने वाली मानसिकता के विरोध में ये मेरी छोटी सी कोशिश है.

कहने की ज़रूरत नहीं कि कि उस शो में निर्णायकों नें हिस्सा के जलते हुए शब्दों और मिले हुए उत्साहपूर्ण प्रतिसाद को देखते हुए उसे फ़ाईनल में पहुंचा दिया है.

फ़ाईनल ३१ मार्च को याने कल होगा. देखते हैं कल क्या होगा? शायद अल्पना जी यू ए ई से हमें इस शो का आंखो देखा हाल सुनवायेंगी, १ अप्रिल को!!

ये विडियो देखें,


Monday, March 8, 2010

Women Access To Education- अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष पर ....


आज अंतराष्ट्रिय महिला दिवस है - ८ मार्च २०१०.

मेरे लिये ये एक खास दिन यूं है, कि दुनिया की आधी आबादी को समर्पित है यह दिन, और मेरा जो भी कुछ वजूद है आज , वह मेरी मां की वजह से है, और मैं इस बात को आज गर्व के साथ महसूस करता हूं, कि पिछले हज़ारों वर्ष से हम अपनी संस्कृति, हमारे मूल्यों और सभ्यता को इतना विकसित पा रहे हैं, वह केवल महिलाओं की वजह से है.

दुनिया की हर मां एक शिक्षिका है, भले ही वह शिक्षित हो या अनपढ़.

लेकिन यह बडा ही दुख का विषय है की आज पूरे विश्व भर में शिक्षा के अनुपात में महिलायें, पुरुषों से पिछडी हुई है. भारत में मात्र ६५% महिलायें शिक्षित हैं,(पुरुष ८०%).

अभी पिछले हफ़्ते, कॊलेज से मेरी पत्नी नेहा का फोन आया कि उसे Indian Institute of Management (IIM, Indore) से आज के दिन महिलाओं की शिक्षा पर बोलने हेतु आमंत्रण दिया गया है,एक शिक्षाविद के तौर पर, तो मैंने तुरंत उसे स्वीकार करने को कहा, हालांकि हमारे बेटे अमोघ की वार्षिक परिक्षा आज ही से शुरु होनी थी,और वह थोडा़ चिंतित थी.

तो उसके लिये जब उसने विषय की तह में जाकर जानकारीयां एकत्रित करना शुरु की और मेरे साथ शेयर करना शुरु किया तो मैं हैरान रह गया!

हालांकि नेहा का पेपर अंग्रेज़ी में पढा गया, मैं उसमें से कुछ जानकारीयां आपके साथ शेयर करना चाहूंगा:

Friends, It is proven fact that presently half of this global population is living in a state of disparity in all Socio-Economic Areas, and is lagging far behind men in terms of economic & political power.

As a civilized society, it is certainly our concern today that without their engagement, empowerment and contribution, we can not hope to effectively meet challenges nor achieve rapid economic Progress in this country. Hence, it should be a commitment from all socio- political & Educational fraternity to plan a suitable strategy to bridge this gap of disparity.

The greatest single factor , which can incredibly improve the status of Women in any Society is EDUCATION.

Low level of Literacy at all levels not only has a negative impact on Women’s lives , but also on their families’ lives. This surely affects the Economical Development of Country.

Incidentally, Education would certainly become a powerful instrument of Social, Economical & Cultural Transformation of our people Men & Women. This will also help accelerating process of Modernization, to cultivate high standards of Living, with Moral & Spiritual Values.

So, when Women gain access to education, they increase their chances of participation in Labour Market, improving health & wellbeing of their families. This will ensure increasing financial independence & participating even in Political System.

This can only happen when women have improved access to Education.


(IIM Director स्वागत करते हुए,सबसे दायें पद्मश्री शालिनी ताई मोघे - उम्र ९७ वर्ष और नेहा सबसे बायें)

इस बात को प्रतिपादित करते हुए कुछ जानकारीयों कों (Facts & Figures) रखा गया और फ़िर इस चुनौती को स्वीकार कर अलग अलग स्तर पर सरकार, शैक्षणिक संस्थाओं, NGOs, एवम अन्य माध्यमों की मदत से ये कैसे सम्भव हो सकेगा उसपर सिलसिलेवार प्रकाश डाला. समापन में...


To conclude, I do not wish to paint a total dark picture here. Women have certainly proved their excellence , intelligence, & leadership in all spheres of Life. Today’s women is a SUPERWOMEN in real senses, and currently occupying TOP POSITIONS in all fields.Today women are more aware of their role and contribution in nation Building, and wish to work hard to raise level of Living Standard of herself and family.

However, it is still not enough and hence through this single point agenda for Women empowerment thru Education, we can achieve our goal for better economic health of family & Nation. This will ensure creation of opportunities in High end jobs significantly , sufficiently backed by educated Work Force of women for overall development of India’s Future.


In other words, educating girls is a Most Important Investment in the world, is how much they give back to their families, society and Nation.


नेहा नें इस विचार गोष्ठी का समापन किया गया संस्कृत के इस श्लोक से:

यत्र नार्यस्तु पुज्यते
रमंते तत्र देवता ...


मुझे याद है, कि आज से कई सालों पहले जब नेहा शादी हो कर हमारे घर आयी थी तो वह B.Pharm. में Gold Medalist थी , और Post Graduation और Ph.D. करना चाहती थी. मगर एक पुरुष की टिपीकल मानसिकता लेकर मैने उससे परिवार की ओर समर्पण चाहा था. उसनें चुपचाप मान भी लिया.

आज इतने सालों बाद देखता हूं,कि कैसे मुझे अकल आयी, (देर आयद दुरुस्त आयद), और मेरे बच्चों और मां पिताजी की सेवा करते हुए कैसे उसनें यह सब किया , और आज मुझे एक साथ शर्म और गौरव का अनुभव करा गयी वह.

मगर अब मैं अगली पोस्ट में ज़िक्र करूंगा, एक बहुत ही बडे विरोधाभास की.

मेरे यहां नेहा के कॊलेज जाने की वजह से अमोघ के लिये एक आया रखी हुई है. अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस पर आज सुबह उसके पति की उसे प्रताडित करने के कारण महिला थाने में पेशी हुई थी. कुछ रोशनी उसकी ज़िंदगी पर, और उससे जुडी हुई मेरी एक दीदी की जीवनी पर जिसनें सन १९७५ में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर काठमांडु भेजे गये सबसे पहले भारतीय महिला दल का नेतृत्व किया था.

कल ही पढियेगा दिलीप के दिल से - पर शायर साहिर पर कुछ यादें...

(चित्र रवि वर्मा- साभार)

Monday, March 1, 2010

भारतीय रेल में सुहाना सफ़र -- मेरे सपनों की रानी -डबल डेकर -कब आयेगी तू?

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दो चार दिनों पहले, दो ख़बरें प्रमुखता से छा गयी थी टी व्ही पर,

एक तो सचिन का एक दिवसीय क्रिकेट में विश्व एक दिवसीय क्रिकेट का पहला दोहरा शतक, और दूसरी ममता दीदी का रेल बजेट.

पहले तो सचिन को लाख लाख बधाईयां. वाकई बहुत ही बढियां काम किया है और देश का नाम रोशन किया है. मगर शाम को अधिकांश न्युज़ चेनलें बस सचिन सचिन चिंघाडती रही और रेल बजेट पर बहस कबाडखाना पहुंचा दी गयी.अब तो उन्हे भारत रत्न की भी शिफ़ारिस हो गयी है.

रेल्वे बजट पर कोई खास गहमा गहमी नहीं रही.

वैसे भी उस बजेट में कोई खास बात तो थी नहीं. बंगाल और सिर्फ़ बंगाल छाया रहा. मन मसोस कर रह गया कि , कभी मेरे इंदौर शहर से चुने हुए प्रकाशचंद्र सेठी रेल्वे मंत्री हो गये थे, और मेरे शहर को बच्चों की झुक झुक गाडी भी नसीब नहीं हुई थी. चलो किस्मत अपनी अपनी.

मगर एक बात मेरे दिमाग में कौंध गयी. ममता नें कई बिज़नेस मोडेल्स सामने रखे,मगर कोर बिज़नेस पर खास प्रभावित नहीं किया.

मैं एक फ़्रीक्वेंट ट्रेवेलर हूं,रेल और हवाई जहाज़ का. ये मानता हूं कि रेल विभाग में कुछ अच्छे परिवर्तन हुए ज़रूर है, और काया परिवर्तन भी हुआ है, मगर ये काफ़ी है?

एक बात कहना चाहूंगा कि रेल को सर्व प्रथम ये तो करना ही चाहिये कि हर रेलगाडी के डब्बे ज़रूर बढायें. अभी परसों मैं हैदराबाद से पूना आ रहा था तो गाडी में एक रिटायर्ड रेल्वे अफ़सर था, जिसनें खुलासा किया कि रेल्वे के पास कुल ११०० रेक्स ही हैं, और वे भी काफ़ी नहीं है.जितने बन रहें है,उससे से ज़्यादह की दरकार है, और अब कुछ बाहर से लाने की बात चल रही थी.

डब्बे बढाने में कोई तकनीकी समस्या नहीं है, बस हमारे अधिकतर स्टेशनों के प्लेटफ़ार्म ही छोटे हैं.

एक बात नें और ध्यान खींचा. कलकता से दिल्ली तक डबल डेकर ट्रेन का भी आश्वासन दिया गया है. ये बात तो बढियां ही है. मगर मुंबई से पूना या सोलापुर/कोल्हापुर चलने वाली सीटिंग वाली डबल डेकर जो दस पंद्रह साल से चल रही थी उसके डिज़ाईन को बेहतर काने की काफ़ी गुंजाईश थी.



मगर मैं जब पिछले साल यूरोप गया था तो २० दिन के प्रवास में १५ दिन सिर्फ़ यू रेल में ही घूमा, ८ देश और ३५ शहर. तो मैंने डबल डेकर का भी सफ़र किया और खूब आनंद भी लिया.मिलान में होटल में जगह नहीं मिली, मगर ट्रेन में कभी रिज़र्वेशन की ज़रूरत नहीं पडी.(ये अलग बात है कि रात को ११ बज़े हम मिलान से रोम की ट्रेन में सवार हो गये, सुबह ७ बज़े रोम के प्लेटफ़ार्म नं ७ पर पहुंचे और ७.३० की गाडी में वापिस प्लेटफ़ार्म नं १४ से बैठ कर १ बजे दोपहर को मिलान पहुंचे-ज़रूरी मीटिंग जो थी)





उसके कुछ चित्र लगा रहा हूं. आप देखेंगे, कि रात की गाडी में दो और चार के केबिन थे, जो हालांकि बडे छोटे थे, मगर
हर केबिन में एक छोटा सा कबर्ड और नल के साथ बेसिन होता था.



कोर्रिडोर से मैं घूमते घूमते जब टॊईलेट पहुंचा तो मेरी आंखे फ़टी की फ़टी रह गयी. विकलांगों के लिये बने उस टाइलेट का साईज़ एक चार बर्थ के केबिन से भी बडा था, और उसमें सभी लक्ज़्युरी की सेवायें उपलब्ध थी.




दिन की डबल डेकर जो वेनिस से निकलते हुए पकडी थी उसमें आरामदायक सीटें मिलीं, और Ist Class और IInd Class की सीटों में कोई खास अंतर नहीं था.(मेरे यु रेल पास में प्रथम श्रेणी का टिकट था, तोभी हम कहीं भी बैठ जाते थे!!!)

आश्चर्य तो तब हुआ जब मैंने लोगों को टाइलेट के नल से पानी पीते हुई देखा!!!







वहां के स्टेशनों का क्या कहना. साफ़ सफ़ाई, और दुकानों की सजावट सभी देखते ही बनती थी. अब ये चित्र देखें- ये स्वीडन के एक छोटे स्टेशन पर एक दुकान का है.




तो चलो , हम भी सर पर रज़ाई या चादर ओढकर सो जायें , और ये खुश नज़ारा देखें, मीठा सपना देखें कि भारत में भी कभी वह दिन आये कि हम भी इन जैसी ट्रेनों मे सफ़र करें, कभी भी स्टेशन पहुंच जायें, बर्थ अवेलेबल!! , टी टी को बर्थ के लिये आगे पीछे नहीं करना पडे़,,सभी ट्रेनें ए सी रहें...

आल इज़ वेल यारों!!

होली की सभी को शुभकामनायें.

एक विडियो देखें.यूरोप की तराईयों में दिली सुकून के लिये भटक रहा था, डबल डेकर के लिये. मिली और बाखुदा, खूब मिली!!! घबराईयेगा नहीं. इस बार मैंने गाना नहीं गाया है!!

मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू?

Saturday, February 13, 2010

आल इज़ स्टिल वेल- इजिप्ट में एक्सिडेंट


मुसाफ़िर हूं यारों.. ना घर है ना ठिकाना,
मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना....

जीवन की इस सच्चाई से रूबरू हुआं हूं अभी अभी... जी हां.

पिछले रविवार को अचानक इजिप्ट की राजधानी काइरो या अल-काहिरा जाना पडा, प्रोजेक्ट के सिलसिले में. अब तो आना जाना लगा ही रहेगा, और एक मुसाफ़िर की तरह मैं बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत गाते हुए बंजारे की तरह निकल पडा़.

मगर क्या मालूम था कि किस्मत में कुछ यूं भी लिखा है, कि आप पीछे मुड कर देखें कि जीवन कितना प्रेशियस या कीमती है.सुएज़ शहर से काईरो आते हुए गाडी का ज़बरदस्त एक्सिडेंट हो गया और आपका ये मित्र बच गया. याने बॊटम लाईन यही है कि आल इस स्टिल वेल!!!

हुआ यूं कि इजिप्ट के एक बडे शहर सुएज़ के पास हमारी साईट है, जहां एक फ़ेक्टरी बन रही है, जिसमें मैं वेयरहाऊस इंजीनीरिंग के एक भाग के निर्माण प्रक्रिया के लिये गया हुआ था.सुएज़ शहर सुएज़ केनाल या नहर के लिये विश्व विख्यात है.यहीं से एक मानव निर्मित नहर से बडे बडे जहाज़ रेड समुद्र से मेडिटेरियन समुद्र जाते हैं, और भारत से एक सीधा रास्ता युरोप के लिये खुल जाता है, बजाय साऊथ अफ़्रिका से होकर गुज़रने के.

बात अभी पिछले बुधवार की है.साईट से लौट कर सुएज़ केनाल देखने हम सुएज़ शहर में घुसे, और लौटने लगे काहिरा की ओर, ताकि शाम तक हम काहिरा पहुंच जायें , जहां हम होटल में रुके थे. मेरे साथ कंपनी गेलेक्सी के एक प्रोजेक्ट इंजिनीयर इंचार्ज अविनाश भी थे.

सुएज़ से काहिरा का हाई वे 130 KM का ६ लेन है और इतना बढियां है, कि हर कोई १४०-१६० की स्पीड से गाडी चलाता है.

ज़ाहिर है, शहर छोडते ही ड्राईवह एहमद नें 160 KM/Hr की गति पकड ली, और अगली सीट पर बैठे बैठे मुझे ठंड में भी पसीने छूटने लगे.इसके पहिले पहली बार जब अबु धाबी से दुबई गया था तो 140 की स्पीड अनुभव की थी. मगर सच कहूं, मैंने घबरा कर एहमद से स्पीड कम करने को कहा. उसने थोडी कम ज़रूर की, मगर अचानक सामने एक आर्मी का ट्रक जो जा रहा था उसे कट मारने में चूक हो गयी.पैर ब्रेक की जगह एक्सीलरेटर पर पड गया और हम धडाम से उस ट्रक में घुस गये.

एक ज़ोरदार टक्कर हुई जिससे हमारी गाडी उछल कर ट्रक के पिछवाडे में अटक कर आधा कीलोमीटर घसीटता चला गया. भगवान की कृपा ही समझो, आगे की सीट पर बैठे होने के बावजूद, सीट बेल्ट पहनने की वजह से मुझे उस इम्पॆक्ट का असर कम लगा. मैं उस क्षण से कुछ ही सेकंद पहिले विडियो शूटिंग कर रहा था अपने छोटे केमेरे से, तो थोडा मानसिक रूप से रिफ़्लेक्स की वजह से मैने अपने शरीर को उस आघात के लिये तैयार कर लिया, मगर पीछे बैठे मेरे मित्र अविनाश चूंकि सीट बेल्ट नहीं पहने थे, और थोडा सुस्ता रहे थे, एकदम से अपने आप को सम्हाल नहीं पाये और उन्हे थॊदी ज़्यादह चोट आये. ड्राईवर एहमद के तो पंजे में फ़्रेक्चर हो गया, और सर में चोट आयी.

चूंकि गाडी को ज़्याद क्षति पहुंची और गेट भी जाम हो गये, आर्मी के जवानों ने आनन फ़ानन में हमें गाडी से उठाया. दर्द या शॊक का एहसास भी कुछ मिनीट नही रहा, और जैसे कि हम फ़िल्म देखते हैं , या सपना, मैं अपने आपको और दूसरों को गाडी में से निकालने की मशक्कत को एक त्रयस्थ याने तीसरे शख्स़ की नज़रिये से देख रहा था.

बस , किसी तरह से काहिरा से दूसरी कार मंगवाई, सूरज डूबने चला था.फ़िज़ा में ठंडक और घुलने लगी थी. हम इंदौर से लाये स्वादिष्ट नमकीन खाते हुए, अंदरूनी दर्द के बढते हुए एहसासात लिये हुए काहिरा के एक अस्पताल के लिये रवाना हुए..

संक्षेप में, जिसको राखे सांई, मार सके ना कोई. थोडा़ एक फ़ुट ज़्यादा हो जाता तो कुछ भी हो सकता था. चलो , जान बची ,लाखों पाये. अब आप से फ़िर रू ब रू होते रहेंगे.इंशा अल्लाह!!

इंशा अल्लाह. ताऊ की पहेलीयां बूझेंगे, अल्पना जी के गाने और कवितायें सुनेंगे, लावण्या दीदी के संस्मरण, समीर जी की सिगरेट की पन्नी में लिखी हुई जीवन की सच्चाईयां, अनुराग जी के होस्टल के किस्से, अनुराग शर्माजी के पोडकास्ट, मनीष कुमार के और आवाज़ के सजीव सारथी और सुजॊय के संगीतमय पोस्टें, राज भाटिया जी के जोक्स, यूनुस भाई के मधुर और अनोखे गीत लोकगीत,और जिसका इंतज़ार रहता है.. संजय भाई के संस्मरण और OLD MONK के सारगर्भित कमेंट्स का.. तो फ़िर से अविरत चलते रहेंगे.

आखिर सच ही तो कहा है कि - मुसाफ़िर हूं यारों, ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना...

तो देखिये , उस मंज़र की कुछ झलकियां , जो आपके लिये, अगर समय निकाल सकें तो..




ये पंक्तियां लिखते लिखते समाचार मिला कि पुणे में ओशो अश्रम के पार जर्मन बेकरी में एक आतंकवादी विस्फ़ोट हुआ. मैंने ताबड़तोब पुने फ़ोन लगाया , क्यों कि मेरी पत्नी, बेटी नुपूर और बेटा अमोघ इन दिनों वहीं हैं. पता चला वे कुशल हैं, लेकिन उस समय वे वहां से केवल आधा किलोमीटर दूरी पर थे.

ALL IS STILL WELL!!

Tuesday, February 2, 2010

आल इज वेल !!! - परेशानीयों को कंट्रोल, आल्ट और डिलीट !!!


"आल इज वेल !!!"

हां. इतने दिनों के अंतराल के बाद फ़िर आपसे मुखतिब हूं आपका ये खा़दिम.

पिछली पोस्ट के आसपास ही पिताजी को हार्ट की तकलीफ़ हुई थी और वे आई सी यू में भर्ती हो गये थे. दो हफ़्ते के मशक्कत के बाद फ़िर घर पर स्वास्थ्य लाभ, और अब लगभग दो महिने के भीतर आल इज़ वेल.

धन्यवाद हे ईश्वर!! धन्यवाद आप सभी ब्लोगर परिवार के मित्रों !!!

आज पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि जो भी विरासत में मिला है वह भौतिक रूप में कम ज़्यादा हो सकता है, मगर मानस के आत्मीय और आध्यात्मिक तौर पर जो भी मिला है वह अनमोल है. संस्कार, संस्कृति, साहित्य, संगीत, चित्रकारी, और आध्यात्म, सभी कुछ आज मेरे पिताजी महामहोपाध्याय डॊ. प्रभाकर नारायण कवठेकर की वजह से है. जैसे माता ही सबसे पहली गुरु है, मगर पिता भी .उनके रूप में पिता और बाद में परमपिता परमेश्वर का वजूद हर क्षण हर पल साथ लिये चलता हूं.

उस दिन एक बात बडी़ खास जेहन में ठस के रह गयी थी. जब घर पहुंचा तो पता चला पिताजी को अटेक आया है और अस्पताल ले जाने के लिये एम्ब्युलंस आ रही है. बस , वही क्षण था , १० सेकंद में निर्णय लेना था, कि क्या एम्ब्युलंस के लिये रुका जाये या स्वयं ही चला कर ले चलें... शायद , इतना भी घातक हो सकता था.

अब समझ में आया. बडे बडे प्रोजेक्ट में ऊपर के स्तर पर डिसीशन लेने में और ये निर्णय लेने में ज़मीन आसमान का अंतर है. एम बी ए का पाठ याद किया, सभी ऒप्शन्स को तौला, और सबसे बेहतर पर अमल किया. याने , जो कुछ भी हो जाये , और रुकने से अच्छा है कि खुद ही ले जाऊं.

पिताजी को गाडी में बिठाया, और गाडी अस्पताल की ओर मोडी जो सौभाग्य से बेहद नज़दीक ही था.अपोलो होस्पिटल , जिसकी इमारत करीब २५ साल से भी पहले मैने ही बनाई थी, शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में से था, और मेरा छोटा भाई डा. गिरीश वहीं हार्ट का स्पेशलिस्ट था!!वह कहीं बाहर था और सीधे अस्पताल पहुंचने वाला था .बस एक बार उसे सौंप दूं , तो फ़िर आल मस्ट बी वेल !!

जब गाडी चली तो संयोग से सी डी डेक पर एक गीत बज रहा था.चूंकि राजकपूर जी की जन्म तिथी पास ही थी, आदत के अनुसार मैं राज जी के गाने सुन रहा था. मैं चौंक पडा:

गाना था - हम तो जाते अपने गांव, अपनी राम राम राम....

मैं थंड और गाने के बोल सुन कर ठिठुर सा गया. क्या ये विधाता का संकेत तो नहीं?

मगर पिताजी नें भी जब ये गाना सुना तो मुझ से निश्चयी स्वर में बोले: बंद कर दो ये गाना. मैं कहीं हमेशा के लिये थोडे ही जा रहा हूं. बस दो दिन में वापस आते हैं.

मैं झूटमूट हंस पडा. मगर बाद में रेस्ट्रोस्पेक्ट में देखता हूं तो पाता हूं कि अमूमन , अधिकतर ये उनकी सकारात्मक सोच
या Positive thinking ही तो थी, जो बाद में ३ ईडीयट्स में भी विस्तृत हुई, मेनीफ़ेस्ट हुई.

अब देखता हूं तो पाता हूं कि यही सकारात्मकता ही तो जीवन के ऊबड खाबड रास्ते पर, विषम परिस्थितियों में हमें इस दुख और पीडा के सागर में डूबने से बचाते हैं, और उस पार स्मूथ सेलिंग के साथ तैरने में मदत करते हैं.

वे दिन याद आये जब विक्रम युनिवर्सिटी के कुलपति के तौर पर छात्रों से मुठभेड , अर्जुन सिंग से वैचारिक मतभेद, माम की बीमारी ... यही धनात्मक उर्जा ही तो उन्हे ८७ वर्ष के पार ले आयी है.




फ़िल्म का एक वाक्य था जो बडा ही प्रसिद्ध हुआ - आल इज़ वेल. यह मंत्र वाकई में हमारे सिस्टम में हमारी पीडा़, दुख और परेशानी को बाई पास कर देता है, और हम सामान्य हो जाते हैं.

पिताजी के भी दो वाक्य याद आते है, अब जब ये फ़िल्म देख ली है, और इस के रीफ़रेंस में उनकी महत्ता समझ आयी.

काही विशेष नाही ...(कुछ खास नहीं) और
गम्मत आहे !! ( मज़ा है या बढिया है)

जब भी कोई परेशानी या अडचन आती थी तो वे कह देते थे - काही विशेष नाही याने कुछ खास नहीं. ताकि उसकी ग्रेविटी या सबब थोडा हलका हो जाता था.

फ़िर अंत में बात को खत्म करते हुए वे कहते हैं, गम्मत आहे.. याने मजा है, बढिया है, या फ़िर आल इस वेल!!!

याने उन यादों को कंट्रोल, आल्ट और डिलीट कर दिया, और मन के रेडियो में नया स्टेशन लगा दिया.




क्या कहते हैं आप सभी? बुरी यादों को कट पेस्ट करते रहने से क्या बेहतर नहीं कि हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला जाये (विस्मरण की धुंधलके में-सिगरेट के धुएं में नहीं).

Don't think this is escapism.This is positivity indeed.It is ability to combat weakening forces , win over it, or at least FLOAT !

मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं?

Monday, December 14, 2009

अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी का मज़ाक और २००१ के हमले का आंखो देखा हाल..




ये तो वाकई हद ही हो गयी कि मैंने अपने इस ब्लोग पर पिछले दो पूरे महिनों में कुछ भी पोस्ट नहीं किया.मुआफ़ी चाहूंगा.

अभी परसों सुरेशजी चिपलूणकर की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होनें अपने चिर परिचित अंदाज़ में व्यंग करते हुए २००१ में हुए संसद पर हमले का सरगना मास्टरमाइंड अफ़ज़ल गुरु को बर्थ डे पर विश किया था.

ये वाकई शर्म की बात है कि आज उस दिन को आठ साल हो गये हैं, और हमारी शिखंडी जमात उसे अभी तक फ़ांसी तक नहीं चढा पायी.

शिखण्डी हम इसलिये हैं कि जिसनें हमारे देश के संप्रभुता को चुनौती देते हुए प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंदिर पर हमला करने का षडयंत्र रचने का दुस्साहस किया, उसको फ़ांसी देने के लिये में आप , मैं और करोडो भारतीय बृहन्नलाओं की तरह ताली पीट पीट कर अपने अपने बिल में घुसे हुए ही गुहार मचा रहे हैं, और अफ़ज़ल गुरु जैसा ही और कोई विनाशकारी दिमाग कहीं दूर बैठ कर मुस्कुराते हुए एक नयी योजना बना रहा होगा, बेखौफ़ हो कर, क्योंकि हम जैसों को राष्ट्र भक्ति या राष्ट्राभिमान का जज़बा सिर्फ़ फ़िल्मी गीतों की रिकोर्ड बजा देने से पूरा हो जाता है.

वैसे अफ़ज़ल गुरु से मेरा व्यक्तिगत दुश्मनी का नाता भी है.

एक तो उसने मेरे भारत (Repeat MY INDIA)्की सहिष्णुता का मज़ाक उडाते हुए ये दुस्साहस किया.

दूसरे, आज भाग्य की वजह से मैं आपके सामने ये पोस्ट लिखने को ज़िंदा बचा हुआ हूं, वरना उसके अनुयायी की एक गोली उस दिन दिल्ली के संसद प्रांगण में मेरी समाधी बना चुकी होती.

बात ज़्यादह विस्तार से नहीं लिखूंगा. बस यही कि ऐसी यादें भूलनें के लिये नहीं होती, क्योंकि इससे आपके देश का सन्मान जुडा होता है.

उन दिनों मेरा काम संसद भवन के आहाते में ही बन रहे Parliament Library Project में चल रहा था. मेरी टीम के ५० से भी ज़्यादा आदमी पिहले देड महिनें से रात दिन एक करके लायब्ररी के फ़र्नीचर को असेंबल करने में लगे हुए थे जिसे मैने डिज़ाईन और सप्लाय किया था.

मैं उसी दिन अल सुबह वहां पहुंचा था, क्योंकि प्रधान मंत्री के लिये बनाई हुई टेबल में कुछ बुनियादी बदल करना थे, क्योंकि श्री अटल बिहारी बाजपेयी की घुटनों की तकलीफ़ की वजह से , उस खास डिज़ाईन में उन्हे तकलीफ़ आ रही थे.

मैं जैसे ही लायब्ररी के ६ मंज़िल की भव्य वास्तु (३ मंज़िल गाऊंड लेवल से ऊपर , और तीन बेसमेन्ट ) में जाकर काम का जायज़ा ले ही रहा थे कि अचानक गोलीयों की और मशीनगनों की आवाज़ से हम सभी काम करने वाले चौंक गये. वहां हमारे साथ करीब अलग अलग कंपनीयों के १५०० मज़दूर और २०० अफ़सरान काम कर रहे थे क्योंकि २६ जनवरी को उदघाटन तय था.

पहले तो समज़ ही नहीं पाये कि क्या हो रहा है, क्यों कि अकसर फ़िल्मों में सुनाई देने वाली आवाज़ से ये आवाज़ें अलग ही थी.

मैं भागकर उस हॊल में पहुंचा जहां से संसद का वह VIP GATE दिखाई दे रहा था जहांसे अक्सर प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और अन्य विशिष्ट व्यक्ति आया जाया करते थे.

वहां एक बडा़ सा कांच का खिडकीनुमा पार्टिशन था, जहां से सभी गतिविधियां साफ़ दिखाई पडती थी.

मैं जैसे ही वहां से झांकने का प्रयास कर ही रहा था, दूसरी तरफ़ से याने VIP GATE की तरफ़ से दो गोलीयां कांच से टकराई.कांच अच्छी क्वालिटी का था एक ईंच मोटा, और संयोग ही हुआ कि एक गोली उसे छेदते हुए इस पार निकली और दूसरी छिटक कर रिफ़्लेक्ट हो गई(चूंकि तीखे कोण से आई थी).

बस , जो गोली अंदर आयी उसपे मेरा नाम नहीं लिखा था, और वह सामने दिवार में धंस गयी, और जो पलटी थी वह लगभग बिल्कुल मेरी ओर ही आ सकती थी!!

मैं ताबड़तोब पीछे मुड़कर वापिस हो लिया. मैं और मेरे साथ के सभी मौजूद लोग अब तक ये पूरी तरह से समझ चुके थे कि संसद पर आतंकवादीयों का हमला हो व्हुका है, और अब हमारी भी खैर नहीं.

भय की और मौत की एक थंडी़ लहर मन के किसी कोने से गुज़र गयी. दिमाग काम नहीं कर रहा था कि अब हम अपने आप को कैसे बचायें. हम सभी बाहर की ओर भागने की सोचने लगए, मगर मालूम पडा़ कि बाहर सभी ओर सेना नें परिसर को घेर लिया है, और अब सबसे मेहफ़ूज़ जगह थी यही लायब्ररी की भव्य इमारत.

मैंने और मेरे मातहत इंजीनीयरों/सहायकों नें तुरंत ही अपन आदमीयों को समेटा और बेसमेन्ट नं. १ में स्थित हमें एलॊट किये गये कमरे में जाकर बैठ गये.(यहां अभी तक दरवाज़े नहीं लगाये गये थे). आप अंदाज़ा लगा सकते हैं हमारी मनस्थिति का, कि एक सामूहिक भय का और अफ़वाहों का वातावरण बन गया था, और लगातार ये आशंका व्यक्त की जा रही थी,कि आतंकवादी बडी संख्या में थे और अब वे हमारी बिल्डींग में घुसने वाले ही थे.

तभी हमने अपने बेसमेंट के कमरे की छोटे से रोशनदान से देखा कि कैसे हमारे ज़ांबाज़ सिपाही आतंकवादीयों से लोहा ले रहे थे. एक बार तो हमारे सामने एक सिपाही कवर में से एकदम बाहर निकला.शायद उसनें किसी आतंकवादी को देख लिया था,जो उस द्वार के ऊपर की छत पर छिपा हुआ था.

मगर उससे पहले आतंकवादी नें खडे हो कर उस सिपाही को शूट कर दिया. हम असहाय से , उसे चिल्ला चिल्ला कर आगाह करने लगे, जैसे कि हमारी आवाज़ उस तक पहुंच रही होगी. हम तो सिनेमाहॊल में मूव्ही देख रहे उस दर्शकों की तरह से ये सब देख रहे थे,एक मायाजाल के वर्च्युअल जगत में स्लो मोशन में फ़टी फ़टी आंखों से देख रहे थे ये नज़ारा.वक्त जैसे ठहर ही गया था.

मगर बाद में पता चला कि उस सिपाही नें गोली लगने के बावजूद अपनी राईफ़ल से उस आतंकवादी को निशाना लगाकर मार गिराया और खुद शहीद हो गया. शायद ये सिपाही शहीद नानकचंद था, जिसने देशभक्ति के और कर्तव्यपूर्ति के उस जज़बे की वजह से अपनी जान दे दी.

फ़िर एक लंबी खामोशी छा गयी. भय और बढ गया, क्योंकि यूं लगने लगा कि शायद अब आतंकवादी भाग रहे थे, और शायद यह नई निर्माणाधीन भवन छिपने या भागने के लिये बेहतर होगा. बीच में ये भी सुना कि उन्होनें किसी VIP को भी बंधक बना लिया है.

मौत की आहट की उस खामोशी को तोडते हुए कुछ लोगों की भागते हुए बेसमेंट में आने की आहट होने लगी.यह भवन इतना बडा था कि अब तक हमें उसके सभी रास्तों और सीढीयों का पता हो गया था. तब मुझे याद आया कि बेसमेंट नं. २ में नीचे कुछ कमरे ऐसे भी थे जहां दरवाज़े लग चुके थे और कहीं अस्थाई ताले भी लगा दिये थे.

मैं अपने साथ कुछ लोगों को लेकर नीचे की ओर भागा.मगर रास्ते में ही हमें कुछ दस बारह लोगों की भीड दिखाई दी ,जो और नीचे की ओर जा रही थी.

पहले तो हम ठिटक कर खडे हो गये , कि शायद आतंकवादी तो नहीं. मगर बाद में पता चला कि बिहार के कुछ बाहुबली सांसद उस तरफ़ से भाग कर यहां छिपने के लिये आ गये थे. बडा ही अजीब नज़ारा था कि ऐसे रौबिले और स्वयं आतंकवादी की शक्ल वाले ये माफ़िया के गुंडे लठैत संस्कृति के नुमाईंदे, जिन्होने अपने अपराधी इतिहास के बावजूद, गुंडा राजनिती के बल पर चुनाव जीत कर संसद में आ गये थे, मेरे सामने थर थर कांप रहे थे मौत के भय से. एक पहलवान नुमा सांसद का तो पजामा तक गीला हो गया था. उसनें मुझे देख कर हाथ पैर जोड़ कर मुझसे दया याचना की भीख मांगने लगा जैसे कि मैं ही कोई आतंकवादी हूं. फ़िर दूसरे नें स्थिति भापकर मुझसे बिनती की कि उन्हे तहखाने में कहीं किसी अंधेरे कमरे में बंद कर दें और बाहर से ताला लगा दें. दूसरे नें साथ में और ये जोड दिया कि ताले की चाबी कहीं अंधेरे में फ़ेंक दे!!

मैं ठगा सा विधि का विधान देख रहा था. एक वह सिपाही था , जो अपनी जान तक कुर्बान कर गया, और दूसरे जान से डरके थर थर कांपने वाले ये सांसद हैं, जिनके लिये उसनें अपनी जान दी.

खैर, मौत का खौफ़ शहादत से ऊपर चढ़ कर बोलता है. हम सभी दूसरे नीचे के तल के बेसमेंट में चले गये और करीब चार बजे तक छोटे कमरों में छुपे रहे. बाद में जब हमारे एक साथी नें ऊपर जाकर वस्तुस्थिति का पता किया (BRAVE) तब जाकर हम सभी बाह्र निकले. मगर हमारे बहादुर साथीयों नें(सांसद) फ़िर भी ऊपर जाने से मना किया, और स्वयं नज़मा हेपतुल्ला जी आयीं और उन्हे बाहर निकाला.

क्या विरोधाभास और मज़ाक नही है, कि आज आठ साल के बाद भी अफ़ज़ल गुरु , जिसे हमारे न्यायालय ने बाकायदा न्याय प्रक्रिया के तेहत दोषी करा देते हुए फ़ांसी की सज़ा मुकर्रर की , उसे अभी तक किसी ना किसी खोखले तर्क के बिना पर ज़िंदगी मुहैय्या कराई जा रही है. ये उन्शहीदों और सच्चे देशभक्त लोगों की शहादत का मज़ाक है, और हम सभी उसे समझ कर भी कर्महीनता के कारण चुप बैठे है.

पता चला है कि कोई श्री राधा रंजन नें Hang Afazal Guru के नाम से ओनलाईन हस्ताक्षर अभियान चला रखा है,और अब तक १४०० लोगों ने उसपर समर्थन दिया है. मगर दुख की या शर्म की बात ये भी है कि किसी तथाकथित मानव अधिकार संगठन नें Justice for Afazal Guru नाम से समानांतर अभियान चला रखा है नेट पर, और उसपर १६६६ लोग अपना नाम दर्ज़ करा चुके हैं.

याने यहां भी हमारी हार?

क्या आप मुझसे सेहमत हैं?

क्या आप नहीं चाहेंगे कि हम सभी ब्लोगर दुनिया के भाई और बेहनों को नही चाइये कि हम अपना विरोध दर्ज़ करायें और एक सामाजिक चेतना में अपना भी सहभाग दें?
http://www.petitiononline.com/hmag1234/petition.html

Sunday, December 13, 2009

अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी का मज़ाक और २००१ के हमले का आंखो देखा हाल..




ये तो वाकई हद ही हो गयी कि मैंने अपने इस ब्लोग पर पिछले दो पूरे महिनों में कुछ भी पोस्ट नहीं किया.मुआफ़ी चाहूंगा.

अभी परसों सुरेशजी चिपलूणकर की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होनें अपने चिर परिचित अंदाज़ में व्यंग करते हुए २००१ में हुए संसद पर हमले का सरगना मास्टरमाइंड अफ़ज़ल गुरु को बर्थ डे पर विश किया था.

ये वाकई शर्म की बात है कि आज उस दिन को आठ साल हो गये हैं, और हमारी शिखंडी जमात उसे अभी तक फ़ांसी तक नहीं चढा पायी.

शिखण्डी हम इसलिये हैं कि जिसनें हमारे देश के संप्रभुता को चुनौती देते हुए प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंदिर पर हमला करने का षडयंत्र रचने का दुस्साहस किया, उसको फ़ांसी देने के लिये में आप , मैं और करोडो भारतीय बृहन्नलाओं की तरह ताली पीट पीट कर अपने अपने बिल में घुसे हुए ही गुहार मचा रहे हैं, और अफ़ज़ल गुरु जैसा ही और कोई विनाशकारी दिमाग कहीं दूर बैठ कर मुस्कुराते हुए एक नयी योजना बना रहा होगा, बेखौफ़ हो कर, क्योंकि हम जैसों को राष्ट्र भक्ति या राष्ट्राभिमान का जज़बा सिर्फ़ फ़िल्मी गीतों की रिकोर्ड बजा देने से पूरा हो जाता है.

वैसे अफ़ज़ल गुरु से मेरा व्यक्तिगत दुश्मनी का नाता भी है.

एक तो उसने मेरे भारत (Repeat MY INDIA)्की सहिष्णुता का मज़ाक उडाते हुए ये दुस्साहस किया.

दूसरे, आज भाग्य की वजह से मैं आपके सामने ये पोस्ट लिखने को ज़िंदा बचा हुआ हूं, वरना उसके अनुयायी की एक गोली उस दिन दिल्ली के संसद प्रांगण में मेरी समाधी बना चुकी होती.

बात ज़्यादह विस्तार से नहीं लिखूंगा. बस यही कि ऐसी यादें भूलनें के लिये नहीं होती, क्योंकि इससे आपके देश का सन्मान जुडा होता है.

उन दिनों मेरा काम संसद भवन के आहाते में ही बन रहे Parliament Library Project में चल रहा था. मेरी टीम के ५० से भी ज़्यादा आदमी पिहले देड महिनें से रात दिन एक करके लायब्ररी के फ़र्नीचर को असेंबल करने में लगे हुए थे जिसे मैने डिज़ाईन और सप्लाय किया था.

मैं उसी दिन अल सुबह वहां पहुंचा था, क्योंकि प्रधान मंत्री के लिये बनाई हुई टेबल में कुछ बुनियादी बदल करना थे, क्योंकि श्री अटल बिहारी बाजपेयी की घुटनों की तकलीफ़ की वजह से , उस खास डिज़ाईन में उन्हे तकलीफ़ आ रही थे.

मैं जैसे ही लायब्ररी के ६ मंज़िल की भव्य वास्तु (३ मंज़िल गाऊंड लेवल से ऊपर , और तीन बेसमेन्ट ) में जाकर काम का जायज़ा ले ही रहा थे कि अचानक गोलीयों की और मशीनगनों की आवाज़ से हम सभी काम करने वाले चौंक गये. वहां हमारे साथ करीब अलग अलग कंपनीयों के १५०० मज़दूर और २०० अफ़सरान काम कर रहे थे क्योंकि २६ जनवरी को उदघाटन तय था.

पहले तो समज़ ही नहीं पाये कि क्या हो रहा है, क्यों कि अकसर फ़िल्मों में सुनाई देने वाली आवाज़ से ये आवाज़ें अलग ही थी.

मैं भागकर उस हॊल में पहुंचा जहां से संसद का वह VIP GATE दिखाई दे रहा था जहांसे अक्सर प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और अन्य विशिष्ट व्यक्ति आया जाया करते थे.

वहां एक बडा़ सा कांच का खिडकीनुमा पार्टिशन था, जहां से सभी गतिविधियां साफ़ दिखाई पडती थी.

मैं जैसे ही वहां से झांकने का प्रयास कर ही रहा था, दूसरी तरफ़ से याने VIP GATE की तरफ़ से दो गोलीयां कांच से टकराई.कांच अच्छी क्वालिटी का था एक ईंच मोटा, और संयोग ही हुआ कि एक गोली उसे छेदते हुए इस पार निकली और दूसरी छिटक कर रिफ़्लेक्ट हो गई(चूंकि तीखे कोण से आई थी).

बस , जो गोली अंदर आयी उसपे मेरा नाम नहीं लिखा था, और वह सामने दिवार में धंस गयी, और जो पलटी थी वह लगभग बिल्कुल मेरी ओर ही आ सकती थी!!

मैं ताबड़तोब पीछे मुड़कर वापिस हो लिया. मैं और मेरे साथ के सभी मौजूद लोग अब तक ये पूरी तरह से समझ चुके थे कि संसद पर आतंकवादीयों का हमला हो व्हुका है, और अब हमारी भी खैर नहीं.

भय की और मौत की एक थंडी़ लहर मन के किसी कोने से गुज़र गयी. दिमाग काम नहीं कर रहा था कि अब हम अपने आप को कैसे बचायें. हम सभी बाहर की ओर भागने की सोचने लगए, मगर मालूम पडा़ कि बाहर सभी ओर सेना नें परिसर को घेर लिया है, और अब सबसे मेहफ़ूज़ जगह थी यही लायब्ररी की भव्य इमारत.

मैंने और मेरे मातहत इंजीनीयरों/सहायकों नें तुरंत ही अपन आदमीयों को समेटा और बेसमेन्ट नं. १ में स्थित हमें एलॊट किये गये कमरे में जाकर बैठ गये.(यहां अभी तक दरवाज़े नहीं लगाये गये थे). आप अंदाज़ा लगा सकते हैं हमारी मनस्थिति का, कि एक सामूहिक भय का और अफ़वाहों का वातावरण बन गया था, और लगातार ये आशंका व्यक्त की जा रही थी,कि आतंकवादी बडी संख्या में थे और अब वे हमारी बिल्डींग में घुसने वाले ही थे.

तभी हमने अपने बेसमेंट के कमरे की छोटे से रोशनदान से देखा कि कैसे हमारे ज़ांबाज़ सिपाही आतंकवादीयों से लोहा ले रहे थे. एक बार तो हमारे सामने एक सिपाही कवर में से एकदम बाहर निकला.शायद उसनें किसी आतंकवादी को देख लिया था,जो उस द्वार के ऊपर की छत पर छिपा हुआ था.

मगर उससे पहले आतंकवादी नें खडे हो कर उस सिपाही को शूट कर दिया. हम असहाय से , उसे चिल्ला चिल्ला कर आगाह करने लगे, जैसे कि हमारी आवाज़ उस तक पहुंच रही होगी. हम तो सिनेमाहॊल में मूव्ही देख रहे उस दर्शकों की तरह से ये सब देख रहे थे,एक मायाजाल के वर्च्युअल जगत में स्लो मोशन में फ़टी फ़टी आंखों से देख रहे थे ये नज़ारा.वक्त जैसे ठहर ही गया था.

मगर बाद में पता चला कि उस सिपाही नें गोली लगने के बावजूद अपनी राईफ़ल से उस आतंकवादी को निशाना लगाकर मार गिराया और खुद शहीद हो गया. शायद ये सिपाही शहीद नानकचंद था, जिसने देशभक्ति के और कर्तव्यपूर्ति के उस जज़बे की वजह से अपनी जान दे दी.

फ़िर एक लंबी खामोशी छा गयी. भय और बढ गया, क्योंकि यूं लगने लगा कि शायद अब आतंकवादी भाग रहे थे, और शायद यह नई निर्माणाधीन भवन छिपने या भागने के लिये बेहतर होगा. बीच में ये भी सुना कि उन्होनें किसी VIP को भी बंधक बना लिया है.

मौत की आहट की उस खामोशी को तोडते हुए कुछ लोगों की भागते हुए बेसमेंट में आने की आहट होने लगी.यह भवन इतना बडा था कि अब तक हमें उसके सभी रास्तों और सीढीयों का पता हो गया था. तब मुझे याद आया कि बेसमेंट नं. २ में नीचे कुछ कमरे ऐसे भी थे जहां दरवाज़े लग चुके थे और कहीं अस्थाई ताले भी लगा दिये थे.

मैं अपने साथ कुछ लोगों को लेकर नीचे की ओर भागा.मगर रास्ते में ही हमें कुछ दस बारह लोगों की भीड दिखाई दी ,जो और नीचे की ओर जा रही थी.

पहले तो हम ठिटक कर खडे हो गये , कि शायद आतंकवादी तो नहीं. मगर बाद में पता चला कि बिहार के कुछ बाहुबली सांसद उस तरफ़ से भाग कर यहां छिपने के लिये आ गये थे. बडा ही अजीब नज़ारा था कि ऐसे रौबिले और स्वयं आतंकवादी की शक्ल वाले ये माफ़िया के गुंडे लठैत संस्कृति के नुमाईंदे, जिन्होने अपने अपराधी इतिहास के बावजूद, गुंडा राजनिती के बल पर चुनाव जीत कर संसद में आ गये थे, मेरे सामने थर थर कांप रहे थे मौत के भय से. एक पहलवान नुमा सांसद का तो पजामा तक गीला हो गया था. उसनें मुझे देख कर हाथ पैर जोड़ कर मुझसे दया याचना की भीख मांगने लगा जैसे कि मैं ही कोई आतंकवादी हूं. फ़िर दूसरे नें स्थिति भापकर मुझसे बिनती की कि उन्हे तहखाने में कहीं किसी अंधेरे कमरे में बंद कर दें और बाहर से ताला लगा दें. दूसरे नें साथ में और ये जोड दिया कि ताले की चाबी कहीं अंधेरे में फ़ेंक दे!!

मैं ठगा सा विधि का विधान देख रहा था. एक वह सिपाही था , जो अपनी जान तक कुर्बान कर गया, और दूसरे जान से डरके थर थर कांपने वाले ये सांसद हैं, जिनके लिये उसनें अपनी जान दी.

खैर, मौत का खौफ़ शहादत से ऊपर चढ़ कर बोलता है. हम सभी दूसरे नीचे के तल के बेसमेंट में चले गये और करीब चार बजे तक छोटे कमरों में छुपे रहे. बाद में जब हमारे एक साथी नें ऊपर जाकर वस्तुस्थिति का पता किया (BRAVE) तब जाकर हम सभी बाह्र निकले. मगर हमारे बहादुर साथीयों नें(सांसद) फ़िर भी ऊपर जाने से मना किया, और स्वयं नज़मा हेपतुल्ला जी आयीं और उन्हे बाहर निकाला.

क्या विरोधाभास और मज़ाक नही है, कि आज आठ साल के बाद भी अफ़ज़ल गुरु , जिसे हमारे न्यायालय ने बाकायदा न्याय प्रक्रिया के तेहत दोषी करा देते हुए फ़ांसी की सज़ा मुकर्रर की , उसे अभी तक किसी ना किसी खोखले तर्क के बिना पर ज़िंदगी मुहैय्या कराई जा रही है. ये उन्शहीदों और सच्चे देशभक्त लोगों की शहादत का मज़ाक है, और हम सभी उसे समझ कर भी कर्महीनता के कारण चुप बैठे है.

पता चला है कि कोई श्री राधा रंजन नें Hang Afazal Guru के नाम से ओनलाईन हस्ताक्षर अभियान चला रखा है,और अब तक १४०० लोगों ने उसपर समर्थन दिया है. मगर दुख की या शर्म की बात ये भी है कि किसी तथाकथित मानव अधिकार संगठन नें Justice for Afazal Guru नाम से समानांतर अभियान चला रखा है नेट पर, और उसपर १६६६ लोग अपना नाम दर्ज़ करा चुके हैं.

याने यहां भी हमारी हार?

क्या आप मुझसे सेहमत हैं?

क्या आप नहीं चाहेंगे कि हम सभी ब्लोगर दुनिया के भाई और बेहनों को नही चाइये कि हम अपना विरोध दर्ज़ करायें और एक सामाजिक चेतना में अपना भी सहभाग दें?
http://www.petitiononline.com/hmag1234/petition.html

Thursday, October 8, 2009

मन रे तू काहे ना धीर धरे..... करवा चौथ-- बनाम सातवां जन्म


नहीं, मैं यहां आपको ये गीत नहीं सुनवा रहा हूं. ना ही अपनी आवाज़ में , ना ही रफ़ी जी के स्वार्गिक स्वर में.मैं तो आज बडा ही खुश हूं , मूड में हूं , क्योंकि आज का दिन बडा ही भाग्यशाली दिन है,जो पूरा खुशनुमा गुज़रता है, और पत्नी की तरफ़ से कोई रिस्क नहीं होती.

जी हां,आज करवा चौथ के व्रत का पावन दिन है. आपको मालूम ही है कि आज के दिन उत्तर भारत में पत्नीयां अपने (अपने) पति की लंबी उमर के लिये व्रत रखती हैं, दिन भर उपवास रखती हैं, और रात को चंद्रमा को देखकर ही व्रत तोडती हैं.

मगर हमारे यहां महाराष्ट्रीय परिवार में करवा चौथ नहीं मनाया जाता.

इसलिये हमारी एक मात्र पत्नी डॊ. नेहा नें जब आज मुझसे सुबह यह बताया कि वह भी आज व्रत में उपवास रख रही है, तो मैं हैरान हो गया.मगर उन्होने बाद में स्पष्टिकरण दिया कि आज संकष्टि चतुर्थी है और इस बार से वह हर महिने यह व्रत रखा करेगी.

मैंने चैन की सांस ली. चूंकि हमारे यहां हरतालिका का व्रत रखती हैं पत्नीयां जो करवा चौथ से बहुत ज़्यादा कडा होता है.एक रात पहले के डिनर के बाद पूरा दिन और रात बारह बजे तक कोई अन्न या जल तक नहीं लेती.जबकि सुना है, कि करवा चौथ में सुबह उठ कर पहले कुछ खा लिया जाता है, और शाम को चांद को देखकर व्रत तोडा जाता है.

वैसे हमारे देश में यह बात बडे महत्वपूर्ण और असर के साथ कही जाती है, कि हर पत्नी सात जन्मों के लिये एक ही पति की कामना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती है, और व्रत रखती है.

अब बताईये ,मेरे मित्र की पत्नी का एक SMS नेहा को आया था जो जंच गया अपुन को, कि पत्नीयां इसलिये हर जन्म उसी पति को ईश्वर से मांगती हैं , क्योंकि अगले जनम में पति पर इस जनम की गई उसकी मेहनत बेकार नहीं चली जाये!!!(सात जनम तो लगेंगे ही एक अदद पति को पूरी तरह से ’सुधरने’ को!!!)

इसीलिये मैंने पत्नी को इस बार भी आश्वासन दिया( हमेशा की तरह ) कि इस साल तो मैं सुधर कर दिखाऊंगा. मगर पत्नी सिर्फ़ हंस दी. गोया , ना मैं सुधरूंगा, और ना ही अगले जनम की बर्थ पक्की.

वैसे नेहा अपने उस मित्र से फोन पर कह थी कि यह जनम आखरी है.याने सातवां!!!!!

याने , इसका क्या मतलब हुआ?

याने अपन पूरे सुधर गये है?
या
अपने में अब सुधरने का कोई चांस नही रहा?
या
जो भी हो, अब बहुत हुआ.नई घोडी(या नया घोडा) नया दाम ?
या
क्या आपको ही सेंस ओफ़ ह्युमर है?, हम मज़ाक नहीं कर सकते?(इति-पत्नी)

वैसे अब ये गीत कहां तक सार्थक होता है - और किसके लिये -(मेरे या पत्नी के लिये) कि मन रे तू काहे ना धीर धरे- बस ये तो सातवां जन्म है!!!

अब बताईये , अगर कोई चेनल वाला आ गया और मुझसे पूछ बैठा कि आपकी क्या रियेक्शन है? तो मैं क्या जवाब दूंगा?

Friday, September 18, 2009

डेंग्यु बनाम वाईरल फ़्ल्यु


अंत भला तो सब भला.

बिटिया भी चंगी हो गयी और अपन भी.

दरसल स्वाईन फ़्यु के चक्कर में मीडीया इतनी व्यस्त हो गयी है कि घबराहट ज़्यादा हो रही है, मौतों के बनिस्बत.

ये चित्र मेरी बडी बेटी नूपुर नें पुणें से भेजी है, एक शादी का विचित्र किंतु सत्य चित्र. सत्य यूं कि पूणें में भी हास्य बोध की कमी नहीं है.

वैसे मानसी को डेंग्यु हुआ था और मुझे वाईरल फ़्ल्यु, मगर दोनों में लक्षण एक होने के बावजूद डेंग्यु घातक है, क्योंकि उसमें खून में प्लेटलेट्स की मात्रा काफ़ी कम हो जाती है, और रक्त स्त्राव शुरु हो जाता है, जो कि जानलेवा भी हो सकता है.
इंदौर में इस समय हर १० में से ३ व्यक्ति डेंग्यु या वाईरल से पीडीत है( डेंग्यु की मोर्टेलिटी रेट ५% है जबकि स्वाईन फ़्यु का १%)

मेरे मित्र के बेटे का केस इतना बिगडा कि रातो रात मुम्बई लीलावती हस्पताल में भरती करना पडा.वहां पता चला कि चूंकि बदन दर्द की वजह से एनल्जेसिक गोली दी गयी थी उसने प्लेटलेट्स और भी खतरनाक स्तर तक कम कर दिये.बिटिया को भी गलती या अनजाने में मैने भी यही गोली दी थी, मगर मालूम होते ही स्वयं को दूर रखा, पीडा के गहरे एहसास के बावजूद.

अब पता चला है, कि भारत में अन्य शहरों में भी यही बुखार फ़ैल रहा है, जिसे मीडीया ने अधिक तवज्जो नहीं दी है, जो ठीक ही है.

भगवान ना करे, किसी को ये बुखार हो, मगर ये पोस्ट लिखने का मुख्य उद्देश्य ये ही है, कि अगर हड्डी तोड दर्द के साथ बुखार आये तो प्लेटलेट्स का ध्यान रखें , और एनल्जेसिक गोली से या अस्प्रिन से एकदम परहेज करें.....(डॊ. की सलाहनुसार)

Tuesday, September 15, 2009

हिंदी डे के ग्रेट ऒकेज़न पर आपसे रिक्वेस्ट


आपमें से कई ब्लॊगर्स जानते ही होंगे कि कल हिंदी डे था.

कल वैसे मैं ज़्यादा ही बीज़ी था , क्योंकि एक दम से मुझे भी फ़ीवर आ गया था.ऊपर से मेरे दोनों लेपटॊप मेंटेनेंस में,याने करेला और नीम चढा. मगर आई लव हिंदी, इसलिये मेरी बडी डिज़ायर थी कि हिंदी पर कुछ लिखूं.इसीलिये आज लेपटॊप आते ही ये राईट अप.वाईफ़ पहले से दो पेशंट्स से डिस्टर्ब थी और अब १०२ टेंपरेचर में मेरा पोस्ट लिखना कुछ टू मच ही हो गया.मगर मेरे हिडी सोरी हिंदी प्रेम नें मुझे मोटीवेट किया और मिसेस के ऒब्जेक्शन के बावजूद लिखने बैठ गया.

अब आप से क्या छुपाऊं.एक्च्युअली मेरा हिंदी प्रेम तो पूरे वर्ल्ड में फ़ेमस है.मैं जब भी हिंदी बोलता हूं तो ये काफ़ी ट्राई करता हूं कि सिर्फ़ हिंदी के ही वर्ड्स बोलूं, और साथ में राईटिंग में जब भी मैं कोई सेंटेंस लिखता हूं तो मेरी कोशिश होती है, कि इंग्लिश का युज़ ना करूं.

दर असल, हमें अपनी मातृ भाषा पर प्राईड होना चाहिये. यह मात्र भाषा नहीं , लेकिन मदर टंग है हमारी.

इसलिये आप सभी से मेरा रिक्वेस्ट है कि जहां तक हो सकें हिंदी को अपलिफ़्ट करें, और उसके सामने इंग्लिश को कही भी इम्पोर्टेंस ना दें. ये कोई डिफ़िकल्ट नहीं है,बडा ही ईज़ी है.बस आपके माइंड में आप डिसाईड कर लें तो ये कोई इम्पोसिबल नही हैं.

तो आप सब मुझे प्रोमिस करें कि सभी मिलकर इस ग्रेट ऒकेज़न पर याने हिंदी डे पर हम हिन्दी को और इसके कल्चर को , लिट्रेचर को सपोर्ट करें ताकि एक दिन हम गर्व के साथ कह सकें कि हिंदी है हम, हिंदी हैं हम,हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा.....


क्या आप मेरे लॊजिक और फिलॊसॊफ़ी से एग्री करतें है?

Tuesday, August 25, 2009

सुखकर्ता , दुखहर्ता - गणेश चतुर्थी



सुखकर्ता , दुखहर्ता भगवान श्री गणेश की जन्म दिवस गणेश चतुर्थी पर आप सभी को लेट लतीफ़ का नमस्कार.

हमारे राष्ट्र में और खासकर महा’राष्ट्र’ में हर जगह बडे उत्साह से हर भक्त नें अपने अपने सामर्थ्य से भगवान श्री गजानन की मूर्ती की स्थापना अपने घरों में, ऒफ़िस में और अन्य कार्य क्षेत्रों में ज़रूर लगाई होगी. जो नहीं लगा पायें हों उन्होने भी अपने मन में उस मनोहर मूरत की छबि बसाई होगी.

हमारा परिवार महाराष्ट्रीय संस्कृति और परंपरा का निर्वाह करते हुए हर साल अपने यहां भगवान श्री वक्रतुंड महाकाय की मनोहारी मूर्ती स्थापित करता चला आ रहा है. हमारे पूर्वज करीब २०० साल पहले मालवा के सुबेदार मल्हारराव होल्कर प्रथम के राजगुरु बनके जब इंदौर आये तब से हमारे यहां इस परंपरा के अनुसार ५ दिन के बाद भगवान श्री गजानान की मंगल मूर्ती का विसर्जन कर देते हैं.

आज के दिन सुबह हम सभी परिवार के सदस्य इंदौर के प्रसिद्ध शनि मंदिर के पास गणेश मंदिर जाते हैं, और करीब दो पीढीयों से मिट्टी की ईको फ़्रेंडली मूर्ती बनाने वाले प्रसिद्ध मूर्तिकार खरगोणकर के यहां से मूर्ती लाते हैं. यह मूर्ति विसर्जन करते समय बहुत ही जल्दी जल में घुल जाती है, और इसमें सभी रंग नॊन टॊक्सिक लगाये जाते हैं. वरना आज हर जगह प्लास्टर ओफ़ पेरिस की सांचे में ढली मूर्तीयां मिलती है, जिसपर टोक्सिक पेंट किया जाता है, और जब भी इन्हे शहर के कूंवें , बावडीयों में विसर्जित किया जाता है, तो ये जल में घुलती नहीं है, और प्रदूषण फ़ैलाती है.


वैसे हम दो गणेशजी की स्थापना करते है>



एक दायीं सूंड वाले गणपति ,जिन्हे हम सार्वजनिक झांकी के साथ विराजमान करते हैं.
(पुणेरी पगडी़ धारण किये हुए- ऊपर के चित्र में झांकी)












दूसरे बांयी सूंड वाले गणपति , जो हमारे पूजा स्थान में बिराजते हैं, और उनकी पूजा बडी कडाई से परंपरागत सोवले में याने रेशमी धोती में होती है.(वैसे मुझे बचपन से यह कभी समझ में नहीं आया कि रोज़ रोज़ धुलने वाले कपडे या धोती भला क्यों स्वच्छ होते हुए भी नहीं पहनी जाती थी, बल्कि इतने दिनों से ना धोये, सोवला( सोळं )क्यों चल जाता था.




फ़िर २१ मोदकॊं का भोग लगने के बाद हमें प्रसाद मिलता है, जो पांच दिनों रोज़ दो बार की आरती के बाद ग्रहण किया जाता है.

पहले बचपन में गणेशोत्सव बडी धूमधाम से होते थे, और आज भी होते हैं. गली गली, मोहल्ले मोहल्ले में गणेशोत्सव समितियों का गठन होता था और हर दिन शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. उन दिनों हम सभी गीत गायन प्रतियोगिता में भाग लेकर कप जीतते थे, एकांकियां और नाटक के मंचन करते थे और तालियां बटोरते थे.

इन्दौर शहर में तो यह उत्सव १० दिन चल कर इसका समापन अनंत चौदस पर होता था, जिसमें नगर के सभी गणमान्य गणेशोत्सव समितियों के (खासकर यहां की कपडा़ मीलों के) स्थापित गणेश जी को विसर्जित किया जाता था बाकायदा झांकीयों के रूप में, जो रात भर चलती थी, और सुबह जाकर विसर्जन किया जाता था.इन झांकियो को एक कार्निवाल सा स्वरूप होता था, और आस पास से , और दूर से टूरिस्ट्स के जत्थे के जत्थे इन्दौर में आते थे.



आज भी कमोबेश समितियां बन रहीं है, और चंदे उगाये जा रहें है.मगर दुख यही है, कि अधिकतर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में संकृति या संस्कार के दर्शन होने की बजाये, दिन भर लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी धुनें बजती हैं(बीडी जलई ले..) और रात को डिस्को धुनों पर नाच गाना. हां , यहां के मराठी समाज नें ज़रूर अपनी पुरानी परंपरा जारी रखी हुई है, और महंगाई और बीमार मीलों के बावजूद झांकी निकलना जारी है. मैं अपनी दिली कोशिश करके इसके बारे में एक अलग पोस्ट पेश करूंगा.के पास

Tuesday, August 18, 2009

शहीद मदनलाल धिंग्रा - पुण्य स्मरण


इस हफ़्ते बडी़ गहमा गहमी थी. जैसे पिछले हफ़्ते राखी के त्योहार का सुरूर चढा, इस हफ़्ते जन्माष्टमी का. और साथ ही हमारे सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां का स्वतंत्रता दिवस!! क्या बात है!!

दोस्तों आपको याद ही होगा, भारत का स्वतंत्रता दिवस १५ अगस्त को होता है.

अरे आप बुरा मत मानिये! मैं तो जरा मजे ले रहा था. मैं तो नेताओं के बारे में सोच रहा था. बचपन में आर.के. लक्ष्मण का एक बढिया कार्टून देखा था जो अब तक जेहन में है.उसमें गांधीजी के एक बडे़ फ़्रेम लगे चित्र को देख कर उसके नीचे लिखी नामपट्टी को एक नेताजी पढ रहे थे झुक कर, तो उनका पी ए फ़ुसफ़ुसाकर कह रहा था - सर, गांधीजी हैं ये!!!

वैसे आजकल कोई भी स्वनामधन्य नेता १५ अगस्त नहीं भूलता. हर कद्दावर नेता इस अवसर को भुनाने की पहले सोचता है. मगर हर पार्टी नें अपने अपने नेता बांट लिये है. कांग्रेस के नेताओं द्वारा आयोजित कार्यक्रम (या प्रायोजित?)के बेनर पर उस नेता और मित्र मंडल के बडे बडे फोटूओं के साथ सोनिया और राहुल के चित्र के साथ दो चार छोटे छोटे चित्र गांधीजी, नेहरूजी, और शास्त्री जी के मिल सकते हैं(कभी भगत सिंह के भी). वैसे ही भाजपा के कार्यक्रम में सावरकरी,उपाध्यायजी आदि के चित्र अटल जी और अडवानी जी के साथ नमूदार हो सकते है.याने इन सभी राष्ट्रीय संतों को भी बांट लिया गया है.

शहीदों की बात चल पडी है, तो ये बात गौर करने लायक है, कि हम भगतसिंह, राजगुरु आदि को तो याद कर लेते हैं, (अच्छी बात है) मगर अन्य कई शहीदों को भूल जाते हैं जिन्होने भी इस मातृभूमि के लिये अपने प्राणों की आहूति दी है.याने उन्हे मीडीया का भी साथ नहीं मिल पाता , क्योंकि शायद आजकल की नई पीढी के टाई लगा कर एयरकंडीशन ओफ़िस में कीबोर्ड पर लिखने वाले पत्रकार (उसपर अंग्रेज़ी के जर्नलिस्ट्स-याने करेला और नीम चढा) इन के नाम तक ही नही जानते , उनके हीरोईक कारनामों का तसव्वूर करना तो दूर ही की बात है.

ऐसा ही एक नाम है- शहीद मदनलाल धिंग्रा का.

जब हमारे यहां भारत में गांधीजी, नेहरूजी,सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद आदि अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चल कर और चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंग,सुभाशचंद्र बोस आदि अन्य विचारधारा से प्रेरित राष्ट्रभक्त अपने प्राणों को न्योछावर करने के लिये इस महा संग्राम में कूद पडे थे, वहीं ग्रेट ब्रिटन में भी एक और ब्रिगेड के साथी आज़ादी की इस क्रांति के दहकते ज्वालाकुंड में आहूति देने के लिये कटिबद्ध थे -

स्वातंत्रवीर सावरकर, श्यामजी कृष्णवर्मा, मेडम भिकाजी कामा, सरदार अजितसिंग, सरोजिनी नायडू के भाई वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ,रामबिहारी बोस, चंपकरमण पिल्लई आदि .और उनमें एक नाम बोल्ड अक्षरों के साथ लिखा गया है, मदनलाल धिंग्रा का.

एकदम निश्चयी मन के , त्याग की प्रतिमूर्ति , देशभक्ति के लिये धधकते हुए जज़बात जिसके नस नस में भरे हुए थे ,ऐसे इस क्रांतिवीर के पराक्रम और देश के लिये दी गयी कुर्बानी को इस कृतघ्न देश नें याद नहीं रखा.

मैं यहां आपको बता दूं , कि इस उपेक्षित शहीद शिरोमणि को ब्रिटिश सरकार नें १७ अगस्त सन १९०९ को फ़ांसी पर लटका दिया था, और आज इस दिन को १०० वर्ष पूरे हो गये हैं. क्या आपने कहीं किसी अखबार में(इक्के दुक्के को छोड कर)इस महत्वपूर्ण जानकारी का और शहीद दिन की शताब्दी दिवस का ज़िक्र पाया है?

वैसे मैं यहां इस अमर शहीद की जीवनी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं लिखूंगा, क्योंकि आज वह प्रासंगिक नही होगा शायद, मगर ये ज़रूर बताना चाहूंगा कि उसे किस लिये फ़ांसी की सज़ा दी गयी और इस नौजवान में जो देशभक्ति का जज़बा था उसकी प्रेरणा उसे कैसे मिली?

ब्रिक्स्टन जेल जहां मदनलाल,सावरकर आदि को रखा गया था.

एक सिविल सर्जन के बेटे, अमृतसर के सुखसुविधा से संपन्न परिवार में जन्म लेकर क्रांतिवीर बनने तक का सफ़र लंदन में शुरु हुआ जब मदनलाल लंदन के युनिवर्सिटी कॊलेज से सिविल इन्जिनीयरिंग में डि़प्लोमा कर रहे थे.सन १९०५ के आसपास का समय था.वहां के इंडिया हाउस में युवावस्था के रंगीन मस्ती भरी शामें बिताने जाया करते थे मदनलाल.रोमांटिक गाने,मित्रों के बीच सपनों की दीवानी दुनिया की चुहुलबाज़ी, बौद्धिक बहसें आदि दिनचर्या थी.देशभक्ति की भावना का दूर दूर तक पता नहीं था.

उन दिनों साथी क्रांतिकारीयों के साथ सावरकरजी की बम बनाने और अन्य शस्त्रों को हासिल करने की कोशिशें चल रही थी तो मदनलाल भी उनके संपर्क में आये, और वहां से उनके जीवन धारा में एक रेडिकल बदलाव आया, और वे भी शामिल हो गये इस आज़ादी की लढाई में.

उसके बाद उन्होने लोर्ड कर्ज़न वाईसरॊय का कत्ल करने की कोशिश की, मगर वह दो बार बच गया.बंगाल के पूर्व गवर्नर ब्रॆमफ़िल्ड फ़ुल्लर को मारने की योजना भी नाकाम रही क्योंकि मदनलाजी वहां लेट पहुंचे. फ़िर उन्होने कर्ज़न वाईली को मारने का निश्चय किया.जिस मीटिंग में योजना बनाई गयी उसमें बिपिनचंद्र पाल भी मौजूद थे. सावरकर नें कठोरता से मदनलाल को कहा कि अगर सफ़ल होकर नही आये तो कभी भी मुंह नही दिखाना.

१ जुलाई १००९ को रात को मदनलाल वाईली से मिले और उनसे कुछ खास बात करने के बहाने उनके समीप पहुंचे .११ बजकर २० मिनीट पर उन्होने जेब से कोल्ट पिस्टल निकाल कर कर्ज़न वाईली पर करीब से दो गोलीयां चलाई, जिससे वह जगह पर ही ढेर हो गया.ये देखकर एक पारसी डॊक्टर कावसजी लालकाका उसे बचाने दौडा तो उस पर भी गोली चलाई , और खुद पर भी चलाने ही वाले थे कि उन्हे पकड लिया गया.

उन्हे पकड कर जब मेजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उन्होनें शान से कहा कि मैं आपका कानून नहीं मानता. जिस तरह से जर्मन लोगों का ब्रिटेन पर राज करने का कोई अधिकार नहीं वैसे ही आप लोगो को भी हम पर राज करने का अधिकार कैसे हो सकता है?

१७ अगस्त १९०९ को याने आज से सौ साल पहले सुबह पेण्टोविले की जेल में फ़ांसी पर चढाया गया.यह वही जेल है, जहां १९४० में भारत माता के एक और लाडले सपूत शईद उधमसिंग को भी फ़ांसी पर चढा़या गया था.

दुर्भाग्य से इस देशभक्त के पार्थिव शरीर को वापस नहीं दिया गया और इसी जेल में दफ़ना दिया गया.

बाद में सन १२ डिसेंबर १९७६ को भारत सरकार के प्रयत्नों के कारण उनके पार्थिव शरीर लिये हुए शवपेटी को भारत लाया गया, और जीते जी तो नही , मगर फ़ांसी के कई सालों के बाद शहीद मदनलाल धिंग्रा के पार्थिव शरीर को अपने स्वतंत्र देश की मिट्टी नसीब हुई.

ऐसे शूर और वतन पर मर मिटने वाले जांबाज़ मदनलाल धिंग्रा की पावन आत्मा को मेरा नमन.........

Monday, August 10, 2009

कर्मशील , स्वयंसिद्धा बहन- रजनी...



रक्षा बंधन का पुनीत दिवस आकर चला गया.

राखी पर पोस्ट तैय्यार करने बैठा तो सोचा चित्र नेट से ले लूं. गूगल बाबा में सर्च में राखी डाला तो ८० प्रतिशत परिणाम आये राखी सावंत के और उसके स्वयंवर के बारे में !!! अब राखी सावंत जैसा व्यक्तित्व , और राखी के धागे के पवित्र ,प्लेटोनिक स्नेह बंधन.... वाह , क्या कंट्रास्ट है जनाब!!! खैर.

वैसे परंपरा के अनुसार इस दिन भाई अपनी बहनों की रक्षा करने का वचन लेते थे.

आज नारी स्वयं सक्षम है, स्वयंसिद्धा है. मगर फ़िर भी ये प्रेम , स्नेह का त्योहार हम सभी के मन की गहराई में रच बस गया है, किसी भी फ़्रेंडशिप डे की ज़रूरत महसूस ना करते हुए भी .

कल मैं काम के सिलसिले में इंदौर से करीब १२० किमी पर बसे प्रकृति की गोद में बसे एक छोटे से कस्बे खातेगांव गया था. रास्ते में मालवा के पठार के उतरन की हसीन वादियां छोटे पैमाने पर हमारा स्वागत कर रही थी.मेरे बडे भाई के बचपन के मित्र वहां एक फ़ेक्टरी खोलने की प्लानिंग करने के लिये मुझे साईट दिखाने ले गये थे.

उन्होनें वहां ज़मीन के मूल पुश्तैनी मालिक से भी मिलवाने का वादा किया था , जिनसे कुछ ज़मीन खरीदकर उसपर प्रोजेक्ट तय्यार करना था.

काम करने के पश्चात जब हम मालिक से मिले तो मैं आश्चर्य चकित रह गया जब मैं मिला एक २०-२१ साल की युवती से, जिसका नाम था रजनी. गांव के परिवेश में पली बढी होने के बाद अब वह एक आधुनिका थी , और बेहद सुलझी और मेच्युर बातें कर रही थी. जींस, और मोबाईल के साथ साथ बिज़नेस का सलीका भी बखूबी नज़र आ रहा था.

मैने जब उसके हाथ पर बहुत सारी राखीयां बंधी हुई पायी तो उससे पूछ ही बैठा कि ये क्या, तुम्हारे हाथों पर राखी? क्या मालवा या निमाड क्षेत्र का कोई रिवाज है?

तो उसने जो बताया , तो उस कर्मशील , स्वयंसिद्धा बहन के प्रति मेरे मन में आदर भर आया.

उसके पिता इस दुनिया में बहुत पहले छोड गये थे, और उसकी ६ और बहनें थी, जिनके लालन पालन का ज़िम्मा उसकी मां के बदले रजनी पर आया. और अब कुछ सालों से वह इंदौर आ गयी है, अकेले रहती है, और एक निजी ओफ़िस में प्रबंधन का काम कर अपने परिवार का खर्चा वहन करती है.आगे चल कर अपनी ज़मीन पर वह अपना खुद का कोई उद्यम शुरु करने का भी साहस भरा निर्णय ले चुकी है.

याने,समय नें उसे कम उम्र में ही अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करा दिया, और अब वह बखूबी एक भाई की तरह अपने बाकी सभी बहनों की रक्षा कर रही है!!(Literally)

और इसी भावना को मन में रख कर रजनी की सारी बहनें उसे रक्षाबंधन के त्योहार पर राखी बांधती है!!!

आज रजनी जैसी और भी कई बहनें होंगी, और भी कई भाई , जिनके जीवन में रजनी जैसी बहन एक अहम भूमिका निभा रही होगी!!

इस रजनी को और उन सभी अनाम रजनीयों को सलाम!!!

Wednesday, August 5, 2009

रक्षा बंधन - ब्लोग परिवार की अलग और विशिष्ट संस्कृति


(मेरी बहन प्रतिभा नें भेजी हुई राखी!!)


रक्षा बंधन के इस पावन और पुनीत पर्व पर ब्लोग परिवार की सभी बहनों को शुभकामनायें, बधाई, और इस भाई की ओर से प्रणाम!!

ब्लोग दुनिया से जुडने के एक साल के बाद जब भी मैं आज पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि इस नई विधा नें अंतर्जाल के माध्यम से कितने सारे नये परिवार मुझे दिये. वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना इतना अच्छा और सार्थक उदाहरण इससे बेहतर क्या होगा?

मेरी सबसे पहली पोस्ट नश्र हुई थी ( दिलीप के दिल से )-२३ जुलाई २००८ को और सबसे पहले टिप्पणी दी थी मेरे मानस अनुज श्री संजय पटेल नें और दूसरी सुश्री अल्पना वर्मा नें.संजय भाई तो मुझे इस ब्लोग जगत में लाने के प्रेरणा स्रोत ही रहें है, और इस ब्लोग वास्तु के नाम - दिलीप के दिल से और अमोघ के मानस शब्द की संकल्पना के रचयिता भी वहीं है .सुश्री अल्पना जी नें पहले ही कमेंट से जो उपयोगी और सार्थक टिप्स दी वो आज तक जारी है, यानी हफ़्ते दर हफ़्ते इस वास्तु पर जो भी क्रमवार विकास हो रहा है,- तकनीकी और सुरमई - इसमें उनके सुझावों और सहयोग से यह सभी संभव हो रहा है.

दोनों के साथ साथ , मेरे कई और मित्रों ने भी मार्गदर्शन दिया जैसे हिन्दयुग्म के सजीव सारथी, जिन्होने मुझे अपने गाये गानों को ब्लोग पर डालने की सलाह दी.मैने अब तक मात्र अल्पनाजी को ऐसा करते हुए देखा था .आप ही नें कहा कि जब हम सभी अपनी रचनायें पोस्ट करते हैं तो वो भी आपका सृजन ही तो है. उसके बाद, मुझे हमारे सभी के प्रियजन ताऊ का भी मारग्दर्शन मिला, अपने ब्लोग के स्वरूप को और बेहतर और रंगीन करने के लिये. साथ ही एक मित्रवत आग्रह भी कि आपसे जितना भी संभव हो,अपने पसंदीदा साईट्स पर जाकर टिप्पणी करें उससे हमारे ही साथियों का उत्साहवर्धन होगा , साहित्य की सेवा होगी, और प्रेम और संवेदनाओं के साये तले एक परिवार की अवधारणा बनेगी.

और भी मेरे मित्र हैं जिन्होनें हमेशा मेरे दोनों ब्लोग पर आकर अपनी जीवंत टिप्पणीयों से मुझे नवाज़ा है; लावण्या दीदी, समीर लाल, अनुराग शर्मा , डा. अनुराग, अर्श,हरकीरत जी, रंजु जी, और अन्य कई.

तो बीते हुए उन दिनों हम सभी भाईयों और बहनों नें अपने अपने सुख और दुख में एक दूसरे को शामिल किया, और एक नया आयाम रचा प्रेम और स्नेह के उस बंधन का , जिसे हम रक्षा बंधन के नाम से ना पुकारें तो किससे पुकारे?

हम सभी अलग अलग क्षेत्र से जुडकर, अलग अलग विचार धारा से अभिप्रेत, अलग अलग देश, धर्म, जाति, और उम्र के बंधन से निकलकर, ब्लोग दुनिया के इस नये देश के नागरिक हो गये हैं, और अंतर्जाल के महीन वर्च्युअल धागे के बंधन से जुड कर एक परिवार का हिस्सा बन गयें है.

हम नागरिक कुछ तो अलग है, दीगर जमात से.

हम कलाकार है, लेखक हैं , कवि हैं, चित्रकार हैं, फोटोग्राफ़र हैं, और अब हमारा एक अलग वजूद हो गया है, जो देश विदेश के दूसरे बुद्धिजीवीयों से थोडा अलग यूं है, कि हम सभी भावनात्मक रूप से करीब हैं. याने की हम तर्क के धरातल से उठ कर संवेदनाओं और एहसासत के रूहानी स्तर पर जाकर दिमाग की जगह दिल से जुडे हैं.

इसीलिये हमारे बीच अब एक अलग और विशिष्ट संस्कृति का प्रादुर्भाव हो गया है.

क्या आप सहमत हैं?

( अभी अभी मेरे पिताजी नें मुझे संस्कृति की उनकी व्याख्या दी- संस्कारों द्वारा परिष्कृत कृति ही संस्कृति है!!)

Thursday, July 9, 2009

वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है.

आज मैं भावाभिभूत हूं....


नतमस्तक हूं उस   परमेश्वर के पावन चरणों में....


मित्रों , अभी पिछली पोस्ट में मैने ज़िक्र किया था मेरे बेटे अमोघके जन्म दिन पर उसके साथ हुई नाइंसाफ़ी का-

कृपया यहां पढें

दुख इस बात का नही था दोस्तों कि उसे तब चेम्पियनशिप नही मिली थी. वह तो उसके कर्म, भाग्य और भगवान के आशिर्वादों का फ़ल था.


मगर सही होने का भी अगर खामियाज़ा भुगतना पडे तो मन को कष्ट होता है,हुआ भी.गोया ,अच्छे की बुराई पर हमेशा जीत होती है ये जुमला मात्र किस्से कहानियों में या फ़िर फ़िल्मों में ही शेष रह गया था .


मगर आप सभी साथियों नें जिस तरह से हौसला अफ़ज़ाई की थी, और इस बात से मन में अच्छे कार्य के प्रति विश्वास का जो भाव जगाये रखा उसकी परिणीति अभी हुई.


अभी पिछले रविवार को चेन्नई में अखिल भारतीय एबेकस मेण्टल अरिथ्मेटिक कोंपीटिशन २००९ सम्पन्न हुई. पूरे भारतवर्ष से करीब २२००० बच्चों ने भाग लिया- पहले से लेकर १० वें लेवल की परीक्षा में ८ मिनीट में ३०० सवाल करने थे जोड/घटा/गुणा/भाग आदि.


मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता होती है, जो मैं अपने ब्लोग परिवार में बांटना पसंद करूंगा कि -


<strong>अमोघ को अपने लेवल ९ में पूरे भारत वर्ष में अव्वल स्थान प्राप्त हुआ और उसे चेम्पियन घोषित किया गया !!!

 Amogh 2

 

और साथ ही में १ से १० लेवल के चेम्पियन्स में भी वह सबसे प्रथम स्थान पर रहा और उसे Champion of the Champions घोषित किया गया !!!!

 

Amogh 4

(कंप्युटर और मलेशिया के विज़िट की स्पोंसरशिप लेते हुए)

यह बात तो सर्व दृष्टि से साबित हो गयी है, कि अमोघ नें कभी भी सच का साथ नही छोडा़ ,और सही और गलत की पहचान भी उसके बाल मन में उपज गयी है.अब यही मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति उसे अगले विश्च प्रतियोगिता (क्वालालम्पूर , मलेशिया- नवम्बर २००९)में भी सही राह पर चल कर लक्ष्य प्राप्त करने में मदत करेगी.इन्शाल्लाह!!!

मैं इस बात पर ज़रूर शर्मिंदा हूं कि मैंने उस परमपिता ईश्वर पर भी आक्षेप लगाया था कि शायद अब वह भी टी आर पी बढाने के लिये अपने सच्चे भक्तों की जगह ऐसे अवसरवादियों की सुनने लगा है,जिन्हे किसी भी सूरत में कामयाबी हासिल करनी है, BY HOOK or BY CROOK . और तो और मैने और नेहा नें यह भी सोच लिया था कि इस बार अमोघ को चेन्नई में Competition मे नही ले जायें.मगर उसकी शिक्षिका मॆडम लीना सचदेव नें शब्दशः मिन्नते करते हुए उसे भेजने के लिये राज़ी किया.

मुझे वाकई लगने लगा था कि आध्यात्म का जो मानस मेरे मन में और आत्मा में रचा बसा है, उसनें मेरा क्या भला किया वह महत्वपूर्ण नही है, क्योंकि मैं हमेशा से मानता आया हूं कि हमें हमेशा ही अपना कर्म करते रहना है, और फ़ल की आशा नही करना चाहिये.बल्कि क्या यह सही है, कि मैं अपने पुत्र को भी उसी संस्कारों और परंपराओं का चोला पहनाऊं जो उसे इस तामसिक हलाहल भरे विश्व की तपन,पीडा , और नैराश्य से बचाव भी ना करा सके, और उसे Expose कर दे. 

मगर इस दुविधा और नकारत्मक नैराश्य से उबारा उसी नें. और आशा, विश्वास, और सकरात्मक उर्जा का संचार कराया है  उसी नें..

हे भगवान- मुझे क्षमा करें ....

आज मैं संतुष्ट हूं कि अमोघ के पीछे अच्छेपन का सिला देने वाला जागृत है. यह इसलिये नही कि उसे प्रथम स्थान मिला है. यह तो उसमें विश्वास के पुर्नर्जीवन का सबब ही तो है!और आप सभी अच्छे अख़लाक़ के मालिक ब्लोग परिवार के मित्रों के मन से निकली दुआओं का असर भी,जो उसे अगली परीक्षाओं में भी यही संबल देता रहें..


धन्यवाद..


 Amogh 11

मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है,
वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है.

Thursday, July 2, 2009

नील मुकेश या नील नितीन...

पिछले दिनों काम के सिलसिले में छुट्टियां भी एंजोय करने का मूड हो गया था, इसलिये फ़िर गायब हो गया.

मौसम की पहली बारीश छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रसिद्ध दुर्गम किले रायगढ़ पर !!! क्या बात है. उसपर अलग से लिख रहा हूं.

कल न्युयोर्क फ़िल्म देखी. एक अलग विश्व, अलग समस्या और अलग तरीके से हेंडल किया गया वह महत्व पूर्ण विषय -

आतंकवाद!!!

शायद कबीरखान नें मुसलमानों के नज़रीये से भी पहली बार इस फ़िल्म में यह बात बताने की कोशिश की है, कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता. बात में दम है. दोनों ओर के दृष्टिकोण बडी बारीकी से और खुलासेवार पेश किये गये.अच्छा लगा.

फ़िल्म में रोशन का यह वाक्य बडा ही सारगर्भित है, जिसका सार यह है,कि एक मुसलमान होते हुए भी उसने काम के साथ कभी समझौता नही किया, और शायद अल्लाहताला नें ही उसे यह मौका दिया है, कि दुनिया में उस मुसस्सल ईमान की परख हो जाये, जिसके लिये हर मुसलमान इज़्ज़त की दृष्टि से देखा जाता है.

साथ ही में उसके जरिये यह बात भी बताई गयी कि चाहे कुछ भी हो जाये , आतंकवाद को किसी भी तर्क से जायज़ नही ठहराया जा सकता, जबकी बडी ही दुख की बात थी कि ९/११ के बाद ख्वामख्वाह मुसलमानों को तकलीफ़ों को झेलना पडा, और अमरीकी सरकार को अधिकतर इनोसेंट लोगों को छोडना पडा.




मुझे तो सबसे बढियां सीन वो लगा , जहां नील नितीन मुकेश नें अपने दादा स्वर्गीय मुकेश जी का वह गीत स्वयं गाया-

ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूट क्या, और भला सच है क्या!!

माशाल्लाह , बडा ही सुरीला गया है. खुदा उन्हे और ऐसे मौके दे, जहां वे गाना भी गाये.

आज मुझे पिछले साल की वह बात याद आ रही है, जो नील के पिता नितीन मुकेश जी नें एक व्यक्तिगत लंच में बताई थी, जब वे इंदौर आये थी लता मंगेशकर सन्मान समारोह में प्रस्तुति देनें.

उन्होने एक बडी ही रोचक बात बताई, कि जब फ़िल्मों के लिये नील को नाम चुनने को कहा गया तो उसे दो ओप्शन दिये गये थे--

नील मुकेश ...

या

नील नितीन...

यह बात बताते हुए नितीन मुकेश जी का सीना गर्व से फ़ूल गया था कि नील नें कहा:

मैं जो भी हूं आज अपने पिता की वजह से हूं , और साथ ही में मेरे दादाजी की भी विरासत का वारीस हू, और उनके आशिर्वाद हैं ही.

इसलिये मैं उन दोनों को मान देते हुए अपना नाम रखूंगा;

नील नितीन मुकेश..
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